विद्या ददाति विनयम् :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

24 जून 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (27 बार पढ़ा जा चुका है)

विद्या ददाति विनयम् :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धराधाम पर परमात्मा ने चौरासी लाख योनियों की रचना की , इनमें सर्वश्रेष्ठ मनुष्य हुआ | मनुष्य सर्वश्रेष्ठ यदि हुआ है तो उसका कारण उसकी बुद्धि , विवेक एवं ज्ञान ही कहा जा सकता है | अपने ज्ञान के बल पर मनुष्य आदिकाल से ही संपूर्ण धरा धाम पर शासन करता चला रहा है | संसार में मनुष्य को बलवान बनाने के लिए अनेक संसाधन उपलब्ध है परंतु यदि विचार किया जाय तो मनुष्य का सबसे बड़ा बल उसका ज्ञान ही है | मनुष्य को ज्ञान शिक्षा के माध्यम से प्राप्त होता है | ज्ञान की दो धाराएं कही गई है प्रथम पर शिक्षा है और दूसरी को विद्या कहा गया है | शिक्षा के माध्यम से मनुष्य अनेकानेक ग्रंथों का अध्ययन तो कर सकता है , संकलन कर सकता है परंतु यह सभी संकलन एवं अध्ययन विद्या के बिना व्यर्थ है | अनेकों लोग यह प्रश्न कर सकते हैं कि क्या विद्या एवं शिक्षा में भेद है ?? तो यही कहा जाएगा कि हां शिक्षा एवं विद्या में अवश्य भेद है | यद्यपि मनुष्य को विद्या शिक्षा के माध्यम से ही प्राप्त होती है परंतु शिक्षा यदि भौतिकता का द्योतक है तो विद्या आध्यात्मिकता की | शिक्षा यदि मनुष्य में अहंकार को जन्म देती है तो विद्या मनुष्य को विनयशील बनाती है | "विद्या ददाति विनयम्" यह सूक्ति शिक्षा के लिए नहीं बल्कि विद्या के लिए है , इसीलिए प्राचीनकाल में बालकों को विद्याध्ययन के लिए गुरुकुल भेजा जाता था और वे वहाँ से विद्वान , गुणग्राही एवं विनयशील बनकर हमारी संस्कृति को प्रगतिशील बनाते हुए संरक्षक की भी भूमिका में रहे |* *आज के भौतिकवादी युग में मनुष्य ने अपनी भौतिकवादी शिक्षा के बल पर बहुत प्रगति की है परंतु विद्या के दर्शन कहीं कहीं ही प्राप्त होते हैं | आज समाज में स्वयं को विद्वानों की अग्रपंक्ति में शोभायमान बताने वाले कुछ स्वयंभू विद्वानों ने शिक्षा के बल पर संकलन तो बहुत अच्छा कर लिया है परंतु शायद उनमें भी विद्या का अभाव ही है क्योंकि मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" इन विद्वानों में विद्या का गुण - विनय नहीं देख पा रहा हूँ | आध्यात्मिकता की बात करने वाले , शास्त्रों की चर्चा करने वाले अनेक विद्वानों में अपनी विद्या का अहंकार स्पष्ट दिखाई पड़ता है , जबकि अहंकार विद्या का नहीं अपितु शिक्षा का द्योतक बताया गया है | ऐसे में इन्हें विद्यावान माना जाय या शिक्षावान ?? आज बात बात पर बहस करके स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने की होड़ सी लगी दिखाई पड़ती है | यह कदापि विद्वता का परिचायक नहीं है | किसी विषय का संकलन कर लेना , किसी विषय को कण्ठस्थ कर लेना ही विद्या नहीं है | विद्या वह है है कि अपने संकलित विषय का प्रस्तुतीकरण कैसे किया जाय ? विद्या विनय के साथ मनुष्य को पात्रता भी प्रदान करती है | बिना पात्र बने मनुष्य कुछ भी नहीं प्राप्त कर सकता | यद्यपि शिक्षा एवं विद्या दोनों एक दूसरे के पूरक हैं बिना शिक्षा के यदि विद्या नहीं प्राप्त हो सकती तो बिना विद्या के जीवन सार्थक नहीं हो सकता फिर भी मनुष्य को शिक्षा की सीढ़ी के सहारे विद्या को प्राप्त करने का सतत् प्रयास करते रहना चाहिए |* *शिक्षा भोतिकता को बढ़ावा देती है तो विद्या आध्यात्मिकता को | आध्यात्मिक ज्ञान (विद्या) के अभाव में मनुष्य लक्ष्यविहीन जीवन व्यतीत करता रहता है |*

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