हमारे पूर्वज :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

11 अक्तूबर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (33 बार पढ़ा जा चुका है)

हमारे पूर्वज :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म की दिव्यता का प्रतीक पितृपक्ष आज सर्वपितृ अमावस्या के साथ सम्पन्न हो गया | सोलह दिन तक हमारे पूर्वजों / पितरों के निमित्त चलने वाले इस विशेष पक्ष में सभी सनातन धर्मावलम्बी दिवंगत हुए पूर्वजों के प्रति श्रद्धा दर्शाते हुए श्राद्ध , तर्पण एवं पिंडदान आदि करके उनको तृप्त करने का प्रयास करते हैं | सनातन धर्म की दिव्यता यही है कि जो मृत्यु को प्राप्त करके इस मृत्युलोक का त्याग कर चुके हैं उन पूर्वजों के लिए भी श्रद्धा दर्शाने एवं उनको याद करने का अवसर प्रदान करता है | विचार कीजिए कि यदि यह व्यवस्था न होती तो क्या हम अपने पूर्वजों को याद रख पाते ?? यही वह समय होता है जब हम वर्ष में एक बार लगभग विस्मृत हो चुके अपने पूर्वजों का नाम आदि याद करने एवं आने वाली पीढी को भी याद कराने का प्रयास करते हैं | अन्यथा तो मनुष्य इतना व्यस्त हो गया है कि वह अपने पड़ोसियों का नाम भी नहीं जानना चाहता | कुछ लोग प्रायः प्रश्न कर देते हैं कि हमारे पिताजी भगवान की बड़ी भक्ति करते थे तो उनका तो मोक्ष हो गया होगा तो हम उनके लिए पिंडदान क्यों करें ? या यदि हम उनके नाम से पिंड प्रदान करते भी हैं तो उसका क्या होगा ?? ऐसे प्रश्नों के उत्तर में एक ही बात कही जा सकती है कि मनुष्य के द्वारा किया गया पिंडदानादि कभी व्यर्थ नहीं जाता | यदि आपके पूर्वजों का मोक्ष भी हो गया है तो भी यह कर्म श्रद्धा से करते रहना चाहिए | यदि यह उन्हें नहीं प्राप्त हो रहा है तो व्यर्थ भी नहीं जा रहा है | आपकी मृत्यु के बाद कर्मानुसार यह आपको प्राप्त हो जायेगा |* *आज ब्लॉग पितृ पक्ष में अपने पितरों के लिए यथाशक्ति श्राद्ध करते हैं , परंतु कुछ लोग यह भी पूछते हुए देखे जाते हैं कि मैंने अपने पितरों का गया तीर्थ में जाकर कि पिंडदान करके घर पर श्रीमद्भागवत का अनुष्ठान भी करा दिया है तो फिर पितृ पक्ष में श्राद्ध कर्म क्यों किया जाए ?? ऐसे सभी लोगों से मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूं कि पितरों के लिए आपने यदि गयातीर्थ में पिंडदान कर दिया है , उसके बाद भी पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म करते रहना चाहिए | क्योंकि हमारे अनेक ऐसे पितृ होते हैं जिनको कि हम जान भी नहीं पाते हैं | हमारे ही परिवार में अनेक गर्भपात हो जाते हैं या अनेक ऐसे लोग जो हमारे ऊपर ही आश्रित होते हैं उनका संसार में कोई नहीं होता है ऐसे लोग भी आपसे श्रद्धा की कामना करते हैं | पिंडदान में आपके कुल के अतिरिक्त आपके ननिहाल पक्ष के पितृ भी होते हैं जिन्हें कि हम तीन पीढ़ी से ज्यादा नहीं जान पाते | ऐसी स्थिति में उन तमाम पूर्वजों के लिए जो ज्ञात - अज्ञात है हमें श्राद्धादि कर्म करते रहना चाहिए | सबसे बड़ी बात तो यह है कि आज जिस प्रकार पुत्रों के द्वारा माता-पिता का तिरस्कार हो रहा है , ऐसे पुत्रों के द्वारा पिंडदान किया जाया ना किया जाए कोई मायने नहीं रखता है | जीते जी माता पिता की सेवा ना कर पाने वाले , उनको उपेक्षित रखने वाले पिंडदान करें या ना करें इसका कोई अर्थ नहीं है |* *कहने का तात्पर्य है की माता पिता की सेवा उनके जीवनकाल में जितना हो सके कर लीजिए | यही सबसे बड़ी श्रद्धा मानी जा सकता है | अन्यथा तो आज मनुष्य अपनी मनुष्यता ही खो चुका है दिखावे के लिए ही सबकुछ करना चाहता है |*

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