इंसान लुट

18 जुलाई 2020   |  मंजू गीत   (310 बार पढ़ा जा चुका है)

ना वैक्सीन, ना विकेंसी बेरोजगार तो पहले भी कम न थे। एक के पीछे लगने वाली लाइन हर जगह ही है। कोरोनावायरस ने लाइन को कुछ इस तरह खत्म किया कि अब हर चीज आनलाइन हो गई। पैसा, पढ़ाई, कला, कलाकार, काम, ख्वाब, रिश्ते, बात, मुलाकात। जो बेहतर मार्क्स लेकर आ रहे हैं, यह सरकारी तंत्र में कायदे कागज कानून वाली जी हजूरी कर कानून व्यवस्था चलाएंगे और जो कम मार्क्स ला रहे हैं वह नेता, अभिनेता, राजनेता बनकर सरकार बना देश चलाएंगे। पढ़ाई-लिखाई वाले पीपीई किट पहनकर जान की रक्षा करने के लिए जान लुटाएंगे। वही नेता और अभिनेता पब्लिसिटी पाने के लिए हर संभव पतरे बदलते पाएंगे। अर्थव्यवस्था के नाम पर महंगाई बढ़ती जाएगी। व्यवस्था के नाम पर अराजकता हावी होती जाएगी। समाज में व्यवहार के नाम पर दूरियां ही भली बताई जाएगी। आत्महत्या के पीछे के हत्यारे, अवसाद के नाम से छिप कर रह जाएंगे। गरीब, जानवर, स्त्री को बेजुबान जान, इनके साथ निर्ममता करके राजनीति की रोटियां सेंकी जाएगी। लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ, गिद्ध बनकर नोचने पहुंच जाएगा और फिर इंसानियत और इंसाफ का कुचला चेहरा लेकर हर गली कुचे में हाहाकार मचाएगा। पहले के दौर में लोग बकरे, मुर्गे, सांड लड़ाकर मनोरंजन करते थे। अब मीडिया अलग-अलग पार्टियों के नेताओं को लड़ाकर मनोरंजन करती है। ना जाने किस आइने से तस्वीरें लाकर उसपर वाद विवाद होते हैं। अब इन्हीं विवादों की खींचतान करने वाले को लोग बौद्धिक कहते हैं। कोरोना में अर्थव्यवस्था, इंसानियत, बौद्धिकता भी टूट रहीं। कोरोना की वैक्सीन भले ही मिल जाए, पर इनकी वैक्सीन तो मिलने से रही। वैकेंसी की काबिलियत वाली उम्र के अंतिम दौर में है जो अभ्यार्थी उनकी उम्मीद टूट गई।

अगला लेख: कोरोना की मार



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x