मनोवृत्ति :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

05 अप्रैल 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (7 बार पढ़ा जा चुका है)

मनोवृत्ति :--- आचार्य अर्जुन तिवारी  - शब्द (shabd.in)

*इस संसार में दुर्लभ मनुष्य शरीर पाकर के मनुष्य संसार में सब कुछ प्राप्त करने का प्रयास करता है | मनुष्य भूल जाता है कि देव दुर्लभ शरीर ही सब कुछ प्राप्त करने का साधन है इसी शरीर के भीतर अमृत भरा हुआ है , इसी में विष है तो इसी को पारस एवं कल्पवृक्ष भी कहा गया है | मनुष्य जो चाहे इसी शरीर से प्राप्त कर सकता है | शरीर से मनोवांछित प्राप्त करने के लिए अपनी मनोवृति को अपने अभीष्ट की ओर मोड़ना पड़ता है | इस मानव जीवन में प्रत्येक कदम पर मनुष्य की परीक्षा होती है जरा सा भी विचलित होने पर मनुष्य अनुत्तीर्ण हो जाता है और फिर परीक्षा देने की उसकी इच्छा नहीं होती है | जबकि मनुष्य को अपने जीवन को सकारात्मक रखते हुए जीवन की परीक्षाओं को उत्तीर्ण करने का प्रयास करना चाहिए | मनुष्य की मनोवृत्ति ही उसके उत्थान एवं पतन का कारण बनती है | मनुष्य जैसे परिवेश में रहता है उसकी मनोवृति उसी प्रकार बनती चली जाती है | जिनका अपने मन पर नियंत्रण है उनके ऊपर दुष्प्रवृतियों का प्रभाव नहीं पड़ता है इसका उदाहरण हमारे पुराणों में देखने को मिलता है कि दैत्यराज हिरणाकश्यप के यहाँ प्रहलाद का जन्म हो जाता है तो लंका जैसी निशाचर नगरी विभीषण जैसे भक्तों का उदय होता है | ऐसा सम्भव तभी हो सकता है जब मनुष्य को अपनी मनोवृति पर नियंत्रण हो , परंतु मनुष्य जिस परिवेश में रहता है उसी परिवेश में उसी के अनुसार बहने का प्रयास करता है | वह यह भूल जाता है कि हम देव दुर्लभ मानव शरीर लेकर के इस धराधाम पर आये हैं |* *आज अधिकतर लोग कहते कि समय बदल गया , परिवेश बदल गया इसीलिए मनुष्य की मनोवृति बदल गई | जबकि न तो समय बदला और ना ही परिवेश बदला है | विचार कीजिए कि जो सूर्य सतयुग में था , द्वापर में था , त्रेता में था वही कलियुग में भी है | जैसे वह पहले निकलता था अब भी निकलता है | चंद्रमा रात को ही निकलता था आज भी वैसे ही निकल रहा है तो बदला क्या है ?? यह विचारणीय है | मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का मानना है कि न समय बदला और ना ही परिवेश बदला है बल्कि बदल गयी है मनुष्य की मनोवृत्ति एवं उसके संस्कार | आज लंका में विभीषण एवं हिरणाकश्यप के प्रहलाद तो नहीं दिख रहे हैं परंतु विश्रवा के यहाँ रावण एवं धर्मात्मा उग्रसेन के यहाँ कंस जैसी मनोवृत्ति के लोग बहुतायत संख्या में देखे जा सकते हैं | आज मनुष्य की मनोवृत्ति निकृष्ट हो गई है | क्योंकि मेरा मानना है कि जो गायत्री मंत्र वशिष्ठ एवं विश्वामित्र जी के पास था वही आज भी है परंतु यदि उसका प्रभाव कम हुआ है तो यह मात्र मनुष्य की निकृष्टता एवं नकारात्मकता के कारण हुआ है | अपनी संचित शक्तियों का नकारात्मक प्रयोग करने के कारण ही मनुष्य की मनोवृत्ति इस प्रकार बन गई है | मनुष्य को सबसे पहले अपने आसपास के परिवेश को देखना चाहिए और नकारात्मक परिवेश से निकलने का प्रयास करना चाहिए अन्यथा उसके लिए सारी सृष्टि ही परिवर्तित दिखाई पड़ती है , जबकि परिवर्तित कुछ भी नहीं हुआ है परिवर्तित सिर्फ मनुष्य के सोचने का दृष्टिकोण हुआ है | इसी दृष्टिकोण को बदलने की आवश्यकता है |* *स्वयं को जैसा चाहे बना सकते हैं ! यदि मनुष्य कहता है कि मैं नकारात्मक हूँ तो वह नकारात्मक ही हो जाता है | क्योंकि यही उसकी मनोवृत्ति बन जाती है |*

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