"दोहा"

बुरा न मानों होली है.....रंग गुलाल रंगोली है....... होली होली सब कहें, होली किसके साथ हाथी चली न सायकल, रास न आया हाथ।।-1 कमल खिला बेपात का, चारो ओर विकास केशरिया मन भा गया, चौथेपन सन्यास।।-2 जनता कबतक देखती, तेरा मेरा खेल मान लिया धन एक है, नौ नौ गिनती फेल।।-3 सम्प्रदाय किसको कहें, किसको कहें



“दोहा-मुक्तक”

“दोहा-मुक्तक” घिरी हुई है कालिमा, अमावसी यह रात क्षीण हुई है चाँदनी, उम्मीदी सौगातहाथ उठाकर दौड़ता, देख लिया मन चाँद आशा में जीवन पला, पल दो पल की बात॥ महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



“फागुनी दोहा”

“फागुनी दोहा” रंग भरी पिचकारियाँ, लिपटे अधर अबीर गोरी गाए फागुनी, गलियाँ क़हत कबीर॥ फागुन आई हर्षिता, मद भरि गई समीर नैना मतवाले हुए, छैला हुए अधीर॥ नाचे गाए लखि सखी, वन में ढ़ेल मयूर लाली परसा की खिली, मीठी हुई खजूर॥ फगुनाई गाओं सखी, मीठे मदन नजीर आज चली र



“दोहा मुक्तक”

“दोहा मुक्तक” माँ माँ कहते सीखता, बच्चा ज्ञान अपार माँ की अंगुली पावनी, बचपन का आधार आँचल माँ का सर्वदा, छाया जस आकाश माँ की ममता सादगी, पोषक उच्च बिचार॥-1 माँ बिन सूना सा लगे, हर रिश्तों का प्यार थपकी में उल्लासिता, गुस्सा करे दुलार करुणा की देवी जयी, चाहत सुत



"दोहा"

"दोहा" अपनापन मन का मिलन, दिल तिल रसना चाह मीठा गुड़ मीठे वचन, मीठी लगती वाह ।।-1 मकर खिचड़िया चित बसी, सादी दही मिलाय अमृत पावन संक्रांति, हर हर गंग नहाय।।-2 ख़ुशी ख़ुशी आशीष दें, शुभकामना अनेक यज्ञोपवीत पिताम्बरी, धारण करें विवेक।।-3 जय हो जय हो जायका, दान मान सम्मा



“दोहा”

“दोहा” भौंरा घूमे बाग में, खिलते डाली फूल कुदरत की ये वानगी, माली के अनुकूल॥ उड़ने दो इनको सखे, पलती भीतर चाह पंखुड़ियों में कैद ये, इनके मुँह कब आह॥ महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



दोहा”

दोहा” कल चुनाव आयोग ने, कही न्याय की बात दो हजार तक ही रहे, चंदे की औकात॥-1 इस पर चर्चा कीजिये, मंशा रखिए साफ आम जनों की यातना, कौन करेगा माफ॥-2 संविधान देता नहीं, कभी अनैतिक छूट चंदा रहम गरीब को, यह कैसी है लूट॥-3 किसी बहाने ले लिया, जनता का ही नोट भरी तिजोरी खुल गई, फिर जनता से



“दोहा”

“दोहा” आर पार की खेलते, शेष रही जो खेल लुक्का छिप्पी हो गयी, मन में पाके मैल॥ सौ सुनार की ठुकठुकी, इक लुहार का छैल आभा आभूषण घटे, फलित नहीं यह गैल॥ देख नमूना आँख से, आर पार का सार,तहस नहस किसका हुआ, चाल हुई बेकार।। बदले में जलते रहे, तेरे भी घर बार मंशा न नापाक करो, कायर



“दोहा”

“दोहा” आर पार की खेलते, शेष रही जो खेल लुक्का छिप्पी हो गई, मन में लाये मैल॥ सौ सुनार की ठुकठुकी, इक लुहार के हाथ आभा आभूषण घटे, फलित नहीं यह साथ॥ महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



दोहा

दोहा मन में ऐसी लालसा, मिलना हो हर रोज समय नहीं मिलता सखे, ए टी एम की खोज।। होने देती है नहीं, पहर हमारी भेंट कभी खड़े है लाइना, कभी पछाड़े नेट।। महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



“दोहा मुक्तक”

“दोहा मुक्तक” कली कली कहने लगी, मत जा मुझको छोड़ कल तो मैं भी खिलूंगी, पुष्प बनूँगी दौड़ नाहक न परेशान हो, डाली डाली मौर महक उठूँगी बाग में, लग जाएगी होड़॥ महातम मिश्रा, गौतम गोरखपुरी



"दोहा"

दोहा अपने आप में, रखता सुंदर भाव जागरूक करता सदा, लेकर मोहक चाव।। छोटी छोटी बात से, मन को लेता मोह चकित करे हर मोड़ पे, वरे न बैर बिछोह।। महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



दोहा-छंद :

दोहा-छंद : गहमा गहमी खूब है, कहीं नमक औ नोट। शोर मचाएँ मतलबी, जिनकी मंशा खोट।। वक्त तख्त के लालची, देते सबको चोट। कर देते गुमराह वे , झपट लेत है वोट।। महातम मिश्रा, गौतम गोरखपुरी



“दोहावली”

“दोहावली” लिखने बैठा वयखता, किसका लिया उधार पूछा माँ से तूँ बता, कैसे हौं उद्धार॥-1 बोली जननी लाड़ले, तूँ तो खाटी मूर जा औरों से पूछ ले, देख रहे सब घूर॥-2 बोले पिता तपाक से, दे दे मेरा सूद गिनती करिकरि थक गया, बैठा आँखें मूद॥-3 भैया भाभी सो गए, बंद किए किरदार हिस्सा किस्सा चातु



नर पिशाच



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