भक्त और भगवान :----- आचार्य अर्जुन तिवारी

05 दिसम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (49 बार पढ़ा जा चुका है)

भक्त और भगवान :----- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरा धाम पर भक्त और भगवान का पावन नाता आदिकाल से बनता चला आया है | अपने आराध्य को रिझाने के लिए भक्त जहां भजन कीर्तन एवं जब तथा आराधना करते रहे हैं वहीं ऐसे भी भक्तों की संख्या कम नहीं रही है जो भगवान की भक्ति में मगन होकर के नृत्य भी करते रहे हैं | भगवान को रिझाने की अनेक साधनों में एक साधन भगवान के भजनों का गायन एवं नृत्य भी रहा है | पौराणिक इतिहास में अनेक ऐसे भक्तों का वर्णन मिलता है जिन्होंने भगवान की भक्ति में मगन होकर अपने शरीर की सुध बुध का त्याग करके नृत्य भी करने लगे हैं , ऐसे भक्तों में अग्रणी कही जाने वाली मीराबाई रही हों , चाहे चैतन्य महाप्रभु आदि | ऐसे अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं | जहां भगवान की कथाएं होने लगती थीं वहां भक्तगण भगवान की कथाओं में मगन होकर के नृत्य भी करने लगते थे | ब्रज की गोपियों के नृत्य को कैसे भुलाया जा सकता है | यह भगवान की भक्ति नहीं तो और क्या थी ?? गोपिया ही नहीं यहां तो ग्वाल बाल भी भगवान की भक्ति में स्वयं के तन की सुधि को विसार करके नृत्य करने लगे थे | भगवान की कथाओं में स्वयं नृत्य करना अपने बस की बात नहीं है , यह तो मनुष्य के उस अवस्था की स्थिति है जब वह संसार की मोहमाया को त्याग करके भगवान की भक्ति में लीन हो जाता है | तब उसे समाज की या परिवार की चिंता नहीं रह जाती है | उस समय उसका भाव यही होता है कि हम भगवान की और भगवान हमारे , इसी भावना के वशीभूत होकर के भगवान के भजन एवं भगवान के प्रेम में नृत्य तक करते रहे हैं |* *आज युग परिवर्तन हो रहा है | मनुष्य वैज्ञानिक युग में प्रवेश कर चुका है ऐसे में भगवान की भक्ति करना एवं उनकी भक्ति में डूब जाना बिरले मनुष्यों के पास ही देखने को मिल सकता है | आज बड़े बड़े आयोजन होते हैं भागवत कथाओं के भव्य मंच पर बैठकर देश के अग्रगण्य संत जन भगवान की मधुर कथा भक्तों को सुनाते हैं , और समय-समय पर भक्तों के द्वारा इन कथाओं में नृत्य भी देखने को मिल जाता है | यह तो मात्र एक उदाहरण है शेष तो मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज यह भी देख रहा हूं की कथा मंच पर बैठने वाले अनेकों कथा वाचक ऐसे हैं जिनको मंच की मर्यादा का भी ध्यान नहीं रह जाता और वह कथा कहते कहते स्वयं को भक्ति में लीन दिखाने के लिए मंच पर ही नृत्य करने लगते हैं | उनके नृत्य को देख कर के कुछ भक्तजन तो रोमांचित हो जाते हैं परंतु शेष सभी हंसी उड़ाते हुए देखे जाते हैं | आज भागवत कथाओं में नृत्य दिखावा मात्र बनकर रह गया है | डीजे की धुन पर बजने वाले गीतों पर नृत्य करके हम अपने किस परमात्मा को रिझा रहे हैं , उनकी भक्ति में कितने लीन हो रहे हैं , यह विचारणीय विषय है | आज जो भी हो रहा है जितना भी हो रहा है सब ठीक ही हो रहा है कम से कम इसी के माध्यम से सनातन धर्म का प्रचार प्रसार तो अनवरत चल रहा है | कुछ लोग इसका विरोध भी करते हैं परंतु मेरा मानना है इसमें विरोध जैसी कोई बात नहीं है मनुष्य स्वतंत्र है और वह अपने भावों को किसी भी माध्यम से प्रकट कर सकता है |* *भगवान की भक्ति दिखावा नहीं होती है | भगवान की भक्ति में नृत्य करने वाला न तो आप की धुन सुनेगा और न ही उसको गीत के बोलों से मतलब होता है | यह तो प्रेम की पराकाष्ठा होती है |*

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