अख़बार

11 फरवरी 2020   |  मंजू गीत   (2235 बार पढ़ा जा चुका है)

काफी अरसे से अखबार पढ रही हूं। हर रोज देश दुनिया के बदलते रंग, ख्वाहिशे, मिज़ाज, लिबास, देख रही हूं। बदलती तारीखों में ना बदलती सोच देख रही हूं। अखबारों की स्याही सूख नहीं पाती कि स्याह खबर फिर दर्ज हो जाती है अख्बार के किसी कोने, कालम में। जिन मुद्दों से लाभ है सियासत को उन्हें सुलझाया नहीं उलझाया जाता है। अजीब किस्से हैं जिंदगी के प्रेम की पनाह में शक उकेरा जाता है। स्टेटस बनाये रखने के लिए अपने हाथों, अपनी बगिया को खाक में मिला कर खुद को आजाद किया जाता है। बेबसी के आलम में जहर, हर ग़म से निजात की दवा समझ कर पिया जाता है। पिया- प्रिय, मीत-प्रित चाहत की चक्की में हार कर एक दूसरे को जीवन-मुक्ति का हार पहनाते हैं। लोक लाज की दुहाई में लोक परलोक का रास्ता बना लेते हैं। जज्बातों की गहराई फिकी है, कौन समझें ? मसरूफियत का आलम ही कुछ ऐसा है।अल्फाज़ बहुतेरे है, जो अखबारों के पन्नों में बिखेरे है। खामोशियों की चित्कार है, सुनने के लिए कान भी बेकार है। दबी बंधी रहती थी जो पर्दे में, आज वो इज्जत सड़क पर लगाती गुहार है। पर्दे को हटा, जो सड़क, गली, मोहल्लों में ठहरा है। उसी का नाम प्रदर्शन है। अब नहीं स्वीकार है, मांग है, अधिकार है। धिक्कार है.... तभी विरोध विद्रोह में बदल कर प्रशासन से टकराने को तैयार है। रोज रोज (गुलाब) की तरह पत्ता पत्ता लुटती हुई अस्मिताएं है। इंसाफ की रस्सी भी करती इंतजार है। नप तुल कर रस्सी भी हंसती है, इंसाफ के तराजू में तारीखों का आचार है। तड़पता है पीड़ित और मजे लेता गुनहगार है। सिलसिला ये आम है। रोज आता अखबार हैं।



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