पुत्र :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

08 दिसम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (53 बार पढ़ा जा चुका है)

पुत्र :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*श्रृष्टि का विस्तार करने के लिए ब्रह्मा जी ने कई बार सृष्टि की परंतु सृष्टि गतिमान ना हो सकी , तब भगवान शिव के संकेत से उन्होंने मनु - शतरूपा का जोड़ा उत्पन्न करके मैथुनी सृष्टि को महत्व दिया , और मनुष्य इस संसार में आया | श्रृष्टि को विस्तारित करने के लिए प्रत्येक मनुष्य को पुत्र की आवश्यकता पड़ी | पुत्र प्राप्त करने के लिए अनेकों उपाय करते हुए हमारे पूर्वज देखे गए हैं | महाराज दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ , महाराज हरिश्चंद्र के द्वारा वरुण की तपस्या करके पुत्र प्राप्त करना यह दर्शाता है कि जीवन में पुत्र की आवश्यकता क्यों और कितनी होती है | हमारे पुराण बताते हैं की पुत्र के पिण्डदान करने से पिता को सद्गति मिलती है | यहां तक लिखा है कि "अपुत्रस्तो गतिर्नास्ति न भूतो न भविष्यति" अर्थात बिना पुत्र के सद्गति नहीं मिल सकती | परंतु क्या इसे सत्य माना जा सकता है ?? पुराणों में ऐसी कथायें भी मिलती है जहां अनेक पुत्रों ने तो अपने पिता की वंश परंपरा में कीर्तिमान स्थापित किये हैं परंतु वहीं अनेक पुत्र कैसे हुए हैं जिन्होंने पिता के कुल का नाम मिटा दिया | कुछ लोग कहते हैं पुत्र से वंश का नाम आगे बढ़ता है परंतु अनेक पुत्रियां जैसे सीता , सावित्री , मदालसा , अनुसूया आदि के नाम से ही आज भी उनके पिता को जाना जाता है | यदि सुपुत्र हो जाता है तब तो कुल का नाम आगे बढ़ता है यदि धुंधकारी की तरह कुपुत्र हो गया तो नाम एवं वंश परंपरा ही समाप्त हो जाती है | किसी का नाम पुत्र के कर्मों से नहीं अपितु अपने कर्मों से संसार में जाना जाता है | महाराज बलि , सगर , हरिश्चन्द्र आदि आज यदि जाने जाते हैं तो अपने कर्मों के आधार पर ना कि अपने पुत्रों के कर्मों के आधार पर | इसलिए प्रत्येक मनुष्य को पुत्र की कामना तो करनी ही चाहिए परंतु उसके साथ साथ अपने कर्मों का भी ध्यान रखना चाहिए |* *आज समाज में प्रायः यह देखने को मिलता है कि जिनके घर में पुत्र नहीं होता है उनके घर की बहुयें तिरस्कृत एवं उपेक्षित हो जाती है | पुत्र की कामना के लिए अनेक लोग आज भी तरह-तरह के अनुष्ठान एवं मंदिरों की चौखटें पूजते देखे जा सकते हैं | परंतु इतना सब करने के बाद वही पुत्र जिसे नरक का तारनहार बताया जाता है जीते जी माता पिता के जीवन को नरक बनाता हुआ दिखाई पड़ता है | जिस पुत्र को बुढापे का सहारा माना जाता है वही पुत्र माता - पिता को तिरस्कृत करके उन्हें वृद्धाश्रम में भेज रहा है | पुत्र का आचरण यदि सकारात्मक रहा तब तो परिवार प्रसन्न देखा जाता है और यदि नकारात्मक पुत्र हो गया तो जीते जी पूरे घर को नरक बना देता है | अतः मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का मानना है कि पुत्र की कामना करना ठीक है परंतु पुत्र ना होने की दशा में अपने घर की लक्ष्मी को त्रास देना कदापि उचित नहीं | पुत्र का आचरण उसी प्रकार होगा जिस प्रकार गर्भावस्था में मां का एवं पिता का आचरण होता है | यदि अच्छे पुत्र की कामना है तो सर्वप्रथम अपने आचरण को सुधारना होगा |* *पुत्र की कामना में स्त्रियों का तिरस्कार करके मनुष्य इस सृष्टि के साथ घात कर रहा है क्योंकि जिस दिन पुत्रियां नहीं होंगी उस दिन ही सृष्टि समाप्त हो जाएगी |*

अगला लेख: हम कौन ????? आचार्य अर्जुन तिवारी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
08 दिसम्बर 2018
*परमात्मा द्वारा बनाई हुई सृष्टि आदिकाल से गतिशील रही है | गति में निरंतरता बनाए रखने के लिए इस संसार की प्रत्येक वस्तु कहीं न कहीं से नवीन शक्तियां प्राप्त करती रहती है | इस संसार में चाहे सजीव वस्तु हो या निर्जीव सबको अपनी गतिशीलता बनाए रखने के लिए आहार की आवश्यकता होती है | किसी भी जीव को अपनी गत
08 दिसम्बर 2018
25 नवम्बर 2018
*आदिकाल से ही यह संपूर्ण सृष्टि दो भागों में बटी हुई है :- सकारात्मक एवं नकारात्मक | वैदिक काल में सकारात्मक शक्तियों को देवतुल्य एवं नकारात्मक शक्तियों को असुर की संज्ञा दी गयी | देवतुल्य उसी को माना गया है जो जीवमात्र का कल्याण करने हेतु सकारात्मक कार्य करें | मनुष्य एवं समाज का कल्याण जिस में नि
25 नवम्बर 2018
08 दिसम्बर 2018
*इस संसार में जन्म लेने के बाद प्रत्येक मनुष्य अपने परिवार के संस्कारों के अनुसार अपना जीवन यापन करने का विचार करता है | प्रत्येक माता पिता की यही इच्छा होती है कि हमारी संतान किसी योग्य बन करके समाज में स्थापित हो | जिस प्रकार परिवार के संस्कार होते हैं , शिक्षा होती है उसी प्रकार नवजात शिशु का सं
08 दिसम्बर 2018
08 दिसम्बर 2018
*सनातन धर्म में प्रत्येक मनुष्य की आयु सौ वर्ष निर्धारित करते हुए चार आश्रमों की व्यवस्था बनाई गयी है | ये चार आश्रम हैं :- गृहस्थाश्रम , ब्रह्मचर्यआश्रम , वानप्रस्थ एवं संयास आश्रम | संयास आश्रम की आयु वैसे तो ७५ से १०० वर्ष के बीच की आयु को कहा गया है परंतु यह पूर्वकाल के लिए था जब मनुष्य की सैकड़
08 दिसम्बर 2018
11 दिसम्बर 2018
*ईश्वर ने मनुष्य को इस संसार में सारी सुख सुविधाएं प्रदान कर रखी है | कोई भी ऐसी सुविधा नहीं बची है जो ईश्वर ने मनुष्य को न दी हो | सब कुछ इस धरा धाम पर विद्यमान है आवश्यकता है कर्म करने की | इतना सब कुछ देने के बाद भी मनुष्य आज तक संतुष्ट नहीं हो पाया | मानव जीवन में सदैव कुछ ना कुछ अपूर्ण ही रहा ह
11 दिसम्बर 2018
15 दिसम्बर 2018
*इस धरा धाम पर ईश्वर ने मनुष्य को विवेकवान बनाकर भेजा है | मनुष्य इतना स्वतंत्र है कि जो भी चाहे वह सोच सकता है , जो चाहे कर सकता है , किसी के किए हुए कार्य पर मनचाही टिप्पणियां भी कर सकता है | इतना अधिकार देने के बाद भी उस परमपिता परमात्मा ने मनुष्य को स्वतंत्र नहीं किया है | मनुष्य किसी भी कार्य
15 दिसम्बर 2018
05 दिसम्बर 2018
*सनातन धर्म में अनेकों देवी - देवताओं का वर्णन मिलता है , इसके अतिरिक्त यक्ष , किन्नर , गंधर्व आदि सनातन धर्म की ही एक शाखा हैं | इन देवी - देवताओं में किस को श्रेष्ठ माना जाए इसको विचार करके मनुष्य कभी-कभी भ्रम में पड़ जाता है | जबकि सत्य यह है कि किसी भी देवी - देवता को मानने के पहले प्रत्येक
05 दिसम्बर 2018
15 दिसम्बर 2018
*सनातन धर्म इस धरती का सबसे प्राचीन धर्म होने के साथ ही इतना दिव्य एवं विस्तृत है कि इसकी व्याख्या करना संभव नहीं हो सकता | सनातन धर्म के किसी भी ग्रंथ या शास्त्र में मानव मात्र में भेदभाव करने का कहीं कोई वर्णन नहीं मिलता है | आदिकाल से यहाँ मनुष्य कर्मों के अनुसार वर्ण भेद में बंट गया | ब्राम्हण ,
15 दिसम्बर 2018
25 नवम्बर 2018
*सनातन धर्म की विशेषता रही है कि अपने पर्व / त्यौहारों के माध्यम से मानवमात्र को एक दूसरे के समीप लाता रहा है | यहाँ प्रत्येक महीने में दिव्य त्यौंहारों की एक लम्बी सूची है , परंतु कार्तिक मास इसमें विशेष है | स्वयं में अनेक दिव्य त्योहारों को समेटे हुए कार्तिक मास का आज समापन हो रहा है | जाते हुए द
25 नवम्बर 2018
11 दिसम्बर 2018
*योनियों भ्रमण करने के बाद जीव को इन योनियों में सर्वश्रेष्ठ मानव योनि प्राप्त होती है | मनुष्य जन्म लेने के बाद जीव की पहचान उसके नाम से होती है | मानव जीवन में नाम का बड़ा प्रभाव होता है | आदिकाल में पौराणिक आदर्शों के नाम पर अपने बच्चों का नाम रखने की प्रथा रही है | हमारे पूर्वजों का ऐसा मानना थ
11 दिसम्बर 2018
05 दिसम्बर 2018
*ईश्वर की बनाई इस महान श्रृष्टि में सबसे प्रमुखता कर्मों को दी गई है | चराचर जगत में जड़ , चेतन , जलचर , थलचर , नभचर या चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने वाला कोई भी जीवमात्र हो | सबको अपने कर्मों का फल अवश्य भुगतना पड़ता है | ईश्वर समदर्शी है , ईश्वर की न्यायशीलता प्रसिद्ध है | ईश्वर का न्याय सिद्
05 दिसम्बर 2018
05 दिसम्बर 2018
*इस धरा धाम पर भक्त और भगवान का पावन नाता आदिकाल से बनता चला आया है | अपने आराध्य को रिझाने के लिए भक्त जहां भजन कीर्तन एवं जब तथा आराधना करते रहे हैं वहीं ऐसे भी भक्तों की संख्या कम नहीं रही है जो भगवान की भक्ति में मगन होकर के नृत्य भी करते रहे हैं | भगवान को रिझाने की अनेक साधनों में एक साधन भगवा
05 दिसम्बर 2018
11 दिसम्बर 2018
*अखिलनियंता , अखिल ब्रह्मांड नायक परमपिता परमेश्वर द्वारा रचित सृष्टि का विस्तार अनंत है | इस अनंत विस्तार के संतुलन को बनाए रखने के लिए परमात्मा ने मनुष्य को यह दायित्व सौंपा है | परमात्मा ने मनुष्य को जितना दे दिया है उतना अन्य प्राणी को नहीं दिया है | चाहे वह मानवीय शरीर की अतुलनीय शारीरिक संरचन
11 दिसम्बर 2018
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x