चीन और भारत संकट में 1962 से सिख लेना जरूरी इतिहास से सीखता भारत

26 जुलाई 2020   |  Aman Prakash   (372 बार पढ़ा जा चुका है)

सोवियत रूस ने अपनी मिसाइलें क्यूबा में तैनात कर दी थीं। इसकी वजह से तेरह दिन के लिए (16 – 28 अक्टूबर 1962) तक जो तनाव रहा उसे “क्यूबन मिसाइल क्राइसिस” कहा जाता है। ये वो बहाना था, जो सुनाकर सोवियत रूस ने नेहरु को मदद भेजने से इनकार कर दिया था। नेहरु शायद इसी मदद के भरोसे बैठे थे जब चीन ने हमला किया था। नेहरु ने उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी से भी फाइटर जेट के दो स्क्वार्डन मांगे थे, मगर केनेडी ने भी क्यूबन मिसाइल क्राइसिस के नाम पर ही मदद भेजने से इनकार कर दिया था।


कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि नेहरु की “नॉन-एलाइन्ड पॉलिसी” की वजह से कोई भी उनके साथ नहीं आया। इसकी तुलना आज के दौर से करें तो आज पूरा विश्व कोरोना वायरस के संकट से जूझ रहा है। इसके वाबजूद वो देश जो पहले ही चीन से खार खाए बैठे थे, वो सभी भारत की ओर से तथाकथित मामूली से “एप्प बैन” के समर्थन में एक एक करके आते जा रहे हैं। कहाँ तो युआन पर पले टुकड़ाखोर मजाक उड़ा रहे थे कि जान के बदले एप्प का कैसा सौदा है? कहाँ हिसाब जोड़ने में ही बेचारों को मिर्गी आने लगी है! अखबारी आंकड़ों के 6 बिलियन डॉलर यानि करीब 42 हजार करोड़ रुपये कम होते भी नहीं।


पिछली बार (1962 वाले में) जब चीन ने हमला किया था, तब उसने दो मोर्चे एक साथ खोल दिए थे। एक दूसरे से करीब 1000 किलोमीटर (600 मील) की दूरी पर दो पूर्वी और पश्चिमी, मोर्चों पर लड़ाई चल रही थी। नेहरु ने तब अरुणांचल प्रदेश को मेरे बस में कुछ भी नहीं कहते हुए, उसके हाल पर छोड़ दिया था। आखिरकार वहां होम गार्ड में प्रशिक्षित महिलाओं ने साड़ियाँ कसी और थ्री नॉट थ्री जैसी पुरानी रायफलों के साथ ही हमलावरों का मुकाबला करने उतर आई थीं। अगर उनका योगदान नहीं होता तो शायद भारत का नक्शा अभी जहाँ तक है, वहां से भी काफी सिमट गया होता।


इसकी तुलना में इस बार ताईवान की ओर से दूसरा मोर्चा खुल गया है। उन्होंने बुधवार को एक नया दफ्तर खोला जिसका मकसद हांगकांग से भागकर आ रहे लोगों को पढ़ने, व्यापार, निवेश जैसे कामों के लिए “नागरिकता का आवेदन” देने की जगह मुहैया करवाना है। जब हांगकांग अपनी चीन में वापसी की 23वीं सालगिरह मनायेगा उस वक्त ऐसा दफ्तर खोलते समय ताईवान का अधिकारिक बयान है कि “चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की जनविरोधी नेशनल सिक्यूरिटी लॉ को हांगकांग की जनता पर थोपे जाने के विरुद्ध” ये कदम उठाया गया है।


ताईवान को उम्मीद है कि इसके जरिये वो ना सिर्फ शरणार्थियों की मदद करेगा, बल्कि हांगकांग से पूँजी और मानव संसाधन भी अपने देश में लाने में कामयाब होगा। इस प्रोजेक्ट में “कंसल्टेशन सर्विस”, “प्रोग्राम मैनेजमेंट” और “एडमिनिस्ट्रेटिव अफेयर” जैसे घातक हैं। रोचक ये भी है कि इस वक्त ताईवान की प्रधानमंत्री एक महिला साय इन्गवें हैं। हाँ जो आज पूछ रहे हैं कि छप्पन इंची कहाँ है, वो कल ये जोड़ेंगे कि एक मिसाइल की कीमत में कितने स्कूल बन सकते थे। हमें उनके यू-टर्न का भी इन्तजार जरूर करना चाहिए। वैसे जब 1962 का युद्ध हुआ था, तब एक दूसरी मजेदार बात जरूर हुई थी।


इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ पाकिस्तान के तब के राष्ट्रपति अयूब खान ने उस वक्त कहा था कि अगर भारत चाहे तो उसकी सीमाओं से होते हुए भारतीय सेनाएं, सुरक्षित हिमालय पर जा सकती हैं। अब इस्लामिक रिपब्लिक और पीपल्स रिपब्लिक में सम्बन्ध अच्छे हैं। उयगहूर मुस्लिमों के साथ किये चीन के बर्ताव, या अपने पाकिस्तानी दफ्तरों में काम के वक्त नमाज पढ़ने पर पाबन्दी लगाने के बाद भी मुझे नहीं लगता कि इस बार इस्लामिक रिपब्लिक किसी भी तरह पीपल्स रिपब्लिक के खिलाफ जाना चाहेगा। आखिरकार आर्थिक हित छोटी-मोटी चीज़ों से कहीं बढ़कर होते हैं।


जहाँ तक सीधे सैन्य समर्थन का प्रश्न है इस बार फ़्रांस खुलकर भारत को सैन्य समर्थन देने के पक्ष में नजर आता है। रफाल जैसे विमानों के अलावा दूसरी सहायता के लिए भी वो कह चुके हैं। जहाँ तक अमेरिका का प्रश्न है वहां तो कहने को कुछ रह नहीं जाता। अमरीकी सीनेटर रिक स्कॉट पहले ही भारत की तरह कम्युनिस्ट चीन के उत्पादों का बहिष्कार करने की बात कर चुके हैं। अब यूएस के सेक्रेट्री ऑफ़ स्टेट माइक ने भी चीनी एप्प को हटाये जाने को खुलकर समर्थन दे दिया है। जाहिर है ऐसे विश्वव्यापी फैसलों के दूरगामी नतीजे होने वाले हैं।


कुछ लोग इस बीच में ये कहने जरूर आ जाते हैं कि चीनी सामान के बिना ये नहीं चलेगा, वो नहीं चलेगा। ऐसे लोगों को 1975 में आई फिल्म “आक्रमण” का किशोर कुमार का गाया और आनंद बक्षी का लिखा “देखो वीर जवानों” वाला गाना एक बार सुनना चाहिए। उस गाने के एक वाक्य में कहा जा रहा होता है कि जब अँधा बेटा युद्ध के लिए निकलने लगा तो उसकी माँ उसे रोकना चाहती है। वो ये कहकर जाना चाहता था कि आखिर वो दुश्मन की एक गोली तो कम कर ही सकता है! शायद ये वाक्य पढ़-सुनकर ऐसे लोगों को समझ में आये कि देश के लिए सिर्फ वही नहीं लड़ रहा होता, जिसने बन्दूक उठा रखी है। ये सभी का दायित्व है और साम्राज्यवादियों से भागने की कोई जगह या कोई विकल्प नहीं है।


ताईवान के साथ ख़ास बात ये भी है कि दुनियां के कई देश उसे चीन के डर से देश ही नहीं मानते। भारत ने भी उसे कभी अधिकारिक तौर पर एक देश की तरह स्वीकार नहीं किया है। हाल ही में जब दूरदर्शन पर ताईवान से सम्बंधित कार्यक्रम दिखाया गया तो चीन ने अपनी आपत्ति दर्ज करवाई। दूरदर्शन ने एक कदम और आगे बढ़कर तिब्बत पर भी प्रोग्राम दिखा डाला। जब ऐसे मामले सामने आने लगते हैं तो समझ में आता है कि अंतर्राष्ट्रीय मामलों के बारे में भारत के आम लोगों की ही नहीं बल्कि खुद को तथाकथित ज्ञानी बताने वालों की समझ भी कितनी कम है। ऐसा इसलिए क्योंकि कुछ मासूम क्यूट किस्म के लोग चीन को गौतम बुद्ध से जोड़कर, किसी अज्ञात साझा संस्कृति की भी बात करने लगते हैं।


चीन में जो धर्म की तरह चलते हैं वो कन्फ्यूशियस या फिर ताओइज्म के सिद्धांत होते हैं। इनका बौद्ध दर्शन से कोसों दूर का सम्बन्ध है और राजाओं के काल से ही ये बौद्धों का दमन करते आ रहे हैं। ताओ सम्राट वूजोंग के काल में (845 में) कम से कम 4600 बौद्ध मंदिर तोड़ डाले गए थे और ढाई लाख से अधिक बौद्ध भिक्षुओं को वापस सामान्य जीवन यापन के लिए मजबूर किया गया था। राजशाही काल के चार बड़े बौद्ध धर्म के खिलाफ चले अभियानों में से ये एक माना जाता है। अगर बहुत हाल का दौर भी देखें तो जनरल बई चोंग्सी (मुस्लिम) ने 1926 में जिसे “नोर्दरन एक्सपेडीशन” कहा जाता है, उस दौरान बौद्धों को क़त्ल किया और उनके मंदिर-विहार तोड़े थे। अगर ऐसा कुछ नहीं होता तो बौद्ध दलाई लामा को भला भारत में शरण क्यों लेनी पड़ती?


बाकी भारत-चीन संबंधों की बात करें तो याद रखिये कि चीन के अट्ठारह देशों से सीमा विवाद जारी हैं। अपने आस-पास के देशों को हड़प जाने के लिए कुख्यात रहा देश कभी भी चैन से बैठेगा, या आपको बैठने देगा, इस मुगालते में हैं तो आपका भगवान ही मालिक है।

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