बाल कथा : प्रकृति और जीवन

12 अगस्त 2020   |  राकेश कुमार श्रीवास्तव   (430 बार पढ़ा जा चुका है)

प्रकृति और जीवन


विश्व के दो महाद्वीपों के कुछ हिस्सों में हाथियों का साम्राज्य है। एशिया महाद्वीप में ऍलिफ़स और उसके संतान मैक्सिमस, इन्डिकस और सुमात्रेनस का साम्राज्य है और अफ्रीका में लॉक्सोडॉण्टा और उसके संतान अफ़्रीकाना और साइक्लोटिस का।

गर्मियों के दिन शुरू होने वाले थे। मैक्सिमस, इन्डिकस और सुमात्रेनस ने अपने पिता से कहा, “आपने एक बार कहा था कि हमलोगों को आप अपने बड़े भाई के देश घुमाने ले चलेंगे। तो क्यों न इन गर्मियों की छुट्टियों में हम सभी अफ्रीका चलें?”

ऍलिफ़स ने कहा, “तो चलो! अगले महीने की एक तारीख को हमलोग अफ्रीका यात्रा पर चलेंगे, परन्तु अभी तुमलोगों की स्कूल में परीक्षा चल रही है, इसलिए तुमलोग पढ़ाई पर ध्यान दो।” और हिदायत देते हुए कहा कि परीक्षा के बाद ही यात्रा की तैयारी करनी है।

बच्चों ने भी अपने पिता जी के कथनानुसार कार्य किया और परीक्षा के बाद अफ्रीका जाने की तैयारी शुरू कर दी। समान को जब बैग में भर कर तैयार कर लिया, तो तीनों उस बैग को ख़ुशी-ख़ुशी अपने पिता जी को दिखाने गए। कुल चार बैग देखकर उसके पिता जी बोले, “तुमलोग तीन हो तो चौथा बैग किसका है?”

तीनों उत्साह में एक साथ बोले, “तीन छोटे बैग तो हमलोगों के हैं और सबसे बड़े बैग में सूंढ़ पर लगाने वाला एयर-फ़िल्टर मास्क और प्यूरिफाईड कम्प्रेसड एयर के सिलिंडर हैं।”

“अरे हाँ! मैं तुम्हें यह बताना तो भूल ही गया कि वहाँ, तुम्हारे इस चौथे बैग की जरूरत नहीं है, क्योंकि वहाँ का पर्यावरण बहुत स्वच्छ एवं स्वास्थ्य के लिए अच्छा है।”- उनके पिता जी ने कहा।

बच्चों को यह सुनकर आश्चर्य हुआ और उन्होंने अपने पिता जी से पूछा, “क्या दुनिया में ऐसी भी कोई जगह है, जहाँ हवा और पानी बिना फ़िल्टर के इस्तेमाल में लाया जा सके।”

ऍलिफ़स ने बच्चों से मुस्कुराते हुए कहा, “अब तो तुमलोग वहाँ जा ही रहे हो तो देख लेना। वैसे भी कहावत है कि हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े-लिखे को फ़ारसी क्या।”

बच्चे ख़ुशी-ख़ुशी अपने बड़े बैग को छोड़ कर अफ्रीका के लिए रवाना हो गए। हवाई यात्रा के दौरान बच्चे अफ्रीका के प्राकृतिक सौन्दर्य को देख मुग्ध हो रहे थे। दूध जैसी सफ़ेद बलखाती चौड़ी नदियाँ और हरे-भरे जंगल देख उन्हें लग रहा था कि वे किसी परियों के शहर में आ गए हैं। वे मन ही मन दुखी थे कि उनकी मातृभूमि में ऐसा प्राकृतिक नज़ारा क्यों नहीं है? और इसी बात की चर्चा उसने अपने पिता से की तो उन्होंने लंबी सांस लेते हुए कहा, “बच्चों! कभी हमलोगों की मातृभूमि पर भी इसी तरह का प्राकृतिक नज़ारा था, परन्तु हमारे पूर्वजों की प्रकृति के प्रति असंवेदनशीलता और हमारी विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति का शोषण इसका मुख्य वजह है। कई दशक पहले हमारी प्राकृतिक संपदा यहाँ से अधिक और मनोरम थी। कुछ दशक पहले यहाँ की स्थिति भी हमारे जैसी थी। मेरे यहाँ आने का एक कारण यह भी है कि इनलोगों के प्रयास एवं तकनीक को सीख कर, अपने यहाँ लागू कर अपनी प्राकृतिक संपदा को पुनर्जीवित कर पाऊं।” – इतना कह कर वे उदास हो गए।

लम्बी यात्रा के बाद जब साउथ अफ्रीका की राजधानी केप टाउन में उनका हवाई जहाज लैंड किया तो उनके चाचा लॉक्सोडॉण्टा और उसके भाई अफ़्रीकाना और साइक्लोटिस ने शाही अंदाज में उनका स्वागत किया। घर पहुँचने पर उनका स्वागत नाना प्रकार के फलों से हुआ। उदर तृप्ति हो जाने के बाद बच्चे नदी में खेलने चले गए। बच्चे सूंढ़ में पानी भर कर एक दूसरे के ऊपर फेंकने लगे। नदी में सभी बच्चों ने खूब उछल-कूद मचाई। जब मैक्सिमस, इन्डिकस और सुमात्रेनस थक गए, तब वे नदी से निकलने लगे, तभी उनके चचेरे भाइयों ने उन्हें रोका और कहा, “नदी में हम मस्ती करने के बाद सूंढ़ में पानी भर कर जंगल जाते हैं और वहाँ के छोटे-छोटे पौधों को पानी देकर ही घर वापस जाते हैं। इस नियम का पालन यहाँ के छोटे बच्चों से लेकर बड़े-बुजुर्ग तक करते हैं। और जंगल से लौटते वक्त, जरूरत के अनुसार फलों को प्यार से ऐसे तोड़ते है, जिससे पेड़ को कोई नुकसान न हो।”

पाँचों ख़ुशी-ख़ुशी जंगल गए, पौधों को पानी दिया और अपनी-अपनी पसंद का फल तोड़ कर घर वापस आ गए। रात का खाना खाने के बाद ऍलिफ़स और लॉक्सोडॉण्टा आपस में बात करने लगे। परिवार का हालचाल पूछने के बाद ऍलिफ़स ने कहा, “भैया! मैं यहाँ आपसे पर्यावरण को समृद्ध एवं स्वच्छ बनाने के लिए आपके द्वारा उपयोग में किए जाने वाली तकनीक के बारे में जानने आया हूँ।”

लॉक्सोडॉण्टा ने कहा, “देखो छोटे! तकनीक अपनी जगह है, परन्तु उससे पहले जो तुम्हारे पास प्राकृतिक संपदा है उसके दुरूपयोग को रोकना है।”

अभी दोनों भाइयों का वार्तालाप चल ही रहा था कि उनके बच्चे वहाँ आ गए। मैक्सिमस ने उत्सुकता से कहा, “बड़े पापा! आप सभी आकार में बड़े एवं शक्तिशाली कैसे हैं? और यहाँ का पर्यावरण, समृद्ध एवं स्वच्छ कैसे है? हमारे यहाँ तो नदी, नाले में बदल गई और हवा इतनी प्रदूषित है कि साँस लेने के लिए भी नाक में फ़िल्टर और साथ में ऑक्सीजन का सिलिंडर रखना पड़ता है।”

लॉक्सोडॉण्टा ने कहा, “आओ बच्चो आओ! तुम्हारे पिता जी भी मुझ से यही सवाल पूछ रहे थे।” थोड़ी देर चुप रहने के बाद वे गंभीर हो कर बोले, “यहाँ का नज़ारा अभी जो तुमलोग देख रहे हो, वह कुछ दशक पहले ऐसा नहीं था। जिसके कारण हमने अपने एक भाई ‘मैमथएवं एक बेटे ‘अडौरोरा’ की पीढ़ी को खो दिया और इसका मुख्य कारण था- प्राकृतिक संपदाओं का दुरूपयोग। वे लोग नदी का उपयोग स्नान, गर्मी से राहत पाने एवं प्यास बुझाने के लिए करते थे। यहाँ तक तो बात ठीक थी, परन्तु उस दौरान वे सूंढ़ में पानी भर कर आस-पास फेंक कर जल का दुरुयोग करते थे। जंगल में रहते हुए, वहाँ उत्पात मचाते थे। बे-वजह पेड़ों को तोड़ना, आवश्यकताओं से अधिक फलों को तोड़ कर उसे बर्बाद करना और विकास की अंधी दौड़ में प्राकृतिक संपदा के दोहन ने उनके अस्तित्व को मिटा दिया। उन्हीं से सबक लेते हुए, हमलोगों ने अपने दैनिक जीवन में प्रकृति के महत्व को समझते हुए उसकी देखभाल करनी शुरू की। ऐसे-ऐसे नियम बनाए जिससे पर्यावरण दूषित न हो और अधिक से अधिक पेड़ को सिंचित कर सकें। बरसात के पानी को सदुपयोग में लाने के लिए हमलोग रेन हार्वेस्टिंग तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। कार्बन फुटप्रिंट को कम किया। अन्य तकनीक की जानकारी मैं तुम्हारे पापा को दे दूँगा, अगर तुमलोग उनका सहयोग करोगे तो वह दिन दूर नहीं, जब हमलोग भी तुम्हारे घर आ कर अपने बच्चों के साथ छुटियाँ मनाएँगे।

ऍलिफ़स एक सप्ताह में सभी जानकारी इकठ्ठी कर बच्चों के साथ अपने देश लौट आया। उसने अपने समाज को पर्यावरण के प्रति जागरूक किया और इम्पोर्टेड तकनीक से पर्यावरण को संरक्षित एवं स्वच्छ बनाने लगा। उसके एवं बच्चों के अथक प्रयास से, दो दशक बाद उनके नाले जैसी नदी चौड़ी एवं स्वच्छ हो गई। जंगल में हरियाली छा गई और वह दिन भी आया, जब दो दशक बाद ऍलिफ़स के बच्चे बड़े होकर अपने बुजुर्ग बड़े पापा एवं अपने भाइयों का नई दिल्ली के एअरपोर्ट पर शाही अंदाज में इंतज़ार कर रहे थे।


(नोट- ऍलिफ़स, लॉक्सोडॉण्टा और मैमथ हाथियों की प्रजाति है। ऍलिफ़स की तीन जातियां मैक्सिमस, इन्डिकस और सुमात्रेनस तथा लॉक्सोडॉण्टा की तीन जातियां अडौरोरा, अफ़्रीकाना और और साइक्लोटिस हैं)


-----समाप्त----

© राकेश कुमार श्रीवास्तव 'राही'

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