भेदियों से देश को कितना नुकसान!

05 जुलाई 2020   |  एंटोनी जोसफ   (289 बार पढ़ा जा चुका है)

भेदियों से देश को कितना नुकसान!





भेदियों से देश को कितना नुकसान!

अक्सर होता यह है कि किसी आपराधिक वारदात को रोकने पहले कोई एहतियाती कदम नहीं उठाये जाते किन्तु जब हो जाता है तो यह बवंडर बन जाता है तथा उसके पीछे जनता का पैसा इतना खर्च हो जाता है कि उसकी कोई सीमा नहीं रहती. उत्तर प्रदेश में भले ही छोटे मोटे अपराध को ज्यादा तबज्जो नहीं दी जाती किन्तु जब भी यहां जघन्य अपराध होते हैं तो इसकी गूंज पूरे देश में होती है.इसके बाद ही पुलिस की सक्रियता सुर्खियो में हो जाती है. शुक्रवार को सवेरे -सवेरे टीवी ने यह खबर देकर चौका दिया कि कानपुर के चौबेपुर में गुरुवार रात दबिश देने गई पुलिस टीम पर हमला करके एक सीओ सहित आठ पुलिसकर्मियों की हत्या दुर्दांत अपराधी विकास दुबे और उसके साथियों ने कर दी.यह वही व्यक्ति है जिसे आज से उन्नीस साल पहले संतोष शुक्ला नामक व्यक्ति की हत्या के मामले में गिरफतार किया था किन्तु उस समय मौजूद सारे गवाह जो पुलिस कर्मी थे सब पलट गये और यह उस समय का छोटा सा पौधा आज वट वृक्ष बन गया अब यह आठ बहादुर पुलिसकर्मियों का हत्यारा फरार है. कानपुर के चौबेपुर में अपने गांव बिकारू में करीब चार घंटे की लौमहर्षक घटना को अंजाम देने के बाद से फरार विकास दुबे की तलाश में प्रदेश की सौ पुलिस टीमें लगी हैं, इनमें एसटीएफ की भी आठ टीमें हैं फिर भी उसका कोई सुराग नहीं मिल रहा है.पुलिस की टीमें लगातार उसकी तलाश में लखनऊ, कन्नौज, सौनभद्र, वाराणसी, प्रयागराज, मथुरा, सहारनपुर तथा बांदा में छापे मार रही हैं. लखनऊ में उनके छोटे भाई की पत्नी तथा पत्नी के भाई को भी हिरासत में लिया गया है.उसके उस मकान को भी ढहाने की खबर है जिसमें रहकर उसन ेेपुलिस कर्मियों की निर्मम हत्या की. उत्तर प्रदेश या देश की प्राय: पुलिस के पास इस बात की पुख्ता जानकारी रहती है कि कौन अपराधी कितना सक्रिय है, कितना शक्तिशाली है, संपन्न है, राजनीतिक पहुंच या राजनीतिक हिस्सेदारी कितनी है किन्तु इसके बावजूद अपराधियों की क्षमता नापकर काम करने में उत्तर प्रदेश नहीं पूरे देश की पुलिस व्यवस्था पचास प्रतिशत से ज्यादा असफल रहती है. इसके पीछे अक्सर कारण यह होता है कि पुलिस में ही ऐसे अपराधियों की घुसपैठ इतनी ज्यादा होती है कि उसका पूरा सिस्टम फैल हो जाता है. अपराध की इस वारदात की अगर गहराई से छानबीन की जाये तो इस मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ है जिसमें पुलिस अपराधी तक पहुंचने के लिये बिछाये गये जाल में खुद ही फंस गई.अपराधी को इस बात की पूरी जानकारी थी कि उसे गिरफतार करने के लिये पुलिस पहुंचने वाली है. इस प्रभावशाली अपराधी ने उससे निपटने पूरा जाल पहले से बिछा दिया तथा कई निर्दोष जवानों को मौत के घाट उतार दिया. पुलिस ने अपराधी की शक्ति का आंकलन व उसके खूफिया तंत्र का आंकलन कम किया तथा घटना में अपने ही आठ जवानों को खो दिया जबकि कई को जीवन और मृत्यु से संघर्ष करने के लिये छोड़ दिया. इसमे दो मत नहीं कि घटना के बाद अपराधी व उसके साथियो को पकडऩे के लिये बहुत बड़़ा अमला व ताकत लगा दी किन्तु यह भी सवाल उठता है कि आखिर गिरफतारी के लिये छापे की कार्रवाही की खबर अपराधी तक कैसे पहुंचती है? यह सब पुलिस के अंदर छिपे उन भ्रष्टाचारी भेदियों का काम है जो पुुलिस व्यवस्था के अंदर छिपे हैं ओैर हर पुलिस कार्रवाही का लेखा जोखा उन प्रभावशाली बाहुबलि की चाटुकारिता करते हुए उन तक पहुंचा देते है अत: पुलिस व्यवस्था के लिये देशभर में यह जरूरी है कि वह अपनी व्यवस्था को पाक साफ बनाये रखे और पुलिस से ऐसे लोगों को बाहर करें जो चाटुकारिता कर अपनी जेब तो भरते हैं किन्तु जनता के गाड़े कमाई का पैसा ऐेसे दुष्टो को सलाखों को पीछे भेजने के लिये खर्च भी करते है. एक अपराधी को पकडऩे के लिये अब कितना पैसा पानी की तरह बहाना पड़ेगा यह सोचने का विषय है.कानपुर में आठ पुलिसकॢमयों की हत्या और सात को गंभीर रूप से घायल करने के बाद विकास दुबे और उसके साथियों ने पुलिस से पांच असलहे भी लूटे थे. इनमे एक एक एके-47 रायफल, एक इंसास रायफल, एक ग्लॉक पिस्टल और दो 9 एमएम पिस्टल हैं.कानपुर का यह हत्याकांड कितना भीषण था इसका अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि चौबेपुर मुठभेड़ में बदमाशों ने बड़ी साजिश की थी- वो पुलिसकर्मियों को मारकर शव जलाने के फिराक में थे इसीलिए एक के ऊपर एक रखकर शवों के ढेर लगा दिए थे. पुलिस की गाडियों को भी फूंकने की तैयारी थी मगर तभी भारी पुलिस बल पहुंच गया और बदमाश फरार हो गए. गांव की सड़कें खून से रंगी थीं. हालात बयां कर रहे थे कि किस कदर पुलिसकर्मियों पर बर्बरता हुई है.साजिश होती रही इसलिये कि पुलिस की हर गतिविधियां उन तक पहुंचती रही. आज जो पुलिस कानपुर में इस हत्याकांड के दोषियों को पकडऩे के लिये टीम बनाकर, समितियां बनाकर व इधर उधर पुुलिस कर्मियो को भेज रही है थोडा सा एहतियात बरतती तो शायद नहीं होता. सबको मालूम था फिर भी हो गया लेकिन यह सब होता कैसे हैं?यही सबसे बड़ा सवाल है!


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