किरायेदार

10 सितम्बर 2020   |  SURENDRA ARORA   (2110 बार पढ़ा जा चुका है)

लघुकथा


किरायेदार



" भैया ये छह पाईप हैं जो पास की दूकान पर ले चलने हैं , ले चलोगे ? " मैंने ई - रिक्शे वाले को रोककर कहा ।

" जी, ले चलेंगे । "

" बताओ किराया क्या लोगे ? "

" सत्तर रुपए लगेंगे ।"

" भैया , पचास लो । सत्तर का काम तो नहीं है । "

" ठीक है , पचास दे दीजिएगा ।"

" तो फिर लाद लो । "

वो अपने काम पर लग गया ।

" भैया ! संभाल कर लादो , वरना इन पाइपों का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा , अलबत्ता तुम्हारे रिक्शा की गद्दी जरूर छिल जाएगी तब तुम्हें मरम्मत में पैसे खर्च करने पड़ेंगे ......देखो छिल गई न ! "

" लग तो रहा है कि छिल गई है ।"

" रिक्शा तुम्हारी अपनी है या किराए पर लेते हो ? " मैं उसकी लापरवाही पर झल्लाया ।

" बाबू? यहां अपना क्या है ? जिंदगी हो या फिर उससे जुड़ा ये शरीर , सभी कुछ तो किराए का ही है । " कहकर वो उधड़ी हुई रेक्सीन पर हाथ फेरने लगा ।

वो अजीब सी नज़रों से मुझे देख रहा था और मुझमें अब उससे कुछ भी पूछने या कहने की हिम्मत नहीं थी ।



सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा

साहिबाबाद ।

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