समझ से परे

10 जून 2020   |  मंजू गीत   (2893 बार पढ़ा जा चुका है)

जब मांझी नाव को बीच मझधार में छोड़, खुद साहिल पर खड़ा हो जाएं तो नाव संभलते, चोट खाते हुए बहाव में ही तो जाएंगी ना... वो पार लगे या पातर पातर होकर मिट जाये, ये उसकी किस्मत। मेहनत करें तो ठीक है, पर चालाकी मेहनत से ऊंची हो कर, दूसरे की छवि पर दाग दे जाए तो क्या ये भी ठीक है? भरोसे के मायने अपने लिए कुछ और दूसरों के लिए कुछ। इससे तुच्छ कुछ और है क्या? लोग अपनी बातों से दूसरों की आंखों पर ,अपनी गोल मोल, फरेब वाली समझ बड़ी चालाकी से ढकते है। उसको गाहे-बगाहे एहसान का एहसास भी बराबर कराते हैं और उसकी उम्मीदों की काट भी बेहतर करते हैं। सामने वाला उसे अपना भी मानता है और तबाह भी होता है। इसके बावजूद वह उसकी ओढ़ाई समझ को अपना मान शुक्र भी अदा करता है। दुनियां में दो धारी तलवार से बचना आसान है पर चार तरफा दौड़ने वाले, दिमाग वालों से बचना मुश्किल है। यह और भी मुश्किल है, जब वह आपको विश्वास में लेकर आप के दिल, दिमाग पर हावी हो। माला मोतियों की हों, रिश्तों की हों या विश्वास की हों, टूटने पर बिखर ही तो जाएंगी ना...

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