मनुष्य के वास्तविक बंधु - बांधव :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरा धाम पर मनुष्य माता के गर्भ से जन्म लेता है उसके बाद वह सबसे पहले अपने माता के द्वारा अपने पिता को जानता है , फिर धीरे-धीरे वह बड़ा होता है अपने भाई बंधुओं को जानता है | जब वह बाहर निकलता है तो उसके अनेकों मित्र बनते हैं , फिर एक समय ऐसा आता है जब उसका विवाह हो जाता है और वह अपने पत्नी से पर



मेरा अपना

सुबह हो या फिर शाम होलबों पे बस तेरा नाम होहर काम में हम साथ होसपनों के तुम राजदार होलोगबाग तुझे भले महाकौल कहें,तुम बस एक मेरे श्याम होडॉ. कवि कुमार निर्मल



शंखनाद्

शंखनाद्शुभदिन आज भी आह्लादित कर जाएगापरम अराध्य का सामिप्य मन पा जाएगाप्रचण्ठ तृष्णा- सानिध्य की एषणा गहराई,सद्गुरु कृपा से सांजुज्य पा यह भक्त तर जाएगामैली चादर मन की धुल, आभा से भर जाएगाडॉ. कवि कुमार निर्मल



मेरी जिद्द

"मेरी जिद्द"जिद्द है- मन बनाया है- तुझे पाउँगादिल के एक कोने में छुपा- बिठाउँगागुफ़्तगू में लम्बी रातें- मैं बिताउँगासिकवा-शिकायत रोज सुलझाउँगाखासमखास बन- मयपन मिटाउँगातुझसे आया- तुझमें समा जाउँगाजिद्द है- मन बनाया है- तुझे पाउँगादिल के एक कोने में छुपा- बिठाउँगाडॉ. कवि कुमार निर्मल



अध्यात्मवाद्

⚜️⚜️⚜️🔱⚜️⚜️⚜️''नव चक्रों'' का गूढ़ रहस्यजब मानव समझ पाएगा।अनादि - अनंत परम - सत्ता लख आह्लादित हो जाएगा।।"ब्रह्म" है सत्य"- शास्रोक्तिजगत् को ''सापेक्षिक सत्य''समझ प्रेम सुधा बरसायेगा।पाप-पुण्य का अंतर जानमुक्ति-मोक्ष सहज पायेगा।।⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️डॉ. कवि कुमार निर्मल



धार्मिक विश्वास और त्याग भावना

धार्मिक विश्वास और त्याग भावना हम प्रायः दो शब्द साथ साथ सुनते हैं– संस्कृति और धर्म | संस्कृति अपने सामान्य अर्थ में एक व्यवस्था का मार्ग है, औरधर्म इस मार्ग का पथ प्रदर्शक, प्रकाश नियामक एवं समन्वयकारी सिद्धान्त है | अतःधर्म वह प्रयोग है जिसके द्वारा संस्कृति को जाना जा सकता है | भारत में आदिकाल स



अध्यात्म

अध्यात्मपरक मन:चिकित्सामनःचिकित्सक अनेक बार अपने रोगियों के साथ सम्मोहन आदि कीक्रिया करते हैं | भगवान को भी अपने एक मरीज़ अर्जुन के मन का विभ्रम दूर करकेउन्हें युद्ध के लिये प्रेरित करना था | अतः जब जब अर्जुन भ्रमित होते – उनके मनमें कोई शंका उत्पन्न होती – भगवान कोई न कोई झटका उन्हें दे देते | यही क



अध्यात्म और मनश्चिकित्सा

अध्यात्म और मनश्चिकित्साअर्जुन ने जब दोनों सेनाओं में अपने ही प्रियजनों को आमनेसामने खड़े देखा तो उनकी मृत्यु से भयाक्रान्त हो श्री कृष्ण की शरण पहुँचे “शिष्यस्तेऽहंशाधि मां त्वां प्रपन्नम् |” तब भगवान ने सर्वप्रथम एक कुशल वैद्य औरमनोवैज्ञानिक की भाँति उनके मन से मृत्यु का भय दूर किया | मृत्यु को अवश



मानव जीवन की गरिमा :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*चौरासी लाख योनियों में मानव जीवन को देव दुर्लभ कहा गया है | मनुष्य जन्म बड़े भाग्य से मिलता है क्योंकि मनुष्य को छोड़कर अन्य सभी योनियाँ भोग योनि होती हैं | इस संसार में दो प्रकार की योनियों का वर्णन मिलता है एक भोगयोनि दूसरी कर्मियोनि | मनुष्य के अतिरिक्त अन्य योनियों को भोग योनि कहा गया है क्योंक



मृत्यु का भय :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*परमात्मा की बनाई यह सृष्टि निरन्तर क्षरणशील है | एक दिन सबका ही अन्त निश्चित है | सृष्टि का विकास हुआ तो एक दिन महाप्रलय के रूप में इसका विनाश भी हो जाना है , सूर्य प्रात:काल उदय होता है तो एक निश्चित समय पर अस्त भी हो जाता है | उसी प्रकार इस सृष्टि में जितने भी जड़



ध्यान के लिए स्वयं को तैयार करना

ध्यानऔर इसका अभ्यासध्यान के लिए स्वयं को तैयार करना :ध्यान के अभ्यास के लिए आपने अपने लिएउचित स्थान और अनुकूल समय का निर्धारण कर लिया तो समय की नियमितता भी हो जाएगी |अब आपको स्वयं को तैयार करना है ध्यान के अभ्यास के लिए | इस विषय में क्रमबद्धरूप से तैयारी करनी होगी | इसी क्रम में...प्रथम चरण – ध्यान



साधक कैसे बनें :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻 *इस धरती पर अनेकों जीव विचरण कर रहे हैं इनमें सर्वश्रेष्ठ प्राणी मनुष्य को कहा गया है | चौरासी लाख योनियों में सर्वश्रेष्ठ मानव योनि कही गई है | साधारण से दिखने वाले मनुष्य में इतनी शक



भरहिं निरन्तर होंहिं न पूरे :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में मनुष्य ने अपनी कार्यकुशलता से अनहोनी को भी होनी करके दिखाया है | अपनी समझ से कोई भी ऐसा कार्य न बचा होगा जो मनुष्य ने कपने का प्रयास न किया हो | संसार में समय के साथ बड़े से बड़े घाव , गहरे से गहरे गड्ढे भी भर जाते हैं | समुद्र के विषय में बाबा गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानस में लिखा है



मन की साधना :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*भारतीय परंपरा में आदिकाल से एक शब्द प्रचलन में रहा है साधना | हमारे महापुरूषों ने अपने जीवन काल में अनेकों प्रकार की साधनायें की हैं | अनेकों प्रकार की साधनाएं हमारे भारतीय सनातन के धर्म ग्रंथों में वर्णित है | यंत्र साधना , मंत्र साधना आदि इनका उदाहरण कही जा सकती हैं | यह साधना आखिर क्या है ? किस



मन पर नियंत्रण :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धराधाम पर परमात्मा द्वारा सृजित सभी प्रकार के जड़ - चेतन में सबसे शक्तिशाली मनुष्स ही है | सब पर विजय प्राप्त कर लेने वाला मनुष्य किसी से पराजित होता है तो वह उसका स्वयं का मन है जो उसको ऐसे निर्णय व कार्य करने के लिए विवश कर देता है जो कि वह कभी भी करना पसंद नहीं करता | कभी - कभी तो मन के बहकाव



मानव शरीर में त्रिदेव :;-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*प्रत्येक शरीर में एक आत्मा निवास करती है जिस प्रकार भगवान शिव के हाथ में सुशोभित त्रिशूल में ती शूल होते हैं उसी प्रकार आत्मा की तुलना भी एक त्रिशूल से की जा सकती है, जिसमें तीन भाग होते हैं- मन, बुद्धि और संस्कार | इनको त्रिदेव भी कहा जा सकता है | मन सृजनकर्ता ब्रह्मा , बुद्धि संहारकारी शिव तथा सं



मन का उपादान :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में मनुष्य एक चेतन प्राणी है , उसके सारे क्रियाकलाप में चैतन्यता स्पष्ट दिखाई पड़ती है | मनुष्य को चैतन्य रखने में मनुष्य के मन का महत्वपूर्ण स्थान है | मनुष्य का यह मन एक तरफ तो ज्ञान का भंडार है वहीं दूसरी ओर अंधकार का गहरा समुद्र भी कहा जा सकता है | मन के अनेक क्रियाकलापों में सबसे महत्



मन की अवस्था :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में समस्त जड़ - चेतन को संचालित करने वाला परमात्मा है तो मनुष्य को क्रियान्वित करने वाला है मनुष्य का मन | मनुष्य का मन स्वचालित होता है और मौसम , खान - पान , परिस्थिति एवं आसपास घट रही घटनाओं के अनुसार परिवर्तित होता रहता है | जिस प्रकार मनुष्य के जीवन में बचपन , जवानी एवं बुढ़ापा रूपी ती



धनतेरस की धनवंतरी जयंती!

धनवंतरी आयुर्वेदाचार्य मृत्युंजीवि औषधि आजीवन बाँटे।आज हम भौतिकता मे लिपट24 कैरेट का खालिस सोना चाटें।।मृत्युदेव तन की हर कोषिका-उतक में शांत छुपा सोया है।मन जीर्ण तन से ऊब कर देखोनूतन भ्रूण खोज रहा है।।लक्ष्मी अँधेरी रात्रि देख आदीपकों की माला सजवाती है।गरीब के झोपड़ में चुल्हे मेंलकड़ी भी नहीं जल प



अध्यात्म

स्वप्न की गहराई में देखा कितुम मेरे बारे में सोच रहे हो!🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️ओ’ मेरे परम प्रिय,ओ’ परम पुरुष! तुम्हारी कृपा सेमैंने अपनी प्रगाढ़ निद्रा की गहराई में देखा कितुम मेरे बारे में सोच रहे हो!हे मेरे परम अराध्य!तुम सचमुच कितने कृपालु हो!! अब तक मैं तुम्हारीप्राप्ति हेतु तरस रहा था!अपने आप को तुम



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