सामूहिक यज्ञोपवीत :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

25 मार्च 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (36 बार पढ़ा जा चुका है)

सामूहिक यज्ञोपवीत :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म में मनुष्य के जीवन में संस्कारों का बहुत महत्त्व है | हमारे ऋषियों ने सम्पूर्ण मानव जीवन में सोलह संस्कारों का विधान बताया है | सभी संस्कार अपना विशिष्ट महत्त्व रखते हैं , इन्हीं में से एक है :- यज्ञोपवीत संस्कार ! जिसे "उपनयन" या "जनेऊ संस्कार" भी कहा जाता है | ऐसा माना गया है कि मनुष्य का जन्म दो बार होता है , एक बार माँ के गर्भ से एवं दुबारा गुरुदीक्षा लेकर यज्ञोपवीत संस्कार के बाद | यज्ञोपवीत का अर्थ होता है कि इस संस्कार के बाद ही मनुष्य यज्ञादि करने का अधिकारी बनता है | दो आँखें तो ईश्वर ने सबको दिया है परंतु यज्ञोपवीत संस्कार में जब वटुक "वेदारम्भ" अर्थात वेद/शास्त्रों का अध्ययन प्रारम्भ करता है तो उसके ज्ञानचक्षु खुल जाते हैं अर्थात दोनों वाह्य नेत्रों के अतिरिक्त अन्तर्चक्षुओं का भी उन्मीलन हो जाता है इसीलिए इसे "उपनयन संस्कार" भी कहा जाता है | यज्ञोपवीत का बहुत ही विस्तृत विधान हमारे धर्मशास्त्रों में मिलता है | ब्राह्मण , क्षत्रिय एवं वैश्य के लिए यज्ञोपवीत संस्कार का विधान तो बनाया गया है परंतु तीनों ही वर्णों के विधान में भिन्नता है | जहाँ ब्राह्मण के लिए ८ वर्ष , क्षत्रिय के लिए ११ वर्ष एवं वैश्य के लिए १३ वर्ष में बालक का यज्ञोपवीत सम्पन्न कराने का विधान है वहीं इनके यज्ञोपवीत करने एवं कराने के विधानों में भी भिन्नता है | क्योंकि प्रत्येक वर्ण का वेद , शाखा एवं गोत्र भिन्न होता है | एक ही मण्डप में भिन्न वेद , शाखा एवं भिन्न गोत्र के वटुकों का यज्ञोपवीत संस्कार करना सनातन के विरुद्ध है |* *आज जिस प्रकार सनातन के नियमों की धज्जियाँ सनातन के ही ध्वतवाहकों के द्वारा उड़ाई जा रही हैं वे चिंताजनक तो है ही साथ ही हास्यास्पद भी लगती हैं | आज के युवा यज्ञोपवीत को धारण ही नहीं करना चाहते क्योंकि वे इसके महत्त्व को ही नहीं जानते हैं | वहीं कुछ धर्माधिकारी सनातन के नाम पर अपनी एक संस्था बनाकर "सामूहिक यज्ञोपवीत संस्कार" का आयोजन बड़ी धूमधाम के साथ करते हैं | जहाँ भिन्न - भिन्न वर्णों एवं भिन्न भिन्न गोत्र के वटुकों का यज्ञोपवीत संस्कार महज कुछ घण्टों में एक साथ सम्पन्न कराया जा रहा है | सनातन धर्म के इन तथाकथित ध्वजवाहकों से मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" मात्र इतना ही पूंछना चाहता हूँ कि :- कि क्या सनातन धर्म के किसी भी गिरंथ में "सामूहिक यज्ञोपवीत" का विधान कहीं भी देखने को मिलता है ?? यदि नहीं तो ऐसा करने एवं कराने का प्रयोजन क्या है ?? जब कि "वशिष्ठ धर्मसूत्र" में स्पष्ट लिखा है :- सामूहिकाेपनयनस्य अशास्त्रीयत्वम् !! श्रद्दधानस्य भाेक्तव्यं चाेरस्यापि विशेषतः ! न त्वेव बहुयाज्यस्य यश् चाेपनयते बहून् !! अर्थात :- सामूहिक यज्ञोपवीत की शास्त्रों में आज्ञा नहीं दी गयी है | परंतु आज स्वयं को धर्माधिकारी दिखाने मात्र के लिए ऐसे कर्म समाज में किये जा रहे हैं जो कि उचित नहीं कहा जा सकता है | हमारे शास्त्रों में "सामूहिक यज्ञोपवीत" में सबसे बड़ा दोष "शाखारंड दोष" माना गया है जो कि आज के विद्वान या तो जानते नहीं या फिर जानने का प्रयास नहीं करते |* *धार्मिक कृत्य सबको करना चाहिए परंतु किसी भी कृत्य को सम्पन्न करने एवं कराने के लिए जानकारी का होना भी परमावश्यक है |*

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