रक्षाबंधन की सार्थकता :----- आचार्य अर्जुन तिवारी

27 अगस्त 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (53 बार पढ़ा जा चुका है)

रक्षाबंधन की सार्थकता :----- आचार्य अर्जुन तिवारी

*राखी के बंधन का जीवन में बहुत महत्त्व है | राखी बाँधने का अर्थ क्या हुआ इस पर भी विचार कर लिया जाय कि राखी का अर्थ है रक्षण करने वाला | तो आखिर यह रक्षा कि जिम्मेदारी है किसके ऊपर /? अनेक प्रबुद्धजनों से वार्ता का सार एवं पुराणों एवं वैदिक अनुष्ठानों से अब तक प्राप्त ज्ञान के आधार पर यही कह सकते हैं कि राखी बाँधने वाला एवं बंधवाने वाले दोनों एक दूसरे के पूरक माने गये हैं | राखी सिर्फ बहनों द्वारा भाई की कलाई पर ही नहीं अपितु पुरोहितों द्वारा यजमानों को व गुरुओं द्वारा शिष्यों को भी बाँधे जाने का प्रावधान है | परंतु आज भाई बहन के स्नेह बंधन के रूप में इस पर्व को अधिक मान्यता मिली है | जब बहन के द्वारा भाई की कलाई पर राखी बाँधी जाती है तो वह भाई के रक्षण का कार्य करते हुए रक्षासूत्र कहलाता है | अर्थात बहन अपने भाई की रक्षा करने का भार उस रक्षासूत्र को सौंप देती है और बदले में भाई आजीवन बहन के सुख - दुख का सहभागी बने रहते हुए उसे रक्षा का वचन देता है | जब शिशुपाल का वध करने में भगवान श्री कृष्ण की उंगली में चोट लगी और रक्त निकलने लगा तब बहन द्रौपदी ने अपनी कीमती साड़ी की चिंता न करके तुरंत उसे फाड़कर भाई की उंगली में बाँध दिया तब रक्त बहना बन्द हो गया अर्थात बहन द्वारा वह रक्षासूत्र बनकर कन्हैया के हाथों में गया बदले में श्याम सुन्दर ने भरी सभामें द्रौपदी चीरहरण के समय साड़ियों का अम्बार लगा दिया | इतना करने के बाद कन्हैया के दायित्यों की पूर्ति नहीं हुई बल्कि जीवन भर वे द्रौपदी की रक्षा सहायता करते रहे |* *आज राखी का त्यौहार और प्रेम मात्र एक दिन का बनकर रह गया है | आज संसार में अधिकतर बहनें ऐसी भी हैं जो या तो भाईयों से जायदाद के लिए लड़ रही हैं या फिर भाईयों के द्वारा उपेक्षित हैं | कुछ बहनें ऐसी भी हैं जिनके माता - पिता दोनों नहीं रह गये हैं और वे मायके जाने के लिए मात्र भाईयों के ही आश्रित हैं ऐसी स्थिति में जब भाई भी बहन को उपेक्षित कर देता है तो वह जीते जी मर जाती है क्योंकि मायके का प्रेम जहाँ उन्होंने जन्म लिया और जिन भाई - बहनों के साथ वे बचपन में खेली हैं उन क्षणों को वे जीवन भर भूल नहीं पाती हैं | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" देश के सभी भाई - बहनों से हाथ जोड़कर यही कहना चाहूँगा कि आज रक्षाबंधन के दिन जो प्रेम चारों ओर दिखाई पड़ रहा है वह सिर्फ राखी के दिन ही नहीं बल्कि वर्ष के ३६५ दिन होना चाहिए | रक्षाबंधन मनाने का उद्देश्श्य तभी पूर्ण हो सकता है जब हम यह अवलोकन करते रहें कि किसी भी बहन की आँख में आँसू न आये पाये | किसी भी हैवान का हाथ किसी भी बहन के आंचल तक पहुँचने के पहले जब हम तोड़ना प्रारम्भ कर देंगे तब यह मान लेंगे कि हमने रक्षाबंधन का पर्व मनाया | यह दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि एक ओर तो आज सारा देश भाई - बहन के पवित्र प्रेम के प्रतीक त्यौहार मना रहा है वहीं कुछ विकृत मानसिकता के लोग चौराहों पर खड़े होकर राखी बांधने जा रही बहनों पर फब्तियां कस रहे हैं | जिस दिन यह कुकृत्य दूर हो जायेगा उसी दिन राखी मनाना भी सार्थक हो जायेगा |* *आज के दिन उपजे / उमड़े प्रेम को महज दर्शनीय न मनाकर जीवन भर यह प्रेम बना रहे यही आकांक्षा है |*

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