अनुभव बुजुर्गों का :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

04 सितम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (43 बार पढ़ा जा चुका है)

अनुभव बुजुर्गों का :---- आचार्य अर्जुन तिवारी  - शब्द (shabd.in)

*सनातन काल से हमारे समाज के सृजन में परिवार के बुजुर्गों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है | हमारे ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ बुजुर्ग सदैव से हमारे मार्गदर्शक रहे हैं चाहे वे शिक्षित रहे हों या अशिक्षित | बुजुर्ग यदि अशिक्षित भी रहे हों तब भी उनके पास अपने जीवन के खट्टे - मीठे इतने अनुभव होते हैं कि वे उन अनुभवों के बल पर कई अध्यापक बनाकर तैयार कर सकते हैं | परिवार में बुजुर्गों ने सदैव नई पीढी (नाती - पोतों) को कहानियों के माध्यम से , उदाहरणों के माध्यम से नैतिक कर्तव्यों को , सामाजिकता को ही सिखाने का प्रयास किया है | हमारे ग्रंथों में पवनपुत्र हनुमान जी को "अतुलित बलधामं" अर्थात अतुलनीय बल के भण्डार एवं "ज्ञानिनामग्रगण्यम्" अर्थात ज्ञानियों में अग्रणी कहा गया है | परंतु जब सीता जी की खोज करने के लिए वानरदल समुद्र के किनारे सम्पाती के माध्यम से यह पता चलता है कि सीता जी लंका में है , तो हनुमान जी समुद्र लाँघने को तैयार हो गये परंतु जाने के पहले उन्होंने अपने उस दल के सबसे बुजुर्ग "जामवंत जी" से पूंछते हैं :-- जामवंत मैं पूंछहुं तोही ! उचित सिखावन दीजहुं मोही !! ज्ञानियों में अग्रणी होते हुए भी हनुमान जी एक बुजुर्ग (जामवंत) के अनुभव का लाभ लेने का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करते हैं |* *आज अधिकतर बुजुर्गों की स्थिति बद से बदतर अर्थात दयनीय होती जा रही है | आज की युवापीढी यदि दिग्भ्रमित होकर संस्कारविहीन बनते हुए अपराध के मार्ग का अनुगामी हो रहे हैं तो उसका एक कारण बुजुर्गों की अवहेलना भी कही जा सकती है | एकल परिवारों के बढते प्रचलन के कारण बचपन से बच्चों को बुजुर्गों का न तो सान्निध्य प्राप्त हो पा रहा है और न ही नैतिकता की शिक्षा | आज बुजुर्गों को उपेक्षित दृष्टि से देखने का अपराध शिक्षित समाज कर रहा है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" जो देख पा रहा हूँ कि आज युवा अपराधी गाँवों की अपेक्षा शहरों से अधिक निकल रहे हैं , इसका कारण यही है कि गाँवों में अभी बुजुर्गों का सम्मान थोड़ा ही सही परंतु बचा हुआ है | कारण यह है कि गाँव के बुजुर्ग किनारे कर दिये जाने के बाद भी अपने परिवार के बच्चों को डाँटा करते हैं परंतु शहरों में तो बुजुर्गों को "वृद्धाश्रम" भेज दिया जाता है | माँ - बाप नौकरी पर और बुजुर्ग वृद्धाश्रम में तो बच्चों (युवाओं) को रोकने - टोंकने वाला कोई बचा ही नहीं तो बच्चे मनमानी करने को स्वतंत्र हो रहे हैं जिसका एक भयानक परिणाम आज समाज देख रहा है |* *यदि समाज को सही दिशा में अग्रसर करना है तो हमें बुजुर्गों के अनुभव का सहारा लेना ही होगा | बुजुर्ग आपके धन का नहीं अपितु सम्मान का भूखा होते है , जिसके बदले में वे अपने जीवन का सारा अनुभव देने को तैयार रहते हैं |*

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