कहानी

जीजिविषा



दम तोड़ती भावनायें

"क्या ,आज भी तुम बाहर जा रहे हो ??तंग आ गई हूँ मैं तुम्हारे इस रोज रोज के टूर और मिटिंग से ,कभी हमारे लिए भी वक़्त निकल लिया करो। " जैसे ही उस आलिशान बँगले के दरवाज़े पर हम पहुंचे और नौकर ने दरवाज़ा खोला ,अंदर से एक तेज़ आवाज़ कानो में पड़ी ,हमारे कदम वही ठिठक गये। लेकिन तभी बड़ी शालीनता के साथ नौकर न



डिजिटल भी और सिंगल भी

पबजी गेममें उसकी शिकारी निगाहें दुश्मनों को बड़ी मुश्तैदी से साफ कर रहीं थी। तकरीबन आधेघंटे की मशक्कत के बाद वो जोर जोर से चिल्लाने लगा। हुर्रे, हुर्रे, हिप हिप हुर्रे। आखिकार लेबल 30 पार कर हीं लिया। डेढ़ घंटे की जद्दोजहद के बाद उसने पबजी गेम का 30 वां लेबल पार कर लिया था



Sketches from Life: नकली मूर्ती

शादी में जाने की तैयारी पूरी हो चुकी थी. और लो टैक्सी भी आ गई. सामान गाड़ी में डाल दिया और दोनों पिछली सीट पर बैठ गए. चंद्रू ड्राईवर से बोला,- चलो भई स्टार्ट!गाड़ी गीयर बदलते हुए हाईवे पर आ गई और देहरादून की चार घंटे की यात्रा शुरू हो गई. उसके साथ ही मन में विचारों की गाड़ी



मन का प्रेत

मन का प्रेतरामा को इस समय पैर बड़े भारी लग रहे थे। हर कदम मन भर का लगता था। बाबा सुबह से खेतों में काम कर रहे थे, दोपहर का खाना तो माँ दे आई थी लेकिन रात का खाना रामा को लेकर जाना था। माँ ने खाना रामा के हाथ में देकर सात बजे ही रवाना कर दिया ताकि वो जल्दी ही बाबा को खाना पहुंचा कर वापस आ जाए। मगर राम



मि. ख़ का शहर

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उधार

पूरे दिन बरसकर मेघराज सांस लेने के लिए थम गए थे। अब कीड़े-मकोड़ो के लिए उत्सव का समय था। ढलता हुआ सूरज किसी खुशहाल किसान की तरह सीना फुलाए अपने घर की तरफ एक खूबसूरत गीत गुनगुनाता हुआ बढ़ रहा था। बादल रहने से अंधेरा ज्यादा जल्दी होता हुआ प्रतीत होता था। श्याम के 6 बजे थे। मगर मुझे घर जाने की कोई जल्दी न



आतंकवादी चूहा

मासूमियतका असली मतलबआप किसी भीबच्चे या जानवर कीनजरों से नजरेंमिलाकर पता करसकते हैं। शायदइसी सच्चाई से प्रेरितहोकर हमारे पूर्वजोंने इंसान काशरीर और जानवरोंकी गर्दनों को जोड़करभगवानों की कल्पनाकी थी। इसीके चलते हमेंये भगवान बड़े भातेहैं जैसे - गणेशजी। मगर इनकेवाहन मूषक राज कोभगवान की मोहरलगने के बादभी स



संतुलन

आज सरयू जंगल का माहौल ग़मगीन था। जंगल के राजा बब्बर शेर सूमो का बेटा, जंगल का राजकुमार डिमो गंभीर रूप से घायल था। उसके माथे, छाती और पैरों पर गहरे ज़ख्म थे। गप्पू लोमड़ ने घात लगाकर डिमो पर पीछे से हमला किया था। वैसे कोई सूमो के मुँह पर कुछ नहीं कह रहा था पर दबी ज़ुबान में हर कोई इस घटना का ज़िम्मेदार सू



ईरानी खानम , जीना सिखा गयी

ईरानी खानम, जीना सिखा गयी डॉ शोभा भारद्वाज पलवल शटल से जा रही थी गाड़ी चलने से पहले एक महिला डिब्बे में चढ़ीं उनको देखकर यात्रियों ने तुरंत बैठने के लिए सीट दे दी जबकि मैं पहले से खड़ी थी महिला नेमेरे लिए भी अपने पास जगह बना दी मैं उनको एकटक देख रही थी , बोलने के मीठे लहजेमें ईरानी शिष्टाचार था नील



मेहंदी

शाम का समय था। अंधेरा ढलना शुरु हो चुका था। एक जलती-बुझती स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठा मोची अपना काम बढ़ाने की तैयारी में था। पास रखी किराये की लाईट में वो अपने पैसे गिन रहा था। मैं भी उस समय बस पकड़ने के लिए तेजी से बस स्टैण्ड की तरफ भागा जा रहा था। उसे देखकर आज फिर से मुझे अपने जूते की उधड़ी हुई सिलाई य



दंपत्ति

मेरे पुराने मित्र शर्मा जी किसी पुराने पंडित की तरह धर्म क्रियाओं के पीछे भागने वालों में नहीं हैं, वो तो अपनी ही कपोल-कल्पनाओं में गुम रहने वाले स्वतंत्र विचारों के प्राणी हैं। उनकी अर्धांगिनी जी भी उन्हीं के प्रकार की हैं मगर भिन्नता



यादों का मानसून

शाम को ऑफिस से घर जा रहा था कि तभी चिलचिलाती गर्मी के दरवाजे पर मानसून ने दस्तक दी। बारिश होने लगी और सड़क पर चलते लोग बचने के लिए आड़ ढूंढने लगे। मगर मुझे कुछ अलग महसूस हुआ ऐसा लगा कि जैसे इस पल को मैं पहले जी चुका हूं। फिर कुछ पल याद आए जो आज फिर से जीवंत होते लगने लगे। दोस्तों के साथ बिताए पल



प्यार का दंश या फर्ज

प्यार का दंश या फर्ज तुलसीताई के स्वर्गवासी होने की खबर लगते ही,अड़ोसी-पड़ोसी,नाते-रिश्तेदारों का जमघट लग गया,सभी के शोकसंतप्त चेहरे म्रत्युशैय्या पर सोलह श्रंगार किए लाल साड़ी मे लिपटी,चेहरे ढका हुआ था,पास जाकर अंतिम विदाई दे रहे थे.तभी अर्थी को कंधा देने तुलसीताई के पति,गोपीचन्दसेठ का बढ़ा हाथ,उनके बे



बदलते हुए लोग

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शादी की पीड़ा

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नंदिनी...

'तुमको तो कोई चिंता ही नहीं है बस अपने चार पंचों को लेके बैठ जाते हो गपशप करने, थोड़ा घर की तरफ भी देख लिया करो, घर में जवान बेटी बैठी हुई है, लोग बातें करने लगे हैं तरह-तरह की। मगर..तुम... तुमको क्या....' नंदिनी की मां ने मुंशी जी के घर आते ही उन पर लगभग रोज की तरह बरसना शुरू कर दिया। करती भी क्या ब



सुबह की चाय

सुशीला जो की एक मध्यम परिवार की महिला हैं॰॰॰॰॰ उसका पति मोहन गावों के बाहर एक मील में सुबह 10 बजे से रात को 11 बजे तक की नौकरी करता हैं. सुशीला और मोहन के अलावा घर में बापूजी भी साथ रहते हैं. तीनो में आपस में बड़ा लगाव और प्रेम है. ये छोटा सा परिवार बड़ी ख़ुशी से अपनी ज़िंदगी जीता है. बापूजी भी आपने आप



आत्म-बोध

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मन की सुन्दरंता

एक राजा की दो पत्नियां थी। प्रथम पत्नि सांवली थी वह राजा को बिल्कुल पंसद नहीं थी वहीं दूसरी पत्नि बहुत सुंदर देह व आकर्षक थी। राजा हमेशा दूसरी पत्नि को अपने साथ रखता था। वह उसकी अचूक एवं आकर्षक सुन्दरता में डूबा रहता था प्रथम पत्नि सुशील एवं बहुत गुण थी लेकिन उसका रंग सावंला होने के कारण राजा उसे पस



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