लघुकथा ...........स्विच आफ

07 दिसम्बर 2019   |  SURENDRA ARORA   (428 बार पढ़ा जा चुका है)

किसी के प्रति आकर्षण कभी भी सम्मोहन में बदल सकता है ।रुचियां हमेशा हमसफर ढूँढ़ती रहती हैं ।

प्यार वो समुंदर है जिसमें हर उम्र समा जाती है ।

प्यार शक्ति है तो कमजोरी भी यही बनता है ।


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लघुकथा


स्विच आफ


" इतने दिन से कहां थीं ? "

" होना कहां है ,घर पर ही थी ।"

" एकांतवास में ? "

" एसा क्यूं कहा ? "

" एसा इसलिये कहा कि जब भी तुम्हें फोन किया ,उसका स्विच आफ मिला ।"

" तो समझ जाते कोई वजह ही होगी ।"

" तो बताओ क्या वजह थी ? "

" बहुत दिनों से दिमाग में एक प्लाट बवंडर की तरह उधम मचा रहा था । मैं नहीं चाहती थी कि कोई मुझे डिस्टर्ब करे ।इसलिये मैने फोन का स्विच आफ कर दिया और उस प्लाट को पन्नो पर उतारने में मस्त हो गयी । "

" चाहे किसी की जान ही चली जाय ! "

" जान जब अपने पास होगी ,तब न जायेगी । भले - चंगे तो हो ,तभी तो बातें बना पा रहे हो ।"

" बात को पलटना तो कोई तुमसे सीखे । बाई दी वे , प्लाट क्या था । "

" बेहद इंटरेस्टिंग ! "

" इंटरेस्टिंग क्या होगा ,वही सास - बहू या फिर ज्यादा से ज्यादा देवरानी - नौकरानी का कोई किस्सा ,या फिर पति की प्रताड़ना । स्त्रियां चाहे जितनी भी बड़ी लेखक बन जायँ, इससे आगे कुछ सोच ही नहीं पाती । "

" ए मिस्टर , आज की नारी बहुत आगे निकल गयी है ।अनुभवों की उसके पास भी कोई कमी नहीं है , समझे ।"

" लगता है कुछ नया सोचा है इन दिनों ?"

" हाँ , पढ़ोगे तो मान जाओगे कि तुम्हारी कलम को पीछे छोड़ दिया है मैने ! "

" वेरी इंटरेस्टिंग और कान्फिडेंट भी!पर वो है क्या ,पता तो लगे ?

" इस बार मेरी कहानी में सास - ननद नहीं , नौकरानी या उसकी माल्कीन भी नहीं । एक नायक है और उसकी एक नायिका भी है । "

" इसमें नया तो कुछ नहीं है । बहुत सी कहानियों में एसा होता है ।"

" मेरी इस कहानी में दोनों के साथ एक अनहोनी भी है ।"

" वो क्या ? "

"मेरी कहानी के नायक और नायिका की उम्र में काफी अन्तर है । दोनों में ढेर सारी बातों को लेकर काफी समानता है । दोनों अकेले न होते हुए भी अकेले हैं । दोनों को बिना वजह बातें करना और घूमना पसंद है । दोनों जाने - अनजाने अधिक से अधिक या तो साथ रहना पसंद करते हैं या फिर किसी न किसी बहाने से बात करके आनंदित होते हैं । "

" मतलब एक - दूसरे से प्यार करते हैं ।"

" हो सकता है करते हों पर उन्होनें आपस में कभी इसे स्वीकार नहीं किया है ।"

" है तो रोचक पर अधूरी । "

" इसिलिए तो तुम्हें बीच में घसीट रही हूँ। "

" इसमें मैं क्या कर सकता हूँ ? कहानी तुम्हारी है , पूरी भी तुम ही करो । "

" ठीक कहा तुमने। जिसका पाला तुम जैसे दोस्तों से पड़ता है ,उनकी कहानियाँ हमेशा अधूरी ही रहती हैं । "

इतना कहकर उसने फोन रख दिया ।

वो कुछ समझा और कुछ नहीं भी समझ पाया ।

उसने फिर से उसे फोन मिलाया ।

फोन का स्विच फिर से आफ हो चुका था ।



सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा

साहिबाबाद ।

07 /12 / 2019


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