साधना का दर्पण हैं वृक्ष :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन में प्रकृति का बहुत ही सराहनीय योगदान होता है | बिना प्रकृति के योगदान के इस धरती पर जीवन संभव ही नहीं है | यदि सूक्ष्मदृष्टि से देखा जाए तो प्रकृति का प्रत्येक कण मनुष्य के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत करता है | प्रकृति के इन्हीं अंगों में एक महत्वपूर्ण एवं विशेष घटक है वृक्ष | वृक्ष का मानव



सम्पूर्ण सृष्टि ही भगवामय है :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सृष्टि के आदिकाल से ही इस धराधाम पर सनातन धर्म की नींव पड़ी | तब से लेकर आज तक अनेकों धर्म , पंथ , सम्प्रदाय जो भी स्थापित हुए सबका मूल सनातन ही है | जहाँ अनेकों सम्प्रदाय समय समय बिखरते एवं मिट्टी में मिलते देखे गये हैं वहीं सनातन आज भी सबका मार्गदर्शन करता दिखाई पड़ता है | सनातन धर्म अक्षुण्ण इसल



प्रकृति को समझने में चूक संकट की सबसे बडी वजह !

प्रकृति को समझने में चूक संकट की सबसे बडी वजह !अगर कोई यह दावा करें कि उसने प्रकृति को समझ लिया है तो इसपर आसानी से विश्‍वास नहीं किया जा सकता: वर्तमान समय में इस सत्‍यता को समझना काफी है कि जब यह कहा जाता है कि आज बारिश होगी या खबू गर्मी पडेगी तो उसका निष्‍कर्ष भी अक्‍सर उन भविष्‍यवाणियों की तरह हो



आरम्भ है यह अंत का

आरम्भ है यह अंत का -अंत की घड़ी है अब ना तुम्हारी ना ही हमारी सब की अंतिम कड़ी है अबजीने के ही नहीं ,मारने के भी अलग अलग ढंग है अब अंत की कड़ी है अब जीवन मरण की अंतिम कड़ी है अब आत्म दान का समय है यही है उचित ,सृष्टि चक्र थमने का समय यही सही यही उचित महा प्रस्थान का



ऋतु गायन

🌿🌿🌿ऋतु गान🌿🌿🌿🌾🌱🌲🌳🌴🌳🌲🌱🌾उमस भरी ग्रीष्मकालिन-उष्णतावातानुकूलित का आमंत्रण लाती है🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀बर्षा की टगर होठों पर टपकती बुँदों मेंमानो सावन के गीत सजनी गाती है🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺गीत शदर ऋतु की चाँदनी रात मेंअत्यंत प्रिय-आह्लादित कर देते हैं🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷शिशिर ऋतु अगन को आम



मैं......... क्यों ?

मैं......... क्यों ?हम सबमें कहीं सशक्त है ‘मैं’,कहीं छिपी है, तो कहीं विकराल है। मूल्यों और भावनाओं को तोड़ती ,असंतुष्ट , स्वार्थी और संवेदनहीन बनाती ‘मैं ‘रिश्तों में फैलती, संक्रमण की तरह ,अहसासों को लगती दीमक की तरह , मय में अंधा, मर्यादाओं को लाँघ रहा है। खोकर इ



कुछ यूं होती है जापानी शैली में बनी हिंदी कविता

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अन्नकूट पर्यावरण प्रेम ,एवं मिल बाँट कर खाने का अनुपम पर्व

अन्नकूट पर्यावरण प्रेम, एवं मिल बाँट कर खाने का अनुपम पर्व डॉ शोभा भारद्वाज वर्षा ऋतू समाप्त चुकी थी हर तरफ हरियालीही हरियाली थी गोकुल में घर घर उत्सव कीतैयारी चल रही थी कान्हा ग्वाल बालों के साथ संध्या को घर लौटे सोच मग्न इधर उधर



जीवन विद्या की प्रशिक्षक है वर्षाऋतु :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*पुण्यभूमि भारत से ही मानव जीवनोपयोगी ज्ञान सम्पूर्ण पृथ्वी पर फैला था | इसीलिए भारत को विश्वगुरु कहा जाता था | भारत को विश्वगुरु बनाने में हमारे ऋषि - महर्षियों का बहुत बड़ा योगदान रहा है | हमारे मनीषियों ने प्रकृति को सर्वश्रेष्ठ मानते हुए उसी से ज्ञानार्जन करने का प्रयास किया और अपने उसी ज्ञान को



प्रकृति और मानव के अटूट प्रेम का पर्व :- वट सावित्री

इस मतलबी सी ,क्रूर दुनिया में,जहाँ लोग प्यासे हैं पानी नहीं,लहू के ।उसी दुनिया का एक खूबसूरत सा चेहरा भी है ,जहाँ किसी और की उम्र बढ़ाने को,व्रत कोई और रखता है ।जी हां उसी चेहरे को हिंदुस्तान कहते हैं ।। ज



नवरात्री अदिशक्ति की उपासना प्रकृति का उपासना

भारतीय त्यौहारों में प्रकृति को बहुत महत्व दिया गया है | प्रकृति को माँ का दर्जा दिया गया है , जिस तरीके से माँ अपने बच्चे का पालन पोषण करती है उसी तरह प्रकृति भी इस संसार का पालती पोसती है | प्रकृति के सम्मान में ही हमारा कल्याण है , उसी को आदि शक्ति कह



भाषा

भाषा है हर संवाद के लिए जरूरी, फिर क्यों बनें अंग्रेजी जरूरी? अपनी निज भाषा, क्यों बनें तमाशा? शब्दों के अर्थ में बंधकर, बोले जो भी भाषा, वहीं है अपनी आशा संवाद के लिए जरूरी है जितनी भाषा, खुद को सुनाने के लिए भी, जरूरी है अपनी भाषा। चहुंओर लड़ाई है, कहीं क्षेत्रवादिता, कहीं भाषावादिता, वाद, विवा



सुनहरी शाम

ये सुनहरी शाम और ये जाती हुयी सूरज की धूप,कितना खूबसूरत लगता है प्रकृति का ये अनमोल रूप।ये हवा की हसीन अदायें,कितनी जंचती हैं ये वादियों पे फिजायेंये कुदरत का नजारा मन मोह लेता हैराह चलते मुसाफिर के कदम,निहारने के लिए रोक लेता है।ये सूरज भी ना कितना इंतजार करवाता है,मगर जब अपने घर वापस जाता है।इस सु



प्रकृति और हम - ( वयस्कों केलिए )

* प्रकृति और हम *(( वयस्कों केलिए गहरा सन्देश लिए ))जब एक पेड़ बीमार होता है, तो क्या करते हैं ??यदि पेड़ प्रिय है, तो उपाय करते हैं;क्या फिर, उसके तने, डालियों, पत्तों का इलाज करते हैं ??या, उसकी जड़ों पर काम करते हैं;चलो इसकी बात करते हैं, इस दिशा में कार्य करते



प्रकृति और हम ( बच्चों केलिए )

कविता को हमेशा इंसान को जीना चाहिए और उनसे कुछ ना कुछ सीखना चाहिए। यहां पर मैंने जो कविता लिखी है वो उनके लिए है जो दिल और दिमाग से पूरे बच्चे हैं।, जिन्होंने स्वयं के अंदर स्वयं का बचपन जीवित रखा है। अपने आपको इन कविता से जोड़कर देखिए



प्रकृति और इंसान

नदी,सागर ,झील या झरने ये सारे जल के स्त्रोत है. यही हमारे जीवन के आधार भी है. ये सब जानते और मानते भी है कि " जल ही जीवन है." जीवन से हमारा तातपर्य सिर्फ मानव जीवन से नहीं है. जीवन अर्थात " प्रकृति " अगर प्रकृति है तो हम है .लेकिन सोचने वाली बात है कि क्या हम है



‘विश्व पर्यावरण दिवस’ ( World Environment Day) 5 जून

हर साल 5 जून को ’विश्व पर्यावरण दिवस’ ( World Environment Day) मनाया जाता है । यह दिन पर्यावरण के ज्वलंत मुद्दों के बारे में आम लोगों को जागरूक करने और इस दिशा में उचित कदम उठाने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र (United Nations) का प्रमुख साधन है ।इतिहास



बर्फ़

सुदूर पर्वत परबर्फ़ पिघलेगीप्राचीनकाल से बहतीनिर्मल नदिया में बहेगीअच्छे दिन कीबाट जोहतेकिसान के लिएसौग़ात बन जायेगीप्यासे जानवरों कागला तर करेगीभोले पंछियों कीजलक्रीड़ा मेंविस्तार करेगीलू के थपेड़ों की तासीरख़ुशनुमा करेगीएक बूढ़ा प्यासा अकड़ी



हरियाली

ऐ हरियाली तुझे क्या हुआ क्यों तू उदास है ?क्या तेरा सौभाग्य तेरे पास है ? कभी तू हंसती थी कभी तू मुस्कराती थी कभी तू हवा के झरोखों से हिल डुल के इतराती थी क्या मै कहूं तू मुरझाई है ? की मै कहूँ



"शून्य" 'आत्म विचारों का दैनिक संग्रह' "मृत्यु"

"मृत्यु" "नवीन जीव संरचना की उत्पत्ति का उद्देश्य ,प्रकृति के परिवर्तन का सन्देश जो सारभौमिक सत्य है"



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