“रोला छंद” किसका है खलिहान लगाया घर पर ताला।।

“रोला छंद”कृपा करो हे नाथ साथ मानव मिल जाएसरयू तट रघुनाथ अयोध्या महल बनाए सीता जी का साथ पवनसुत जहाँ विराजें धन्य ज्ञान वह भूमि जन्म श्री राम सुराजे॥लंका जीते राम राक्षसी कुल को तारेएक वाटिका नाम अशोक सिया पद न्यारे हनुमान लिए खोज मनोज निशाचर मारे रिक्त न हो संसार ग



“मुक्तक” पतन किया तुमने मेरे वफा का बसर करके घर में गरारा न समझा

“मुक्तक” बहुत प्यार हमने तुमसे किया था मगर तुमने दिल का इशारा न समझा। जतन यार कितने मन से किया था डगर चलना तुमने गवारा न समझा। बड़े बे सहुर हो गए झूठ में तुम अमानत लिए ही गए रूठकर तुम- पतन किया तुमने मेरे वफा का बसर करके घर में गरारा न समझा॥-1 नवल थे इशारे धवल रोशनी थ



लेख-- राजनीतिक उदासीनता के शिकार गांव और ग्रामीण

भारत की दो तिहाई आबादी अगर जेल से भी कम जगह में रह रही है। तो ऐसे में निजता के मौलिक अधिकार बन जाने के बावजूद छोटे होते मकान और रहवासियों की बढ़ती तादाद प्रतिदिन की निजता को छीन रही है। जिस परिस्थिति में देश में सबको घर उपलब्ध कराने की बात सरकारें कह रही हैं। उस दौर में देश की आबादी का अधिकांश हिस्सा



सबसे बड़ा तीर्थ

लोग अपने घर में मौजूद भगवान रूपी माता-पिता को छोडक़र उन अदृश्य भगवान की खोज में तीर्थस्थलों पर मारे-मारे फिरते है. या अपने घर में मौजूद मॉ को दुखी छोडक़र पूरी रात मां का जाग



“दादरा गीत” जा रे बदरिया, सौतन घर जा जा रे

“दादरा गीत”जा रे बदरिया, सौतन घर जा जा रेसौतन घर जा रे, सौतन घर जा जा रे, जा रे बदरिया...........नाहक बरस गई मोर अंगनइयाँअगन लगी है सौतन घरे सइयाँजा रे तू वहिका डूबा रे, बैरन घर जा जा रे, जा रे बदरिया...........जा रे बिजुरिया सौतन घर जा जा रेकाहें चमक रही मोर दुवरइयाँलपट



satya Sayri

Mai ghar we nikala tha manzil ki tarafMai manzil se bhi dur chala aya huMai laut bhi jau waps to kya hasil haiMai sab kuch chhod kar mazbur chala aya huMuje lagat hai khusiyo ki talash me mai zannat se bahut dur chala aya hu.



घरौंदे/घोसले

घरौंदे/घोसले उड़ा दिए उन परिंदों को उनकी ही डाल से एक छोटे से कंकर देकर झूलते थे जो घोसले बहुत पुराने होकर गंदे, जीर्ण-सिर्ण, खरबचड़े लटके थे बचपन से घेरे हमारे बंकर॥ उड़ा दिए उन खर पतवारों को खरखराते थे जो छप्पर एक हल्के से धक्के देक





यादो का घर !

मोबाइल पर नेट ऑन करते ही 'व्हाट्सएप ' पर एक मैसेज आया I''राहुल पाण्डेय ' तु चंद दिनों के दोस्तों को बर्थ डे विश कर रहा है Iलेकिन बचपन के दोस्त का जन्मदिन याद नहीं ''पहले तो मै चिंहुक गया के कौन है ये ? फिर देखा तो मेरे बचपन का सहपाठी था Iमैंने समझाया 'अरे भाई मै किसी के जन्मदिन याद थोड़े ही रखता हु ,



मेरा घर

जैसा की मैंने आपको बताया, मेरा जन्म भदोही जिले के एक छोटे से गांव मोहनपुर में हुआ, जो बहुत ही सुंदर और प्रकृति से भरा है। मेरे गाँव की भौगोलिक संरचना कुछ ऐसी है की यह भदोही और इलाहबाद जिले के बिच में है | इलाहाबाद कुछ ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व है। यह जगह प्रयाग कुंभ मेला और कई  अन्य सांस्कृतिक विरास



घर वापसी...!!

अरे महाराज... कहां चल दिए। रुकिए तो ... गाड़ी कभी भी चल पड़ेगी। उस युवा साधु को छोटे से स्टेशन से आगे बढ़ता देख दूसरे साधु चिल्ला उठे। लेकिन उस  पर तो जैसे अलग ही धुन सवार थी। वह आगे बढ़ता ही जा रहा था। दूसरे साधु पीछे - पीछे चिल्लाते हुए लगभग दौड़ने लगे। महाराज , आपको कुछ भ्रम हो गया है क्या। आप कह



हम बनाएँगे अपना घर

कवि:- शिवदत्त श्रोत्रियहम बनाएँगे अपना घरहोगा नया कोई रास्ता होगी नयी कोई डगरछोड़ अपनी रह तुम चली आना सीधी इधर||मार्ग को ना खोजना ना सोचना गंतव्य किधरमंज़िल वही बन जाएगी साथ चलेंगे हम जिधर||कुछ दूर मेरे साथ चलो तब ही तो तुम जानोगीहर ओर अजनबी होंगे लेकिन ना होगा



वो कैसा होगा शहर

कवि:- शिवदत्त श्रोत्रियजहाँ हम तुम रहे, बना खुशियो का घरकैसी होगी ज़मीन, वो कैसा होगा शहरहाथो मे हाथ रहे, तू हरदम साथ रहेकुछ मै तुझसे कहूँ, कुछ तू मुझसे कहेमै सब कुछ सहुं, तू कुछ ना सहेसुबह शुरू तुझसे, ख़त्म हो तुझपे सहरजहाँ हम तुम रहे, बना खुशियो का घर ...कुछ तुम चलोगी, तो कुछ मै चलूँगाकभी तुम थकोग



घर में क़ैद नारी

ऐसे कलुषित समाज में लेकर जन्मवर्ण कुल सब मेरा श्याम हो गया ।बड़ी दूषित है सोचकर्म भी काले हैंगहन तम मेंअस्तित्व इनका घुल गया ।देखकर यह समाजहोती है घुटन आज ।कैसा है समाज इसे आती नहीं लाज ?नर्क से निकाल करदुनियाँ में जो लायी ।शून्य मन में ज्ञान कीजिसने ज्योति जलायी ।जिसका शोणित पीकरजीवन मिलता है ।जिसक



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