क्या है भगवान की कला ?? आचार्य अर्जुन तिवारी

04 सितम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (141 बार पढ़ा जा चुका है)

क्या है भगवान की कला ?? आचार्य अर्जुन तिवारी

*भगवान श्री कृष्ण का अवतार पूर्णावतार कहा जाता है क्योंकि वे १६ कलाओं से युक्त थे | "अवतार किसे कहते हैं यह जानना परम आवश्यक है | चराचर के प्रत्येक जड़ - चेतन में कुछ न कुछ कला अवश्य होती है | पत्थरों में एक कला होती है दो कला जल में पाई जाती है | अग्नि में तीन कलायें पाई जाती हैं तो वायु में चार कलाओं का विस्तार रहता है | पाँच कला आकाश में पाई जाती हैं तो सारे पशु - पक्षी एवं वृक्षों में छ: कलायें होती हैं | एक से लेकर सात तक की कलायें मनुष्यों में पाई जाती हैं आठ के ऊपर कलाओं से युक्त प्राणी को महापुरुष - "अवतार" की संज्ञा दे दी जाती है | भगवान परशुराम आठ कलाओं से युक्त थे तो मर्यादापुरुषोत्तम श्री राम बारह कलाओं के साथ अवतीर्ण हुए क्योंकि वे सूर्यवंश में अवतीर्ण हुए थे और सूर्य की बारह कलायें होती हैं | कृष्णावतार एकमात्र अवतार है जो सोलह कलाओं से युक्त था इसीलिए लीलाविहारी , लीलापुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण को पूर्णावतार कहा जाता है | चन्द्रमा में सोलह कलायें होती हैं और चन्द्रवंश में अवतरित भगवान श्री कृष्ण सोलह कलाओं से परिपूर्ण थे | जिस प्रकार चन्द्रमा अपनी सोलह कलाओं के साथ नित्य अठखेलियाँ करता है उसी प्रकार सोलह कलाओं से युक्त भगवान श्री कृष्णचन्द्र जी भी नित्य नयी लीलायें किया करते थे | जहाँ भगवान श्री कृष्ण का अवतार सोलह कलाओं से परिपूर्ण था वहीं उनकों चौसठ कलाओं का ज्ञान भी था | कंस का वध करने के बाद सांदीपनि गुरु के यहाँ चौंसठ दिन में चौंसठ कलाओं को सीखने वाले सृष्टि के एकमात्र महापुरुष थे "भगवान श्री कृष्ण" | कुल चौंसठ कलायें होती हैं | चौंसठ कलाओं से परिपूर्ण हैं पारब्रह्म परमेश्वर जिन्हें परमात्मा कहा गया है |* *आज इस तथ्य पर विचार करने की आवश्यकता है कि कला क्या है ? वाचस्पत्यम् में कहा गया है :- "कलयति कलते वा कर्तरि अच् , कल्यते ज्ञायते कर्मणि अच् वा" अर्थात :- जो किसी के कर्म व स्थिति को द्योतित करती है वह कला है | एक प्रश्न और उठता है कि जब पारब्रह्म में चौंसठ कलायें होती हैं तो भगवान श्रीकृष्ण सोलह कलाओं से युक्त होने पर भी पारब्रह्म क्यों कहे गये ? मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" ऋग्वेद का सन्दर्भ लेते हुए बताना चाहूँगा कि परमात्मा चार भागों में विभक्त है जिसका तीन पाद ऊर्ध्वलोकों में और एक पाद (चतुर्थांश) भूलोक (विश्व ब्रह्माण्ड) में व्याप्त है | "त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुष: पादोस्येहाभवत्पुन:" | इसीलिए भूलोक में सोलह कलायें ही विद्यमान हैं और इन्हें ही "पूर्ण कला" कहा जाता है | यहाँ षोडश कला पूर्णता का द्योतक है | जैसा कि बताया है कि ब्रह्म की चौंसठ कलायें होती हैं परंतु ब्रह्म के तीन चरण उर्ध्व में विद्यमान हैं और एक ही चरण इस ब्रह्माण्ड में व्याप्त है तो यदि चौंसठ को चार से विभाजित किया जाता है तो कुल सोलह कलायें ही प्राप्त होती हैं इस प्रकार पूर्णता की द्योतक सोलह कलाओं के साथ पूर्णावतार लिया श्यामसुंदर कन्हैया ने |* *भगवान की सोलह कलायें भगवान की पूर्णता का परिचायक है | ऐसे पूर्ण परमात्मा के श्री चरणों में कोटिश: प्रणाम*

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