जीवित हो अगर, तो जियो जीभरकर...

जीवित हो अगर, तो जियो जीभरकर...जीते तो सभी हैं पर सभी का जीवन जीना सार्थक नहीं है। कुछ लोग तो जिये जा रहे हैं बस यों ही… उन्हें खुद को नहीं पता है कि वे क्यों जी रहे हैं? क्या उनका जीवन जीना सही मायनें में जीवन है। आओ सबसे पहले हम जीवन को समझे और इसकी आवश्यकता को। जिससे कि हम कह सकें कि जीवित हो अगर



तनाव मुक्त जीवन ही श्रेष्ठ है……

तनाव मुक्त जीवन ही श्रेष्ठ है……आए दिन हमें लोंगों की शिकायतें सुनने को मिलती है….... लोग प्रायः दुःखी होते हैं। वे उन चीजों के लिए दुःखी होते हैं जो कभी उनकी थी ही नहीं या यूँ कहें कि जिस पर उसका अधिकार नहीं है, जो उसके वश में नहीं है। कहने का मतलब यह है कि मनुष्य की आवश्यकतायें असीम हैं….… क्योंकि



क्या मृत्यु से डरना चाहिए……?

क्या मृत्यु से डरना चाहिए……?अगर हम बात मृत्यु की करते हैं तो अनायास आँखों के सामने किसी देखे हुए मृतक व्यक्ति के शव का चित्र उभरकर आ जाता है। मन भी न चाहते हुए शोकाकुल हो उठता है। आखिर ऐसी मनस्थिति के पीछे क्या वजह हो सकती है…? जबकि आज के परिवेश में घर के अंदर भी हमें दिन में ही ऐसी लाशों को देखने क



क्या कहेंगें आप...?

क्या कहेंगें आप...?हम सभी जानते हैं कि प्रकृति परिवर्तनशील है। अनिश्चितता ही निश्चित, अटल सत्य और शाश्वत है बाकी सब मिथ्या है। बिल्कुल सच है, हमें यही बताया जाता है हमनें आजतक यही सीखा है। तो मानव जीवन का परिवर्तनशील होना सहज और लाज़मी है। जीवन प्रकृति से अछूता कैसे रह सकता है…? जीवन भी परिवर्तनशील ह



मानव जीवन क्या है...

जीवन क्या है..? या मृत्यु क्या है..? क्या कभी आपने इसे समझने की चेष्टा की है..? नहीं, जरूरत ही नहीं पड़ी। मनुष्य ऐसा ही है.. तो क्या सोच गलत है...जी बिल्कुल नहीं, ये तो मनुष्यगत स्वभाव है। जरा उनके बारे में सोचिए जिन्होंने हमें ज्ञान की बाते



गुरु वन्दना

मेरे समस्त स्नेही पाठकवृन्द को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं --- तुम कृपासिन्धु विशाल , गुरुवर ! मैं अज्ञानी , मूढ़ , वाचाल गुरूवर ! पाकर आत्मज्ञान बिसराया .छल गयी मुझको जग की माया ;मिथ्यासक्ति में डूब -डूब हुआ अंतर्मन बेहाल , गुरुवर ! तुम्हारी कृपा का अवलंबन , पाया अ



अर्ध रात्रि

🌹🌹🌹🌺मध्य रात्रि 🌺🌹🌹🌹 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺प्रचण्ड एषणा हृदय में, मन मैंने बनाया है।एक विराट शुभ विचार मन में समाहृत है।।भव्य स्वर्णिम मण्डप स्वप्न में हटात् आ दिखता है।विशाल स्तंभ केन्द्र में- बहुआयामिय आलोकित है।।भिन्न-भिन्न अद्भुत आकृतियाँ यत्र-तत्र दृष्टिगोचर हैं।।सदाशिव महादेव-त्रिनेत



हमारा शरीर एवं ब्रह्मांड :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म के सद्ग्रन्थों एवं ऋषि - महर्षियों के विचारों में एक तथ्य एवं दिशा निर्देश प्रमुखता से प्राप्त होता रहा है कि मनुष्य जीवन पाकर के सबसे पहले मनुष्य को स्वयं के विषय में जानने का प्रयास करना चाहिए | क्योंकि जब तक मनुष्य स्वयं को नहीं जान पाएगा तब तक वह ब्रह्मांड को जानने का कितना भी प्रया



देवाधिदेव

★★★★★देवाधिदेव ★★★★★"परम पुरुष" के बाहर कुछ भी नहीं।वे हीं देव हैं जो ब्रह्माण्डीय कार्यकीके कारण हैं। ब्रह्म रंध्र वा विश्व नाभिसे उत्सर्जित अभिव्यक्त महापँचभूत तरंगें हीं देवता हैं जो देव स्वरूपपरम पुरुष की सृष्टि नियंत्रित करते हैं।यहीं महाशक्ति ब्रह्माण्ड के अनवरतताण्डव का कारण है जिसक



गणपति बप्पा मोरिया

कथा गणपति बप्पा मोरिया की🕉️ 🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️गणपति-बप्पा-मोरिया की प्रतिमायें सुशोभित हैं।गणेश कथा सुन, भक्त आह्लादित प्रफुल्लित हैं।।आएं आज- 'पंद्रह हजार वर्ष' पुर्व हम चलते हैं।पर्वतों पर बसे ऋषियों की चर्चा आज करते हैं।।"ऋषि कुल" को ऋग्वेद में "गोष्ठी" कहा करते थे।'"गोष्ठी" के श्रेष्टतम्



मन का निग्रह :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धराधाम पर मनुष्य सभी प्राणियों पर आधिपत्य करने वाला महाराजा है , और मनुष्य पर आधिपत्य करता है उसका मन क्योंकि मन हमारी इंद्रियों का राजा है | उसी के आदेश को इंद्रियां मानती हैं , आंखें रूप-अरूप को देखती हैं | वे मन को बताती हैं और मनुष्य उसी के अनुसार आचरण करने लगता है | कहने का आशय यह है कि समस



पिता

💖💖💖पिता💖💖💖एषणाओं के भंवरजाल मेंउलझ व्यर्थ हीं,व्यथित हो इहजगत् कोन बँधु झुठलाओ।तुममें है हुनर एवम्है अदम्य सामर्थ्य,अजपाजप गह'सबका मालिक एककह नित महोत्सव मनाओ।।हर साल "फादर्स डे" मना एक दिन३६४ भूल जाते आखिर क्यों (?) तुम!"पित्रि यज्ञ महामंत्र" नित्य उचर कर,आशीर्वाद भरपूर बटोर करसदगति रे मन पा



मृत्यु:---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*परमपिता परमात्मा ने इस समस्त सृष्टि में जीवों की रचना की , जीवन देने के बाद जीवात्मा को एक निश्चित समय के लिए इस पृथ्वी लोक पर भेजा | जिस जीवात्मा का समय पूर्ण हो जाता है वह किसी न किसी बहाने से इस धरा धाम का त्याग कर देता है | नश्वर श



प्रेम

भगवान् "प्रेम" का हीं दुजा नाम है।न वो मूरत में या फिर मकान में है।।उसे चाहते हो बँधु गर तुम पाना,प्रेम का रास्ता बहुत हीं आसान है।अंतरजगत में तीर्थाटन जो करता,वही साघक सिद्ध और महान है।।🙏 🙏 🙏निर्मल🙏 🙏 🙏🙏👣ह👣रि👣प👣द👣🙏



शुद्ध स्वर

बांस की डाल चुन गुहा बनाईसात छिद्र कर होठों से लगाईसा-रे-ग-म-प-ध-नी★ सुर से हटी तन्हाईप्रिय बाँसुरिया तक राधा के हाथों में थमाईतंत्र साधना की जटिल गुत्थी सहज सुलझाईपर राधा थी कि बस कृष्ण नाम की रट लगाईनिर्मल★संगीत के सात शुद्धस्वर:---षड्ज (सा)ऋषभ (रे)गंधार (ग)मध्यम (म)पंचम (प)धैवत (ध)निषाद (नी)स्वर



महाशिवरात्रि

★★★★★शिवरात्रि के शुभ अवसर पर★★★★★★शिव का रहस्यमयी एवम् गौरवमयी इतिहास★2020 ई. में 21 फरवरी को यह शुभ दिन आ रहा है।ऋग्वेद लगभग 15 (पंद्रह) हजार वर्ष पूर्व रचित होना प्रारम्भ हुआ था। अनुमानतः सात हजार वर्ष पूर्व प्रथम महासंभुति तारक ब्रह्म भगवान शिव इस धरा धाम पर मानव के रूप में अवतरित हुए थे।वह समय



मौनी अमावस्या :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव शरीर ईश्वर की विचित्र रचना है , इस शरीर को पा करके भी जो इसके महत्व को न जान पाये उसका जीवन निरर्थक ही है | मानव शरीर में वैसे तो प्रत्येक अंग - उपांग महत्वपूर्ण हैं परंतु सबसे महत्वपूर्ण है मनुष्य की वाणी | वाणी के विषय में जानना बहुत ही आवश्यक है , प्राय: लोग बोले जाने वाली भाषा को ही वाणी म



मनुष्य के वास्तविक बंधु - बांधव :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरा धाम पर मनुष्य माता के गर्भ से जन्म लेता है उसके बाद वह सबसे पहले अपने माता के द्वारा अपने पिता को जानता है , फिर धीरे-धीरे वह बड़ा होता है अपने भाई बंधुओं को जानता है | जब वह बाहर निकलता है तो उसके अनेकों मित्र बनते हैं , फिर एक समय ऐसा आता है जब उसका विवाह हो जाता है और वह अपने पत्नी से पर



मेरा अपना

सुबह हो या फिर शाम होलबों पे बस तेरा नाम होहर काम में हम साथ होसपनों के तुम राजदार होलोगबाग तुझे भले महाकौल कहें,तुम बस एक मेरे श्याम होडॉ. कवि कुमार निर्मल



शंखनाद्

शंखनाद्शुभदिन आज भी आह्लादित कर जाएगापरम अराध्य का सामिप्य मन पा जाएगाप्रचण्ठ तृष्णा- सानिध्य की एषणा गहराई,सद्गुरु कृपा से सांजुज्य पा यह भक्त तर जाएगामैली चादर मन की धुल, आभा से भर जाएगाडॉ. कवि कुमार निर्मल



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