कविता



आजादी

राजनीतिक आजादी का कोई मोल है।आर्थिक आजादी अब तक रे गोल है।।खाली खजाना भर चलवाया जिनने,उनकी हीं होती सुहावनी हर भोर है।फूटपाथ से चुन खाये- जिनने तिनके,उनकी चौलों की छतों में कई होल हैं।।'आइ. पी. सी.' रट उतार लिया बचके,"अथर्व वेद" की ऋचाएँ सारी गोल हैं।अमीरों की उठ रही नित अट्टालिकायें,साधु चले



अंतिम दिन

सफर का पयाम होगा,अंतिम वो विराम होगा।श्वांस भी होगी मद्धिम,जब महाप्रयाण होगा।वो दिन आखिरी होगा.....!!!लिखती कलम शब्द जो,वो पृष्ठ भी अंतिम होगा।भाव,कल्पना मर्म सब,सदृश्य जब प्रतीत होगा।वो दिन आखिरी होगा.....!!!देह थामेगी निष्क्रियता,होगी धड़कन निस्तारित।दृश्य सब होंगे गमगीन,द्रुतयान होगा संचालित।वो दि



गुरुर

गुरूर जिश्म ओ' हुनर का बेकार हो जाएगा।झुर्रियों से टपकता इश्क हीं---- रंग लाएगा।।निर्मल



कौन थीं पंजाबी भाषा की सर्वश्रेष्ठ कवयित्री अमृता प्रीतम?

भारत में जहां एक ओर महिलाओं को हर चीज में पीछा रखने की बात होती है तो वहीं दूसरी ओर सदियों से महिलाओं ने अपने हुनर से लोगों को हैरान किया है। इनमें कई वीरांगनाओं के साथ कई आधुनिक महिलाएं भी शामिल हैं और इन्होंने हर क्षेत्र में अपनी सोच-समझ से खास पहचान बनाई है। उनमें से एक थीं अमृता प्रीतम जो पंजाबी



"अंधेरा ना फटके! "

"अंधेरा ना फटके! " ----------अन्धकार ना आये कुछ ऐसा जातां करो !सेना बन खड़े रहो ऐसी हूंकार भरो | *भारत का बच्चा -बच्चा जब तक पूर्णतया सच का लबादा लेकर ना उठकर जागेगा असत्य- हवा बहेगीहिल- हिल के कांपेगा ? * पाषाण पैच बनाकर सत्य लतियाता मिलेगाबहाने आसमान के वह धकियाता मिलेगाधरा पर आना



हमारा राष्ट्र भारत

राणा- शिवा- लक्ष्मीबाई को भूलजिन्ना नेहरु से मिल बँट रोते हो!तिरंगा फहराया नेता सुभाष नेसफेद टोपी पर जान झिड़कते हो!!बहुत घोटालों की जलेबी छानीसंकल्पों श्रिंखलाओं केमहाजाल में फँस सोते हो!जाग गई फिर सुभाष फौजविप्लव से भी तनिक नहीं डरते हो!!डॉ. कवि कुमार निर्मल



कुछ अपने दर्द की भी कहानी लिखा करो

कुछ अपने दर्द की भी कहानी लिखा करो , यू ना ज़िन्दगी को त्याग का श्रंगार बनाया करो । तस्वीर न बदलती फैम बदलने से ,खुद को उम्मीदो पर खड़ा होकर तो देखो । दो पल की ये ज़िन्दगानी ,हँसते हँसते जी कर तो देखो । यू तो आँखे आशब्दिक तौर पर सबकुछ बयां कर देती,खुद को खुद की प्रेर



साईं

अमीरों के भगवान,महलों में पूूूूजे जाते है!भिक्षा-पात्र वाले साईं भक्त,झोपड़-पट्टी में धुनी रमाते हैं!!डॉ. कवि कुमार निर्मल



नव प्रभात

भौर के दामन में...शबनम के मोती झरते..नवप्रभाती रश्मिक तंतु..दूबकण तक ऊर्जित करते...भरते नवल एहसास..प्रकृति के कण-कण में...शुभ्र वर्ण धारित ये...भरते उमंग अंतर्मन में..लहलहाती धरा ये..पहन हरित वसन को...पर्वत,कानन,खग,विहग..संजोए जैसे सजन को..सकुचाती,इठलाती..प्रकृति निज सौंदर्य पर...जैसे कोयल इठलाती..न



तुम कौन हो?

🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚बाल रूप में तुम प्रभु,एक जैसे हीं लगते हो।गुरुकुल में तुम अलग-अलग से हीं दिखते हो।।कभी "बरसाने" में रास रचातेकभी लंका दहन करवाते हो।कभी सुदामा के कच्चे चावल खाते,कभी भीलनी के जूठे बैर खाते हो।।शांत समाधि में कभी दिखते,कभी ''त्रिनेत्रधारी'' बनते हो।कभी दानव का वध तुम करते,कभी भस्मास



करो या मरो

बाहुबली रणक्षेत्र की ओर कूच करते हैंरण जीत कर आते या मर कर अमर होते हैंजो शोषित सह कर आर्तनाद् करते हैंत्रुटिपुर्ण कुपरंपरा चला ये निरीहसम बनसमाज का सर्वथा अहित हीं करते हैंडॉ. कवि कुमार निर्मल



मर्ज़

मर्ज़ कोई ले गया चुराकर ऐसा मैं बीमार हुआ। शुमार नहीं था किस्मत में जोक्यों उसका दीदार हुआ।। 💔



नारी

❤❤💚💜💙💛💙❤❤💜💚❤प्रकृति पुरुष से है या फिर नारी से है!पिधला हिमखंड हीं बन जाता 'वारी' है!!पुरुष तैलिय दाहक तरल, नारी दाह्य कोमल बाती है! शक्ति संपात कर ज्योत प्रज्वलित वह करती है!! "अर्धनारीश्वर" की यही अमर गाथ, कहानी है! ऋषियों-देवों की यही सास्वत अमृत वाणी है!!💙💚💛 💜💗💜 💛💚💙ड



तिल गुड़ खाइए मीठा - मीठा बोलिए - मकर संक्राति

हल्दी और कुमकुम का टीकालगाकर हो शुभारंभ.तिल और गुड़ की मिठास वाणी में जाए घुल.सुगंधित सुमन से सुवासित हो मनमंदिर.अनंत आकाश में अपना अस्तित्व दर्ज कराए रंगबिरंगी पतंग.धनु राशि से मकर में जब हो सूर्य का आगमन तब मानते सभी मिल जुलकर मैत्री और स



हाय पैसा तूने क्या किया

हाय पैसे तूने क्या किया ? हाय पैसे तूने क्या किया,मनुष्य को मनुष्य न रहने दिया,सारे बंधन और रिश्ते तूने,यों ही तोड़ा,मर्यादा तूने क्यों तोड़ा,हाय पैसा तूने क्या किया।मानव जन को तूने,कौन-सी खायी में ढकेला,सारी संवेदना की पड़ताल कर,मनुष्य



सरस्वती वंदना

हम मानुष जड़मति तू मां हमारी भारती आशीष से अपने प्रज्ञा संतति का संवारती तिमिर अज्ञान का दूर करो मां वागीश्वरी आत्मा संगीत की निहित तुझमें रागेश्वरी वाणी तू ही तू ही चक्षु मां वीणा-पुस्तक-धारिणी तू ही चित्त बुद्धि तू ही कृपा करो जगतारिणी विराजो जिह्वा पे धात्री हे देवी श्वेतपद्मासना क्षमा करो अपराधों



नन्नी सी जान देश की शान by neetesh Shakya

अग्नि मे तपकर, सोने की पहिचान होती है।नन्नी सी जान, देश की शान होती है।यही ज्योति सबके घर की उजाला होती है।नन्नी सी गुड़िया दिल की तारा होती है।।यही सम्मान यही दिल की जान होती है।नन्नी सी जान देश की शान होती है।।1।।ये ना समझ नादान, इनक



कलिका अवतार

अवतारअवतार यहीं है।अवतार यहीं है।।मन की परतों को खोल,छुप बैठा वहीं कहीं है।एषणा बुरी नहीं है।बुरी नहीं है।।अनाधिकृत घनसंचय है अपराध,विवेकपूर्ण वितरणसही है।सत्य जहाँ अढिग है,धर्म वहीं है।।साधना सेवा त्याग कासुपथ सही है।।अवतार यहीं है।अवतार यहीं है।।डॉ. कवि कुमार निर्मल



अवतार



रात अलबेली

स्वप्न सहेली,ये रात अलबेली।सँग तारों के,करती अठखेली।शबनम जैसे,मोती बरसाती।भोर होते जो,लगते पहेली।स्याह कभी,कभी चाँदनी।खिले गगन ताल,बनकर कुमुदिनी।नवयौवना सी,नटखट चंचल।मृगनयनी सी,सहज सुंदर।हरती क्लांत हर तन के,करती शांत ज्वार मन के।ये रात अलबेली,स्वप्न सहेली।स्वरचित :- राठौड़ मुकेश



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