स्वार्थ एवं भावनायें :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

30 मार्च 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (32 बार पढ़ा जा चुका है)

स्वार्थ एवं भावनायें :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरा धाम पर परमात्मा की सर्वोत्कृष्ट रचना मनुष्य को मानी गई है | जन्म लेने के बाद मनुष्य ने धीरे धीरे अपना विकास किया और एक समाज का निर्माण किया | परिवार से निकलकर समाज में अपना विस्तार करने वाला मनुष्य अपने संपूर्ण जीवन काल में अनेक प्रकार के रिश्ते बनाता है | इन रिश्तो में प्रमुख होती है मनुष्य की भावनाएं | मानव जीवन में स्वार्थ एवं परमार्थ इन दोनों का बहुत ही महत्व है स्वार्थ का अर्थ हुआ अपने लिए किया गया कार्य , जहां भावनाएं प्रमुख होती है वहां स्वार्थ गौड़ हो जाता है परंतु जहां मनुष्य परम स्वार्थी है वहां भावनाओं का कोई महत्व नहीं होता है | ऐसे व्यक्ति अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए अपने परिवारी जनों एवं गुरुजनों तथा समाज में अपने मित्रों की भावनाओं को कुचल कर के आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं | प्रथमदृष्ट्या वे आगे बढ़ भी जाते हैं परंतु एक समय ऐसा भी होता है जब उनको अपने परिवार , गुरुजन व मित्रों से मिलने वाला प्रेम एवं उनकी भावनाएं याद आती हैं , तब मनुष्य के पास पश्चाताप करने के अलावा और कोई मार्ग नहीं होता है | मानव जीवन में भावना प्रमुख हैं | भावनाएं केन्द्र में रखकर ही लोग अनेक क्रियाकलाप करते हैं परंतु बहुत जल्दी , बहुत ज्यादा प्राप्त कर लेने के चक्कर में मनुष्य इन भावनाओं को अनदेखा करके आगे निकलने का प्रयास करता है जो कि अनुचित ही कहा जाएगा |* *आज समाज में स्वार्थ ने अपना विस्तार कर लिया है | स्वार्थ का साम्राज्य इतना ज्यादा विस्तृत है कि मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए उन माता-पिता की भावनाओं को भी कुचल रहा है जिन्होंने जन्म देकरके हाथ पकड़कर चलना सिखाया | जिनके आंचल में रहकरके मनुष्य ने बोलना एवं अन्य क्रिया कलाप करना सीखा , ऐसे माता-पिता की भावनाओं को कुचलकर मनुष्य अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहा है | समाज में अनेक ऐसे उदाहरण भी देखने को मिलते हैं जहां शिष्यों ने अपने ऐसे गुरु की भावनाओं का भी ध्यान नहीं रखा जिन्होंने शिष्य को पुत्र की तरह मान करके शिक्षा दीक्षा दी | मुझे "आचार्य अर्जुन तिवारी" को हंसी तब आती है जब ऐसे ही लोग समाज को भावना एवं स्वार्थ की शिक्षा देते हुए दिखाई पड़ते हैं जिन्होंने स्वयं दूसरे की भावनाओं का ध्यान नहीं रखा | अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए अपने परिजनों / गुरुजनों की भावनाओं को कुचला | ऐसे लोग आज यह शिक्षा देते हुए दिखाई पड़ते हैं कि "रिश्तो की सिलाई भावनाओं से होनी चाहिए" जो स्वयं नहीं जानते कि भावना एवं प्रेम किसे कहते हैं ? जो अपने स्वार्थ में इन्हें भूल जाते हैं , वह भी मात्र कुछ धन , कुछ ज्यादा या कोई उच्च पद प्राप्त करने के लिए | आज के आधुनिक लोग यह भूल जाते हैं कि यही माता पिता की जिन्होंने हमें समाज में स्थापित किया , लोग भूल जाते हैं की यही वह व्यक्ति है जिसे हम गुरु मान करके समाज के उच्च पद पर आसीन होने का सौभाग्य प्राप्त किए | जन्म से ही कोई समाज में स्थापित नहीं हो जाता है , समाज में स्थापित होने के लिए परिजनों / गुरुजनों का आश्रय लेना पड़ता है | परंतु ऐसे लोग जिन्हें यदि निकृष्ट कहा जाए तो अतिशयोक्ति ना होगी स्वार्थ में अंधे हो जाते हैं | कुछ धनलोलुपता की चकाचौंध में इनका सारा प्रेम एवं समस्त भावनाएं लुप्त हो जाती हैं | यही आज समाज को शिक्षा देने का कार्य कर रहे हैं जो कि हास्यास्पद प्रतीत होता है |* *प्रत्येक मनुष्य स्वार्थी है परंतु "अति सर्वत्र वर्जयेत् " के अनुसार किसी भी चीज की अधिकता मनुष्य को पतन की ओर ही ले जाती है |*

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