एक वीडियो जो आपको मजबूर कर देगा ये मानने के लिए कि भारत को अंग्रेजों ने बस 99 साल के लिए आजाद किया था?

03 जनवरी 2019   |  कुनाल मंजुल   (58 बार पढ़ा जा चुका है)

एक वीडियो जो आपको मजबूर कर देगा ये मानने  के लिए कि भारत को अंग्रेजों ने बस 99 साल के लिए आजाद किया था?

यूट्यूब पर एक चैनल धड़ल्ले से ये झूठ फैला रहा है.

क्या भारत ने आज़ादी ब्रिटेन से 99 साल की लीज़ पर ली है?

क्या इंग्लैंड की रानी गुप्त रूप से आज भी भारत पर शासन करती हैं?

क्या भारत का संविधान ब्रिटिश संसद का बनाया एक कानून है जो कभी भी रद्द हो सकता है?

कॉन्सपिरेसी थ्योरी में रुचि लेते हों तो आपने ये बातें सुनी होंगी. इनके समर्थन में दिए जाने वाले अजीबोगरीब लेकिन बेहद दिलचस्प तर्क भी सुने होंगे. आपने शायद ही कभी इन बातों को गंभीरता से लिया हो. लेकिन एक यूट्यूब चैनल ‘भारत परिवार’ इन चीज़ों को इस तरह से परोस रहा है कि अच्छे-अच्छे भी सही और गलत में फर्क न कर पाएं. इस चैनल पर एक वीडियो है – “मोदी को क्यों डांट दिया रानी ने? भारत आज भी गुलाम? पक्के सबूत!” इसके थंबनेल पर सवाल है – “भारत का सम्राट कौन मोदी या रानी?” इस वीडियो को अब तक 50 लाख से ज़्यादा लोगों ने देखा है. इसमें इंग्लैंड के प्रिंस विलियम और रानी एलिजाबेथ हिंदी में बात कर रहे हैं. ये बातें अविश्वसनीय हैं. लेकिन वीडियो में नज़र आ रहा अंकित अपनी बातों के लिए ऐसे-ऐसे तर्क देता है कि आप सोच में पड़ जाते हैं. अंकित ये भी कहता है कि वो अपने बताए ‘सच’ के लिए जेल तक जाने को तैयार है. आप ये वीडियो देखिए और फिर इन दावों की सच्चाई जानिए.


दावा नंबर 1 – एक आरटीआई में पूछा गया है कि भारत कब और किससे आजाद हुआ? 14 व 16 अगस्त 1947 और 25 व 27 जनवरी, 1950 को भारत का शासक कौन था? ब्रिटेन का राज भारत पर किस डेट को खत्म हुआ? क्या ब्रिटिश राजघराने की आने वाली पीढ़ी का भारत पर अधिकार है? भारत पर आज भी इंग्लैंड की रानी का ही राज चल रहा है. इस आरटीआई का कोई जवाब नहीं दिया गया.

सच्चाई क्या है?

1. आरटीआई

इस वीडियो में आरटीआई के नाम पर एक फर्जी सा कागज दिखाया गया है. कोई सबूत नहीं है कि आरटीआई फाइल की गई या उसकी कोई रिसीविंग हो. आरटीआई एक्ट के मुताबिक 30 दिन में जवाब न दिया जाए तो संबंधित विभाग को जुर्माना देना पड़ता है. साथ ही मामले को आरटीआई अपील अधिकारी के पास ले जाया जा सकता है. यहां ऐसा कुछ नहीं हुआ लगता है. ये बस भ्रमित करने के लिए बनाया गया एक कागज लगता है.

अंकित को आरटीआई से जो जवाब कथित तौर पर नहीं मिले, वो हम दे देते हैं. संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप के मुताबिक 14 अगस्त, 1947 तक भारत पर इंग्लैंड के राजा का शासन चलता था. राजा का नाम था – किंग जॉर्ज (छठवां). 15 अगस्त रात 12 बजे से भारत और पाकिस्तान इंग्लैंड के दो अभिराज्य (Dominion) बन गए. इसका मतलब था कि ये देश अपनी व्यवस्था खुद बना लेने तक इंग्लैंड से सलाह-मशविरा करेंगे. लेकिन इंग्लैंड का कोई भी कानून इन देशों की संसद व्यवस्था की अनुमति के बिना लागू नहीं किया जा सकेगा. भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947 में इसका ज़िक्र किया गया है.

2. अब किसका राज है भारत में?

15 अगस्त, 1947 को जवाहर लाल नेहरू ने भारत के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली. नेहरू डोमिनियन सरकार के ही प्रधानमंत्री थे. ये एक अंतरिम व्यवस्था थी. इसीलिए नई व्यवस्था लागू होने तक गवर्नर जनरल का पद भी जारी रखा गया. उस समय भारत के गवर्नर जनरल लुईस माउंटबेटन थे. 21 जून, 1948 को सी राजगोपालाचारी भारत के गवर्नर जनरल बने. 26 जनवरी, 1950 को आज़ाद भारत का संविधान लागू होते ही भारत एक सम्प्रभु गणराज्य (Sovereign Republic) बन गया. संप्रभु माने ऐसा देश, जो किसी और के बस में नहीं, अपने कानून पर चलता है. तो भारत में चलती है भारत की चुनी हुई सरकार की. किसी और के बस में नहीं का मतलब एक सदी से ज़्यादा हम पर राज करने वाले इंग्लैंड के बस में भी नहीं. भारत पर बस भारत के लोगों की चुनी हुई सरकार का राज चलता है.

भारत सरकार की वेबसाइट पर संविधान की कॉपी जिसमें स्पष्ट लिखा है कि भारत एक स्वतंत्र संप्रभु गणराज्य है.

दावा नंबर 2- सब कॉमनवेल्थ देश इंग्लैंड के गुलाम हैं. इन देशों पर राज करने के लिए इंग्लैंड ने गुप्त रूप से 99 साल की लीज अपने चमचों को दे रखी है. भारत के लोगों को लगता है कि वो आज़ाद हैं लेकिन यहां अंग्रेजों का कब्जा है. इसीलिए इंग्लैंड के बनाए कानून आज तक भारत में चल रहे हैं. भारत का संविधान अंग्रेजों का बनाया एक कानून है. इसीलिए इंग्लैंड की महारानी को भारत आने के लिए वीज़ा की जरूरत नहीं पड़ती. जबकि भारत के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को वहां जाने के लिए वीज़ा लेना पड़ता है.

सच्चाई क्या है?

l. कॉमनवेल्थ और गुलामी

सुभाष कश्यप और प्रोफेसर राजीवलोचन, दोनों इस सवाल का एक ही जवाब देते हैं. वो पहले कॉमनवेल्थ समझाते हैं. वो बताते हैं कि कॉमनवेल्थ की स्थापना 1931 में हुई. शुरुआत में वो देश इसका हिस्सा थे जिनपर ब्रिटेन का राज था. इसका नाम भी ब्रिटिश कॉमनवेल्थ था. लेकिन 1949 में इसे कॉमनवेल्थ ऑफ नेशंस यानी ‘राष्ट्रमंडल देश’ बना दिया गया. उसके बाद से भारत पर ब्रिटेन का कोई राज नहीं रहा. कॉमनवेल्थ ग्रुप की 1971 में हुई ‘सिंगापुर घोषणा’ में साफ कहा गया कि “ये सब राष्ट्रमंडल देश, स्वतंत्र सम्प्रभु देशों का एक स्वैच्छिक संगठन है. इसके सब देश अपने-अपने लोगों के हितों के लिए, अपनी अंतरराष्ट्रीय समझ व विश्व शांति के लिए सलाह लेने और फैसले लेने के लिए ख़ुद जिम्मेदार हैं.” इस घोषणा को आप यहां क्लिक कर भी पढ़ सकते हैं.

कॉमनवेल्थ की वेबसाइट पर 1971 की सिंगापुर घोषणा का स्क्रीनशॉट.

इंग्लैंड के गुलाम रहे किसी देश के लिए ज़रूरी नहीं कि वो कॉमनवेल्थ का हिस्सा रहे. जैसे दक्षिण अफ्रीका ने 1961 में कॉमनवेल्थ छोड़ दिया था और 1994 में वापस हिस्सा बन गया. पाकिस्तान ने 1972 में कॉमनवेल्थ छोड़ दिया था और 1989 में फिर से जॉइन कर लिया. ऐसे ही मोज़ेम्बिक और रवांडा पर कभी ब्रिटेन का शासन नहीं रहा लेकिन फिर भी वह कॉमनवेल्थ का हिस्सा हैं. कनाडा 1982 और ऑस्ट्रेलिया 1986 तक खुद को इंग्लैंड के अधीन मानते थे. लेकिन 1982 में आए कनाडा एक्ट और 1986 के ऑस्ट्रेलिया एक्ट के बाद ये दोनों स्वतंत्र देश बन गए.

कॉमनवेल्थ में रहने के बहुत सारे फायदे हैं जिनकी वजह से देश इसका हिस्सा बने रहते हैं. जैसे कॉमनवेल्थ देशों में आपसी आर्थिक व्यापार आसान होता है. कॉमनवेल्थ देश एक-दूसरे को सांस्कृतिक रूप से एक-दूसरे से जुड़ा हुआ मानते हैं. ऐसे में इन देशों के नागरिकों को दूसरे देश की नागरिकता लेने में परेशानी नहीं होती. कॉमनवेल्थ के देश अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर खूब ज़ोर देते हैं. संयुक्त राष्ट्र में किसी मुद्दे पर विवाद होने पर कॉमनवेल्थ देश एक-दूसरे का समर्थन करते हैं. जब किसी कॉमनवेल्थ देश को ऐसे किसी देश में काम होता है, जहां उसका दूतावास न हो, तो वो उस कॉमनवेल्थ देश की मदद ले सकता है, जिसका संबंधित देश में दूतावास हो. कॉमनवेल्थ देश जब दूसरे कॉमनवेल्थ देशों में अपने मिशन (दूतावास) खोलते हैं, तो उन्हें उच्चायोग (High Commission) कहा जाता है. दूसरे देशों के मिशन दूतावास कहलाते हैं. मिसाल के लिए भारत और ब्रिटेन कॉमनवेल्थ देश हैं. भारत का ब्रिटेन में मिशन ‘हाई कमीशन’ कहलाता है. वहीं, भारत का अमरीका में मिशन ‘एम्बैसी’ कहलाता है. क्योंकि अमरीका कॉमनवेल्थ का हिस्सा नहीं है.

2. इंग्लैंड के चमचे

अब आते हैं चमचों वाले सवाल पर. चमचों को सत्ता देने की बात पर जवाहर लाल नेहरू को दिखाया गया है. जवाहर लाल नेहरू साल 1912 में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े. 1947 में भारत के आजाद होने से पहले तक जवाहर लाल नेहरू करीब 9 साल जेल में रहे. तो अंकित का तर्क है कि ब्रिटिश सरकार ने अपने चमचे को 9 साल तक जेल में रखा. इसे समझने में आम दिमाग को परेशानी होती है.

3. भारत में इंग्लैंड के कानून

इंग्लैंड के कानून आज भी भारत में चलते हैं. यह बात उतनी ही सही है जितना सूरज का दक्षिण से उगना. भारत एक स्वतंत्र देश है जिसका खुद का संविधान है और खुद के बनाए कानून हैं. इन कानूनों को कभी भी सहूलियत के हिसाब से बदला जा सकता है. भारत के संविधान में एक भी आर्टिकल किसी देश से कॉपी नहीं किया गया है. संविधान सभा की चर्चाओं में इस पर बहस हुई थी कि क्या संविधान दूसरे देशों से कॉपी किया जा रहा है? इस पर बहसों में जवाब दिया गया. संविधान के कुछ आर्टिकल मिलते-जुलते हो सकते हैं. और संविधान में जरूरत के हिसाब से कभी भी चेंज किया जा सकता है. हां, ऐसे कई कानून हैं, जो तब अस्तित्व में आए, जब अंग्रेज़ों का शासन था. इनमें से जो आज़ाद भारत के मूल्यों के हिसाब से सही पाए गए, वो बने रहे. लेकिन इंग्लैंड के कानून के रूप में नहीं, भारत की संसद द्वारा मान्य कानून के रूप में. जो पुराने कानून भारतीय मूल्यों के हिसाब के नहीं थे, वो खत्म हो गए. ये एक निरंतर प्रक्रिया है जो चलती रहती है. जैसे समलैंगिकता को अपराध बताने वाली धारा 377 अंग्रेज़ों ने 1864 में लाई थी. सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में अपने एक फैसले से इसे खत्म कर दिया.

4. रानी का वीज़ा

अब बात रानी के वीज़ा की. वीज़ा की जरूरत तब पड़ती है, जब आपके पास कोई पासपोर्ट हो. इंग्लैंड की महारानी को वीज़ा की जरूरत इसलिए नहीं पड़ती कि उनके पास कोई पासपोर्ट ही नहीं है. इंग्लैंड में रानी का दर्जा सबसे ऊपर है, सरकार से भी ऊपर. इंग्लैंड का पासपोर्ट वहां की रानी के दस्तखत से ही जारी होता है. इसलिए इंग्लैंड में नियम है कि रानी को पासपोर्ट लेने की कोई जरूरत नहीं है. इंग्लैंड की महारानी की वेबसाइट पर भी यह लिखा है. रानी बिना पासपोर्ट विदेश जा सकती हैं क्योंकि इंग्लैंड ने दूसरे देशों से ऐसी संधि कर रखी है.

ब्रिटिश राजपरिवार की वेबसाइट पर रानी के पासपोर्ट के बारे में लिखा नियम.

5. मोदी जी का वीज़ा

अब आते हैं भारत के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के वीज़ा की. किसी भी देश के राष्ट्राध्यक्ष मतलब राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को किसी दूसरे देश जाने के लिए वीज़ा की जरूरत नहीं होती. इसमें कुछ भूमिका देशों के बीच हुई संधियों की होती है और कुछ अंतरराष्ट्रीय मंच पर मेहमाननवाज़ी के तकाज़े की. इसका एक उदाहरण- नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो अमरीका ने उन्हें वीजा नहीं दिया था. लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद वो अमरीका बुलावे पर गए, उन्हें वीजा की ज़रूरत ही नहीं रही. ऐसे ही अफगानिस्तान से लौटते हुए मोदी पाकिस्तान चले गए थे जबकि वो कोई पूर्व निर्धारित कार्यक्रम नहीं था. ऐसे में जाहिर है कि उनके पास वीज़ा नहीं होगा क्योंकि पीएम को वीज़ा की जरूरत नहीं होती.

अब सबसे मज़ेदार बात. इस वीडियो का टाइटल में है- ‘मोदी को क्यों डांट दिया रानी ने’ लेकिन पूरे वीडियो में इसका जिक्र कहीं नहीं किया गया है.

अंकित के दावों की लिस्ट लंबी है. उनकी पड़ताल जारी रहेगी.

https://www.thelallantop.com/jhamajham/video-claiming-india-is-still-a-dominion-country-is-totally-false-and-misleading/

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