लोभ :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

06 जनवरी 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (54 बार पढ़ा जा चुका है)

लोभ :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में मनुष्य जहाँ समय समय पर दिव्य ज्ञान के सद्गुणों को प्राप्त करता रहता है वहीं उसको काम , क्रोध , मोह , लोभ आदि भी अपने शिकंजे में कसने को प्रतिक्षण तत्पर रहते हैं | मनुष्य का तनिक भी डगमगाना उन्हें इस पथ का पथिक बना देता है | मनुष्य को लोभ ले डूबता है | लोभ क्या है, लोभ लालच को कहते हैं। लालच का अर्थ है कि बिना उचित तरीकों के व धर्म, अधर्म, कर्तव्य, अकर्तव्य, उचित, अनुचित तथा आचार अनाचार का विचार किए अपनी इच्छित व पसन्द की वस्तुओं व पदार्थों को प्राप्त करने की अभिलाषा व इच्छा करना व उसमें अविवेकपूर्वक प्रवृत्त होना | लोभ के कारण समाज में अव्यवस्था फैलती है | यदि कोई व्यक्ति अवैध जहाँ कोई मनुष्य अनुचित आचरण से बाममार्ग का अनुसरण करके किसी वस्तु या पद को प्राप्त करना चाहता है तो वह संसार में तो अपराधी माना ही जाता है और ईश्वरीय नियमों में भी अपराधी होता है | ज्यादा धन एवं शीघ्रातिशीघ्र ऊँचे पद को प्राप्त कर लेने की आकांक्षा में मनुष्य पतित हो जाता है | लोकोक्ति है कि धन से मनुष्य की तृप्ति कभी नहीं होती , उसकी लोभ की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है और एक समय ऐसा आता है कि जब परिस्थितियां उनके प्रतिकूल हो जाती हैं और वह राजसत्ता व समाज के शिंकजे में फंस जाता है | जो जैसा कर्म करता है उसको वैसा ही फल भोगना पड़ता है क्योंकि यह ईश्वर की व्यवस्था है कि "अवश्यमेव हि भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभं" अर्थात् शुभ व अशुभ कर्म करने वालों को अपने किये हुए कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है | लोभ मनुष्य को अपराधी बना देता है और अपराध सार्वजनिक होने पर लोभी मनुष्य क्लेशित व दुःखी होता है तथा पछताता है | अतः मनुष्य को अपने मन व लोभ पर नियन्त्रण करना चाहिये |* *आज समाज में इन्हीं अवगुणों का ही बोलबाला है | मनुष्य काम , क्रोध , लोभ एवं अहंकार में मस्त होकर के उचित - अनुचित का विचार तक नहीं कर पा रहा है | लोभ पहले भी था परंतु आज इसका जितना प्रभाव दिख कदाचित पहले न था | आज सर्वत्र लोभ के ही दर्शन हो रहे हैं | मनुष्य आज सबकुछ बहुत जल्दी प्राप्त कर लेना चाहता है वह भी बिना कर्म किये | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" समाज की स्थिति देखकर बहुत चिन्तित होता हूँ कि आज लोभ में पड़कर सन्तान अपने माता - पिता तक का तिरस्कार कर रही हैं | यहाँ तक तो ठीक है परंतु आज के समाज में कई ऐसी घटनायें भी देखने को मिलती हैं जहाँ लोग सम्पत्ति के लोभ में अपने सगे - सम्बन्धियों एवं पारिवारिक सदस्यों की हत्या तक कर दे रहे हैं | अनेक शिष्य ऐसे हैं जो शीघ्र ही समाज में स्थापित हो जाने के लोभ में अपने गुरु का अपमान व त्याग करके आगे बढ़ना चाहते हैं | ऐसे लोगों को तत्काल लाभ तो मिल जाता है परंतु यह भी सत्य है कि ऐसे लोग स्वयं में सुखी नहीं रह पाते हैं | प्रत्येक मनुष्य लोभी है परंतु "अतिलोभ" से बचने का प्रयास सबको करते रहना चाहिए | लोभ को पाप की जड़ कहा गया है | पापी तो सभी हैं परंतु पाप की जड़ बन जाने पर मानव जीवन की सार्थकता समाप्त हो जाती है | अत: ध्यान रखें |* *लोभ मनुष्य को अंधा बना देता है ! हमें परमात्मा ने दो आँखें दे रखी हैं आँखें होने पर भी अंधा हो जाना मूर्खता ही कही जायेगी |*

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