कलुषित अन्त:करण का परिणाम भोगना ही पड़ता है :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में मनुष्य अनेकों प्रकार के कर्म करके अपने कर्मों के अनुसार फल प्राप्त करता रहता है | मनुष्य जाने अनजाने में कृत्य - कुकृत्य किया करता है | कभी-कभी तो अपराधी अपराध करने के बाद भी दंड नहीं पाता तो उसको यह नहीं सोचना चाहिए कि वह पूर्णतया दण्ड से मुक्त हो गया है क्योंकि एक दिन सबको ही यह संस



नशेमन

निर्माण नशेमन का नित करती, वह नन्हीं चिड़िया ज़िद करती। तिनके अब बहुत दूर-दूर मिलते, मोहब्बत के नक़्श-ए-क़दम नहीं मिलते।ख़ामोशियों में डूबी चिड़िया उदास नहीं, दरिया-ए-ग़म का किनारा भी पास नहीं। दिल में ख़लिश ता-उम्र सब्र का साथ लिये, गुज़रना है ख़ामोशी से हाथ में हाथ लिये। शजर



आसक्ति :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में जन्म लेने के बाद मनुष्य माया में लिप्त हो जाता है और इसी के वशीभूत होकर वह सांसारिक जीवों , पदार्थों के आसक्ति में डूब जाता है | किसी भी प्राणी या वस्तु के विषय में दिन रात सोंचते रहना एवं उसे प्राप्त ही कर लेने कामना , या पहले से उपलब्ध वस्तु को कभी भी न छोड़ने का भाव ही आसक्ति कहा गय



माया क्या है :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*यह समस्त संसार मायामय है | संसार में अवतीर्ण जड़ चेतन एवं जितनी भी सृष्टि है सब माया ही है | माया को भगवान की शक्ति एवं दासी कहा गया है | जिस प्रकार एक सिक्के के दो पहलू होते हैं एक ओर देखो तो दूसरा अदृश्य हो जाता है ठीक उसी प्रकार ब्रह्म एवं माया सिक्के के दो पहलू हैं जब मनुष्य माया में लिप्त हो



आंतरिक प्रकृति एवं पर्यावरण :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*परमात्मा ने पंचतत्त्वों के संयोग से सुंदर प्रकृति की रचना की | धरती , आकाश , जल , अग्नि एवं वायु को मिलाकर सुंदर प्रकृति का निर्माण किया फिर इन्हीं पंचतत्त्वों को मिलाकर मनुष्य की रचना की इसीलिए मनुष्य को प्रकृति का अभिन्न अंग कहा गया है | धरती पर दिखने वाली प्रकृति एवं पर्यावरण वैसे तो बहुत सुंदर



महामृत्युंजय मंत्र कितना प्रभावशाली है ? आइये समझें....

भगवान श्री शिवशंकर की अराधना में महामृत्युंजय जाप एककाफी पवित्र मंत्र माना जाता है जिसे हमारे बुजुर्गों द्वारा प्राण रक्षक मंत्रकहा जाता है। इस मंत्र की उत्पत्ति सबसे पहले महाऋषि मार्कंडय जी ने की। Mahmrityunjay Mantra का जाप करनेसे शिव जी को प्रसन्न करने की शक्ति मिलती है। Mahamrityunjay Mantra in



शारीरिक मोह ;---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में जन्म लेने के बाद मनुष्य मोह - माया में लिप्त हो जाता है | कहा जाता है कि अनेकों महापुरुषों ने मोह - माया पर विजय भी प्राप्त किया है परंतु यदि सूक्ष्मदृष्टि से देखा जाय तो इस मोह से कोई बच ही नहीं पाया है | सबसे बड़ा मोह है अपने शरीर का मोह ! मनुष्य जीवन भर पवित्र एवं अपवित्र के बीच झूल



दु:खालय है यह संसार :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*चौरासी लाख योनियों में सर्वश्रेष्ठ मानव योनि कहीं गई है | मनुष्य इस संसार में आकर सर्वत्र सुख की कामना करता है , परंतु उसको जीवन भर सुख की प्राप्ति नहीं हो पाती है , क्योंकि इस संसार को "दु:खालय" कहा गया जिसका अर्थ होता है दुख का घर | इस संसार को दु:खालय क्यों कहा गया इसका कारण यह है कि जीव जब मां



दृढ़ संकल्प :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

दृढ़ संकल्प इस धरा धाम पर मानवयोनि में जन्म लेने के बाद मनुष्य जीवन में अनेकों कार्य संपन्न करना चाहता , इसके लिए मनुष्य कार्य को प्रारंभ भी करता है परंतु अपने लक्ष्य तक कुछ ही लोग पहुंच पाते हैं | इसका कारण मनुष्य में अदम्य उत्साह एवं अपने कार्य के प्रति निरंतरता तथा सतत प्रयास का अभाव होना ही कहा



आत्ममुग्धता :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

आत्ममुग्धता इस धराधाम पर जन्म लेने के बाद मनुष्य अनेक प्रकार के शत्रुओं एवं मित्रों से घिर जाता है इसमें से कुछ सांसारिक शत्रु एवं मित्र होते हैं तो कुछ आंतरिक | आंतरिक शत्रुओं में जहाँ हमारे शास्त्रों ने काम , क्रोध , मद , लोभ आदि को मनुष्य का शत्रु कहा गया है वहीं शास्त्रों में वर्णित षडरिपुओं के



जिंदगी जीने की कला : आचार्य अर्जुन तिवारी

अर्जुन तिवारी जी के द्वारा jeevan jeene ki kala *इस संसार में मानव जीवन को सर्वश्रेष्ठ एवं अलौकिक कहा गया है | चौरासी लाख योनियों में मानव जीवन सर्वश्रेष्ठ इसलिए है क्योंकि यह वह कल्पवृक्ष है जिसके माध्यम से मनुष्य कुछ भी प्राप्त कर सकता है | मानव जीवन वह पवित्र क्षेत्र है जिसमें ईश्वर ने सृष्टि की



कर्म और भाग्य :- आचार्य अर्जुन तिवारी

सनातन धर्म में कर्म ही प्रधान कर्म एवं भाग्य पर प्राय: चर्चा हुआ करती है | कर्म बड़ा या भाग्य ? यह विषय आदिकाल से प्राय:सबके ही मस्तिष्क में घूमा करता है | Sanatana Dharma के धर्मग्रंथों वेद , पुराण , उपनिषद एवं गीता आदि में कर्म को ही कर्तव्य मानकर इसी की प्रधानता प्रतिपादित की गयी है | कर्म को ह



कर्म की प्रधानता :-- आचार्य श्री अर्जुन तिवारी

कर्म की प्रधानता*सनातन धर्म में सदैव से कर्म को ही प्रधान माना गया है एवं अनासक्त होकर कर्मेंद्रियों से कर्मयोग का आचरण करने वाले पुरुषों को श्रेष्ठ पुरुष कहा गया है और यही karma meaning है| अपने द्वारा किए गए कर्म के आधार पर ही जीव की अगली योनियों का निर्धारण होता है | मनुष्य अपने कर्मों का भाग्



सनातन धर्म की विशालता :--- आचार्य श्री अर्जुन तिवारी जी

*सनातन धर्म में चौरासी लाख योनियों का वर्णन मिलता है | देव , दानव , मानव , प्रेत , पितर , गन्धर्व , यक्ष , किन्नर , नाग आदि के अतिरिक्त भी जलचर , थलचर , नभचर आदि का वर्णन मिलता है | हमारे इतिहास - पुराणों में स्थान - स्थान पर इनका विस्तृत वर्णन भी है | आदिकाल से ही सनातन के अनुयायिओं के साथ ही सनातन



भूत और प्रेत : आचार्य श्री अर्जुन तिवारी जी

*सनातन धर्म में चौरासी लाख योनियों का वर्णन मिलता है | देव , दानव , मानव , प्रेत , पितर , गन्धर्व , यक्ष , किन्नर , नाग आदि के अतिरिक्त भी जलचर , थलचर , नभचर आदि का वर्णन मिलता है | हमारे इतिहास - पुराणों में स्थान - स्थान पर इनका विस्तृत वर्णन भी है | आदिकाल से ही सनातन के अनुयायिओं के साथ ही सनातन



जीवन के अध्याय पढ़कर देखें अच्छा लगेगा

जीवन के अध्याय जिन्दगी में हर पल एक नई चुनौतियों को लेकर आता हैं,जो असमान संघर्षो से भरा होता हैं.इस पल को सामने पाकर कोई सोचने लगता हैं कि शायद मेरे जीवन में नया चमत्कार होने वाला हैं.अर्थात् सभी के मन में चमत्कार की आशा पैदा होने लगती हैं.चुनौतियां जो इंसानी जीवन क



नश्वर और अनश्वर :--- आचार्य श्री अर्जुन तिवारी जी

नश्वर और अनश्वर *सृष्टि के आदिकाल से लेकर आज तक अनेकानेक जीव इस पृथ्वी पर अपने कर्मानुसार आये विकास किये और एक निश्चित अवधि के बाद इस धराधाम से चले भी गये | श्री राम , श्रीकृष्ण , हों या बुद्ध एवं महावीर जैसे महापुरुष इस विकास एवं विनाश (मृत्यु) से कोई भी नहीं बच पाया है | इसका मूल कारण यह है कि



सच्चरित्रता हमें क्या सीखाती हैं?

सच्चरित्रता का मतलब- सत और चरित्र इन दो शब्दों के मेल से सच्चरित्र शब्द बना हैं तथा इस शब्द में ता प्रत्यय लगने से सच्चरित्रता शब्द की उत्पत्ति हुई हैं. सत का अर्थ होता हैं अच्छा एवं चरित्र का तात्पर्य हैं आचरण, चाल चलन, स्वभाव, गुण ध



सच्ची पुकार :-आचार्य श्री अर्जुन तिवारी जी

एक सच्ची पुकार - *ईश्वर की अनुकम्पा से अपने कर्मानुसार अनेकानेक योनियों में भ्रमण करते हुए जीव मानवयोनि को प्राप्त करता है | आठ - नौ महीने माँ के उदर में रहकर जीव भगवान के दर्शन करता रहता है और उनसे प्रार्थना किया करता है कि :-हे भगवन ! हमें यहाँ से निकालो मैं पृथ्वी पर पहुँचकर आपका भजन करूँगा | ई



अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्मं शुभा शुभम् ;- आचार्य श्री अर्जुन तिवारी जी के बोल

संसार में कर्म ही प्रधान कर्मानुसार ही मनुष्य को सुख - दुख , मृत्यु - मोक्ष आदि प्राप्त होते हैं | कर्म की प्रधानता यहाँ तक है कि जीव को अगला जन्म किस योनि में लेना है यह भी उसके कर्म ही निर्धारित करते हैं | यद्यपि सभी जीवों को अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है परंतु इन सबसे ऊपर एक परमसत्ता है द



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