ढूंढती हैं नजर तू कहां है मगर

06 दिसम्बर 2018   |  Shashi Gupta   (50 बार पढ़ा जा चुका है)

ढूंढती हैं नजर तू कहां है मगर - शब्द (shabd.in)

ढूँढती हैं नज़र तू कहाँ हैं मगर


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हर मुलाक़ात का अंजाम जुदाई क्यूँ है


अब तो हर वक़्त यही बात सताती है हमें


याद तेरी कभी दस्तक कभी सरगोशी से


रात के पिछले पहर रोज़ जगाती है हमें


ज़िन्दगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है हमें


ये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें ...



कहने को तो पत्रकार हूँ, परंतु देश- दुनिया की खबरों की जगह यह गीतों का संसार मुझे कहीं अधिक भाता है,अब उम्र के इस पड़ाव में । मैं हर उन सम्वेदनाओं की अनुभूति करना चाहता हूँ , जिससे मन के करुणा का द्वार खुले और मैं बुद्ध हो जाऊँ, शुद्ध हो जाऊँ , मुक्त हो जाऊँ, इस दुनिया की हर उस भूख से, छटपटाहट से । बिना किसी शोक, ग्लानि और विकलता के आनंदित मन से निर्वाण को प्राप्त करूँ । अन्यथा रात्रि में यह तन्हाई जगाती ही रहेगी, इन्हीं नगमों की तरह , साथ ही करवाती रहेगी मेरी स्मृतियों और इच्छाओं का संगम इसी प्रकार वह हर रात , मानों स्त्री- पुरुष हो ये दोनों । खैर , यह कोई नया दर्द नहीं है, इस खूबसूरत संसार में यदि हम जैसे न होते , तो इंसान यह कैस समझ पाता कि दुनिया रंगीन है या गमगीन।


" प्यासा "और " जोकर " दो फिल्म मैं सदैव देखता हूँ , इन तन्हाई भरी रातों में, क्यों कि अज्ञात किसी शक्ति , किसी नियंत्रक , किसी नायक - खलनायक की खोज में मुझे कोई रूचि नहीं है। कर्म और किस्मत बस इन दोनों के इर्द गिर्द ही मेरा अपना चिन्तन है। तो कह रहा था कि प्यासा वह पिक्चर है , जिसमें नायक चाहे कितने भी दर्द से गुजरा हो, लेकिन अंततः उसे वह एक अपना मिल ही जाता है , जो मिटा देती है उसकी भूख ,जबकि जोकर में उसका किरदार स्वयं को दुनिया के उस रंग मंच पर खड़ा पाता है कि जिस- जिससे उसने स्नेह/ प्रेम किया, सभी पराये होते गये। इस पीड़ा से, उस भूख से उसे मुक्त मृत्यु की देवी ही कर पाती है। निर्धारित रंगमंच पर अपना कर्म करते हुये , यह गुनगुनाते हुये -


जीना यह मरना यहाँ इसके सिवा जाना कहाँ...



इस जोकर की मृत्यु को और उसकी भूख को भी भले ही तमाशबीन ताली बजा नाटक समझे , परंतु पर्दा गिर चुका है, वह दर्द अब अनंत में समा चुका है। सच्चाई समझने में हो सकता है कि मृत जोकर के नब्ज़ को टटोलना पड़े इस समाज को। अपने दर्द को टूटे हुये दिल में दबाये अपने रंगमंच पर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन अपनी मृत्यु में भी नौंटकी का एहसास कराने वाले महान विदूषक को भला मेरे जैसा कौन नहीं सलाम करना चाहेगा।


सो, क्या हुआ जो यह जोकर बुद्ध नहीं हो सका, पर कर्मपथ पर उसकी शहादत को भी इतिहास के पन्नों पर सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा। इसीलिए तो वह मेरा सबसे प्रिय पात्र है। ऐसा पात्र जिससे कोई प्रेम करने वाला न हो, कोई दो वक्त की रोटी देने वाला भी न हो, वह अतृप्त मन वाले शख्स के किरदार तथा उसके " भूख "को समझने में इस रंगीन दुनिया के खुशमिजाज लोगों को जरा वक्त लगा । बताते हैं कि यह पिक्चर पहले बाक्स आफिस पर असफल रही ,फिर खूब चली..।


भूख कैसी भी हो , क्षुधा तृप्त तभी होगी, जब उचित भोज्य सामग्री हो। एक प्रकरण याद है मेरी मौसेरी बहन का पुत्र एक बार मेरे गोद में खेल रहा था, सदैव हँसते रहने वाला बालक अचानक रोने लगा,बहन ने कहाँ कि दूध बना रही हूँ, आप उसे फुसलाए तब- तक। अब मैं भांजे साहब को लिये कभी शीशे के बाक्स में तैरती मछलियों को दिखलता, तो कभी कुछ विनोद करता , थोड़े देर के लिये वह शांत हो जाता ,फिर पुनः और तेज रूदन करने लगता। हर अतृप्त प्राणी की भूख ऐसी ही होती है कि झुनझुने से उसे अधिक देर फुसलाया नहीं जा सकता।


पर बच्चे और बड़ों के भूख में अंतर है। बच्चे को दूध मिला नहीं कि वह फिर से खिलखिलाने लगता है और बड़ों की तृष्णा शांत ही नहीं होती।


सुबह जब भी मैं संकटमोचन मंदिर पर पहुँचता हूँ , तो यह देख चकित रह जाता हूँ कि दानदाताओं से जो भी कम्बल और अन्य गरम वस्त्र इन भिक्षुकों को मिलते हैं, अगले दिन वे गायब हो जाते हैं,इनके पास से। वे फिर से फटे चादर में लिपटे मिलते हैं। यही तृष्णा है , जो कभी नहीं मिटती।


शरीर के आवश्यक वस्तुओं के उपभोग को तृष्णा नहीं कहते, यह तो भूख है, आवश्यकता है, परंतु जब वस्तुओं की लालसा बढ़ जाती है, तो वह तृष्णा में बदल जाती है। इन भिक्षुकों की भी यही गति है। इन्हें चाहे बढ़िया से बढ़िया कम्बल आप दें, परंतु इनकी तृष्णा इन्हें उसका उपभोग तक करने नहीं देती, क्यों कि वे इन्हें बेच देते हैं और इस आश में बैठे रहते हैं कि फिर कोई दूसरा दानदाता आकर इन्हें एक और कम्बल दे।


अजीब दुनिया है यह भी कि कोई बिल्कुल भूखा है, उसे बातों का , वायदों का , सहानुभूतियों का , सम्मान का झुनझुना यह समाज थमाता है और वहीं जिसके पास सबकुछ है , उसको और भी मिलता ही जाता है। कितने ही गरीब हैं , जो कर्मपथ पर है ,उनको ससम्मान एक कम्बल तक कोई नहीं देगा। आज सुबह साढ़े चार बजे होटल से निकला, तो चौराहे पर देखा एक शख्स अपने रिक्शे में खुले आसमान के नीचे चादर लपेटे सुध बुध खोये सोया हुआ था। सचमुच इन्हें कम्बल की जरुरत है, परंतु वह उन भिक्षुकों को मिलेगा, जो उन्हें बेच दिया करते हैं। उन भद्रजनों के बंगलों की रखवाली करने वाला बूढ़ा चौकीदार ठंड की मार नहीं सह सका, वह घर लौट गया और आज देखा एक युवा चौकीदार जमीन पर कोई फटी दरी बिछाये पड़ा है, उसके शरीर पर एक पुराना कंबल मात्र था। वे भद्रलोग जो इस कालोनी में रहते हैं, वे भी तो देखते होंगे न यह दृश्य , लेकिन दौलत की उनकी तृष्णा ने उनकी सम्वेदनाओं के भूख को मार दिया। वे नेत्रहीन हो गये हैं। डंकीनगंज स्टेट बैंक के बगल में एक जालीनुमा कक्ष में कुछ भलेमानुस अपने पुराने कपड़े छोड़ जाते हैं। अकसर सुबह उन कपड़ों को टटोलते मैंने कितने ही जरूरतमंदों को देखा हूँ। यह इनके शरीर पर वस्त्र की सामान्य सी भूख है, तृष्णा नहीं है।


एक दृश्य और देखा चौराहे पर आज सुबह, ठंड से कांप रहे जीप के चालक- खलासी ने शरीर को गरमाहट देने के लिये जब अखबार के पन्नों को आग के हवाले किया और उस आग की लपटों को कुछ दूर खड़ी एक महिला भी बिल्कुल ललचायी नजरों से देख रही थी। देखने में तो सभ्य लग रही थी, परंतु निष्ठुर निर्धनता ने उसके वदन को इस ठंड में ढकने के लिये एक पतला चादर भर दिया था। ठंड के समक्ष बेबस महिला का पांव धीरे - धीरे उस आग्नि की ओर खींचा आया, जिसे घेरे ये पुरुष बैठे हुये थें। महिला भी यह बात अच्छी तरह से जानती थी कि कितनी ही निगाहें उसके शरीर को घूर रही हैं। लेकिन , वह जलती आग उसकी भूख बन गयी, ठंड ने उसे विवश कर दिया।


किसी मयखाने में तो अपना जाना नहीं हो पाता , लेकिन सुबह - सुबह ही देशी मदिरालय के बंद दरवाजे को खटखटाते मैंने नशेड़ियों को देखा हूँ। यही मदिरा उनकी प्रथम भूख है। तवायफों के इलाके से भी गुजरात हूँ। अब इन कोठों पर से घुंघरुओं की आवाज पहले की तरह नहीं आती , न ही बारजे पर वे बेजान चेहरे समूह में नजर आते हैं, जो पेट के भूख के लिये हम जैसों को भी अपना ग्राहक समझ बैठती थीं और उनके हाथ खाली रह जाते थें। अब तो तन के भूख को शांत करने के लिये मोबाइल पर बस उंगली भर रखना है। सभ्य समाज की पढ़ी लिखी नकाबपोश लड़कियाँ भी आपके चौखट पर बेनकाब होने आ जाती हैं, यह कैसी भूख है इनकी..? सब -कुछ होते हुये भी तन का सौदा कुछ हजार रुपयों के लिये। यह तो तृष्णा है धन प्राप्ति के लिये। हाँ , पेट का भूख मिटाने के लिये अति पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी श्रमिक महिलाएँ , तन का सौदा कर लेती हैं। यह उनकी विवशता है।


धर्म, जाति, दौलत, पद- प्रतिष्ठा जैसे भूख की चाह तृष्णा में कुछ यूँ बदल जाती है कि मानवता की भूख चित्कार कर उठती है उसी मासूम बच्चे की तरह, ऐसे में कौन माँ इसे अपने आंचल में सम्हालेगी। मुझे तो दिन भर में कुल सात रोटियों की भूख रहती है । शरीर ने साथ दिया तो सुबह बन जाती हैं , तीनों वक्त इतने से ही काम चल जाता है और अतृप्त मन की भूख जो है वह किसी झुनझुने से बहलने वाला नहीं है, चाहे जितना भी ज्ञान उपदेश कोई दे ले ।अतः अभी कितने ही शाम यूँ गुजारने है , इस भूख से मुक्त होने के लिये -



अब तो आजा के अब रात भी सो गई


ज़िन्दगी ग़म के सेहराव में खो गई


ढूँढती हैं नज़र तू कहाँ हैं मगर


देखते देखते आया आँखों में ग़म


शाम-ए-ग़म की क़सम आज ग़मगीं हैं हम


आ भी जा आ भी जा आज मेरे सनम


शाम-ए-ग़म की क़सम


दिल परेशान हैं रात वीरान हैं


देख जा किस तरह आज तनहा हैं हम..



शशि


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कामिनी सिन्हा
10 दिसम्बर 2018

मन के करुणा का द्वार खुले और मैं बुद्ध हो जाऊँ, शुद्ध हो जाऊँ , मुक्त हो जाऊँ, इस दुनिया की हर उस भूख से, छटपटाहट से । बिना किसी शोक, ग्लानि और विकलता के आनंदित मन से निर्वाण को प्राप्त करूँ । सच शशि जी ,जब दर्द हद से गुजर जाता है तो वो दवा बन जाता और आँखे वो दर्पण बन जाती है जिसमे दुसरो के दुःख भी अपने लगने लगते है ,सादर नमन

Shashi Gupta
10 दिसम्बर 2018

जी सही कहांं आपने, नमस्ते।, यह एकाकीपन मुझे बहुत कुछ सिखला रहा है।

रेणु
07 दिसम्बर 2018

प्रिय शशि भाई -- आपने अपने मार्मिक लेख में बहुत सी चीजें बयान की | अच्छा लगता है जब पढती हूँ कि कोई तो है जो समाज की ओर करुणामयी दृष्टि डालने में सक्षम है | और अतृप्ति जब सार्थक होती है तो सृजन का मूल बनती है जैसे स्नेह की अतृप्त आकांक्षा ने आपकी दृष्टि को पारदर्शी और विरक्ति भाव वाली बना दिया है | पर यही अतृप्ति जब अनंत लिप्सा बन जाते है तो अभिशप्त हो जाती है | उन तृष्णा और लिप्सा का कोई हल नहीं | यही तृष्णा और धनकी नाजायज भूख आज संभ्रांत लोगों की बेटियों तक को ललचा उन्हें बदनाम राहों की ओर लिए जा रही | ये समाज की संबसे कुत्सित और भयावह तस्वीर है जिसे कोई भी देखना नहीं चाहेगा | ये समाज की नैतिकता का निम्नतम स्तर है , जो अत्यंत दुखद और चिंता पैदा करने वाला है | सचमुच आज समाज को बहुत ही बड़े स्तर पर नैतिक मूल्यों की जरूरत है जिसे इन भटके बेटे बेटियों को सही राह पर लाया जा सके | सार्थक आलेख के लिए हार्दिक आभार | सस्नेह --

Shashi Gupta
10 दिसम्बर 2018

जी दी

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