आज की राख

08 जून 2020   |  मंजू गीत   (286 बार पढ़ा जा चुका है)

मीठी जुबान बनके कटार हुई मन के पार, जब मुंह ढककर अपने सामने आने लगें। क्या बेटी, क्या बहु, क्या प्रेमिका, क्या मइया, सब मुंह ढककर घर बाहर आने जाने लगें। रिश्तों का भंवर, बीमारी के कहर से शरमाने लगें। छाया ऐसा कोरोना का डर कि अपने भी, गले मिलने से घबराने लगे। दो गज की दूरी, दो गज की कोठरी से है भली। बस यही सोच लोग फासलों को बढ़ाने लगें। बीमारी के आगाज में, हर इंसान, हर घर बंद हुआ समाज में। सन्नाटा पसरा मंदिर, मस्जिद, बाजार, शहर और संसार में। जब शहर, गली, घर पहुंचने लगी बीमारी तो एक एक करके सब बंद खोल दिए मरने कों कोरोना से। अस्पताल में लगने लगे ढ़ेर मौत के, दफनाने, जलाने को जगह तलाशी जा रही। श्मसानों में भीड़ बढ़ रही अर्थियों की, सरकार अर्थव्यवस्था को मजबूत करने, इंसान घर के अर्थ को संभालने निकल पड़ा है घर से। इलाज से ज्यादा काज जरूरी नहीं, आज की समझदारी ही नया कल लेकर आएंगी, नहीं तो आज कोरोना की भेंट चढ़ कर, राख भी हाथ में ना आएगी। आज की राख खाक में मिल जाएगी।

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