मीठी शरारत

10 अक्तूबर 2019   |  कृष्ण मनु   (382 बार पढ़ा जा चुका है)


मेरी नयी लघुकथा


मीठी शरारत


बात उन दिनो की है जब मैं हाईस्कूल का विद्यार्थी था। प्राइमरी स्कूल से आये एक साल हुआ होगा। अभी भी अनजानापन, झिझक, भय पूरी तरह गये नहीं थे। मित्र भी नहीं बन पाये थे। स्कूल आना, क्लास करना और छुट्टी होते ही वापस हो जाना। सारे काम खामोशी में ही होते थे।

स्थितियाँ ऐसी ही थीं कि एक रोज.....


हिन्दी पढ़ाने मास्टर साहब आए। हट्टा-कट्टा बदन। पचास पार करती आयु। सिर पर अध पके बाल किंतु ठीक से संवरे हुए। चेहरा खुरदरा पर मुस्कान का स्थायी निवास। कुल मिलाकर मुझे अच्छा लगने वाले हिन्दी के मास्टर साहब।


आते ही कल का बाकी बचा पाठ शुरु करते हुए उन्होंने सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा लिखी कविता का पाठ सस्वर करने लगे-


चित्रा ने अर्जुन को पाया शिव को मिली भवानी थी

खूब लड़ी मरदानी वह तो झाँसी वाली रानी थी


मास्टर साहब का स्वर ऐसा था कि क्लास के बदमाश लड़के भी ध्यान लगा बैठते थे। उधर उनका पाठ जारी था इधन मेरी बाल-सुलभ हरकत। मैंने अगली पंक्ति में बैठे दो जोड़ियों पर नजर डाली। अनायास मेरे मन में कुछ चुलबुली-सी सोच उभरी और काफी प्रयास करने के बावजूद फिस्स से हंसी निकल गयी । हाथ से भी हंसी रोकने का प्रयास विफल रहा था।


मास्टर साहब का स्वर-पाठ अचानक थम गया। सदा मौजूद रहने वाली मुस्कान गायब थी। उसकी जगह क्रोध ने ले ली थी- "कौन है? हाथ ऊपर करो।" गम्भीर आवाज सुनते ही मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। हाथ अनायास ऊपर उठ गया।


उंगली का इशारा पाते ही मैं मरी-सी चाल में मास्टर साहब के पास आ गया। आदेश के पहले ही हथेली फैलाकर खड़ा हो गया। उन्होंने डस्टर उठाकर मारने की कोशिश की ही थी कि बीच में मेरे बगल में बैठा लड़का तेजी से आया और मेरी हथेली पर उसने अपनी हथेली रख दी। मास्टर साहब रूक गये। हैरत से उस लड़के को जो क्लास मॉनिटर था , देखा-" गोविंद तुम! क्या हुआ?"


-"मास्टर साहब, दोषी सिर्फ यह लड़का नहीं। हमसब हैं। हमसब को सजा मिलनी चाहिए।"


-"क्यों?"मास्टर साहब के हैरत में और इज़ाफा हो गया।


-" मास्टर साहब, उधर उस तरफ लड़को वाले बेंच पर अर्जुन बैठा हुआ है और इधर लडकियों वाली बेंच पर चित्रा बैठी है। उधर शिव शंकर बैठा है और इधर भवानी बैठी है। आप उधर पाठ कर रहे थे तो इधर पिछे बैठे सारे लड़के मुंह दबाकर हंस रहे थे। इसकी हंसी निकल गयी तो....."


-" बस-बस समझ गया। सब के सब शरारती हो। शर्म नहीं आती । यह स्कूल है। यहाँ सीखने आते हो। अच्छी बातें। अच्छा व्यवहार। सब माफी मांगो। अरे, ये दोनों तुम्हारी बहने हैं।"


हम सभी खड़े होकर माफी मांगने लगे। तभी घंटी बजी। क्लास से निकलते समय मास्टर साहब की मुस्कान कुछ अधिक गहरी थी।#

@कृष्ण मनु

धनबाद

9939315925


अगला लेख: प्याज



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
सम्बंधित
लोकप्रिय
बो
18 अक्तूबर 2019
प्
11 अक्तूबर 2019
टे
02 अक्तूबर 2019
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x