श्री कृष्ण के आदर्श :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

08 सितम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (119 बार पढ़ा जा चुका है)

श्री कृष्ण के आदर्श :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सम्पूर्ण सृष्टि नारी एवं पुरुष के संयोग से उत्पन्न हुई है | पुरुष में भी जिसका आचरण अतुलनीय हो जाता है उसे "पुरुषोत्तम" की संज्ञा दी जाती है | सनातन साहित्यों में वैसे तो पुरुषोत्तम शब्द का प्रयोग कई स्थानों पर भिन्न भिन्न चरित्रों के लिए किया गया है , परंतु चर्चा मात्र दो की ही प्राय: होती है | जिसमें भगवान श्री राम को "मर्यादापुरुषोत्तम" तो भगवान श्याम सुंदर कन्हैया को "लीलापुरुषोत्तम" कहा गया है | जहाँ भगवान श्री राम ने अपनी मर्यादा का आदर्श प्रस्तुत किया वहीं श्री कृष्ण की प्रत्येक लीला ही एक आदर्श बन गयी जो उन्हें पूर्णब्रह्म कहे जाने का कारण बनी | भगवान श्री कृष्ण को यदि चौंसठ कलाओं का ज्ञान था तो उनके जीवन में समय समय पर ये चौंसठ कलायें परिलक्षित भी होती रही हैं | सर्वप्रथम तो यह कि भगवान श्री कृष्ण नख से शिख तक सुंदरता की प्रतिमूर्ति थे , उनमें अभिमान नहीं था एक कुशल वादक , कृतज्ञ , तत्वज्ञ , उपदेशक , कुशलयोद्धा , माधुर्य आदि अनेकों ऐसे गुण जिनका कि वर्णन करना शायद मुझ जैसे मूढमति के लिए सम्भव नहीं है | जब शिशुपाल वध के समय चक्र से उंगली में चोट लगी तो महारानी द्रौपदी ने अपनी कीमती साड़ी फाड़कर उनकी उंगली में बाँध दिया | जिसकी कृतज्ञता उन्होंने दुर्यौधन की सभा में द्रौपदी की साड़ी बढाकर ज्ञापित की | इस प्रकरण से संदेश मिलता है कि यदि किसी ने आपके प्रति किंचितमात्र भी उपकार किया है तो हमें जीवनभर उसके प्रति कृतज्ञ रहते हुए समय आ जाने पर वह ऋण उतारने का प्रयास करना चाहिए | यदुकुल के संहार कारण बने ऋषियों के श्राप को यदि वे चाहते तो क्षमा करवा सकते थे परंतु अपनी समदर्शिता का परिचय देते हुए उन्होंने कर्मभोग के महत्व को प्रतिपादित किया | यही सब गुण उनको लीलापुरुषोत्तम बनाते हैं |* *आज के समय में लोग भगवान श्री कृष्ण के आदर्शों के अनुयायी बनने का स्वांग तो करते हैं परंतु वे भगवान श्रीकृष्ण के आदर्शों को छूने का किंचित भी प्रयास करते नहीं दीखते हैं | (यह सब पर नहीं लागू होता है) यदि परमात्मा में सुंदर रूप एवं सुडौल शरीर दे दिया है तो मनुष्य अपने मिथ्या देहाभिमान में ही मस्त रहता है | आज का स्वार्थी मनुष्य कृतज्ञता को तो जैसे भूल ही गया है | मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का बस इतना ही कहना है कि :- मनुष्य मनुृष्य के प्रति यदि कृतज्ञ नहीं रह पाता है तो कम से कम उस परमात्मा के प्रति तो कृतज्ञ होना ही चाहिए जिसकी कृपा से यह दुर्लभ मानव देह प्राप्त हुई है | परंतु आज का मनुष्य भगवान के प्रति कृतज्ञता नहीं ज्ञापित करना चाहता | आज यदि मनुष्य के पास किसी भी "पद का प्रभाव" है तो वह मात्र अपने कुटुंब ही नही बल्कि सगे - सम्बंधियों / मित्रों आदि के अपराधों पर भी पर्दा डालते हुए उसे दोषमुक्त कराने का प्रयास करता रहता है | अर्थात न्यायपरक समदर्शिता का भी लोप हो लगभग हो रहा है | सुबह शाम भगवान श्रीकृष्ण को अपना आदर्श मानने वाले एवं उनके चरित्रों का पठन एवं गायन करने वाले यदि उनके चरित्रों का एकाध अंश भी जीवन में उतारने का प्रयास कर लें तो उनका जीवन तो धन्य हो ही जाय साथ ही एक स्वच्छ समाज का निर्माण भी हो जायेगा |* *भगवान श्री कृष्ण ने एक साधारण ग्वाल से लेकर द्वारिकापुरी के राजा बनने तक संघर्ष ही किया है ! जिससे यह शिक्षा मिलती है कि - जीवन एक संघर्ष है और हमें कुसमय में घबराना नहीं चाहिए |*

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