कविता

बेबसी

यहाँ जिस चीज़ को चाहो, वही ना पास आती है ज़िन्दगी खेल में अपने, फ़कत सबको नचाती हैजो अपने पास होता है, कदर उसकी नहीं होती दूसरे की सफलता जाने क्यों, सबको लुभाती हैखिलाए गैरों के गुलशन, फक्र इसका मुझे हैं पर अपनी उजड़ी हुईं बगिया देखो, मुझको रूलाती हैकभी थी रोशनी जिससे, शमा वो अब नहीं दिखतीएक लपट आग क



कुछ तो बतलाओ

तमन्ना कब हुईं तुमको, मेरे नज़दीक आने कीमुझे बाहों में भर के सांसों में, मेरी समाने कीमैं जिसमें घिर गया ऐसे, जो सारा होश खो बैठाकहानी कुछ तो बतलाओ, मुझे अपने फसाने कीछोड़ दो तुम सभी चिंता, भगा दो दूर हर डर कोकसम मैंने तो खा ली है, तुमसे रिश्ता निभाने कीमुहब्बत कोई भी कर ले, मगर ये सच ना बदलेगाहुस्न



कोशिश

यूँ ही ना चैन से बैठो, ज़रा कोशिश तुम भी कर लोबेडियां तोड़ दो जग की, मुझको आगोश में भर लोनिभाते जाओगे क्या उम्र भर, केवल धरम अपनापरेशानी हर एक इंसान की, ना खुद के ही सर लो ज़माना क्या दिखेगा खुद ही गर, तुम उड़ नहीं सकतींएक परवाज़ ऊँची सी भरो, और फैला



हुनर

कोई नाता है जन्मों का, तभी तो याद आती हैतेरी हर चीज़ यूँ ही थोड़े, मेरे मन को लुभाती हैमेरे खूं का हर इक कतरा, खुशी में झूम उठता हैमुझे आवाज़ दे और मुस्कान दे, जब तू बुलाती है जब भी आगोश में भर के, तूने मस्तक ये चूमा हैहजारों फूल खिलते हैं, गीत धड़कन भी गाती हैतेरी ह



अगर

मुहब्बत तेरे सीने में, अगर मुझ सी पली होती कमी मेरी दो बाहों की, तुझे हरदम खली होतीअगर तुम साथ में रहते, तो रौनक बज्म में होती ये शब देखो निरी तन्हा, ना फिर ऐसे ढली होतीढूँढ़ने साथिया मन का, जब भी राहें चुनी मैंने काश उन राहों में शामिल, एक तेरी गली होतीकभी ऐसे भी



मैं और ब्रह्मांड

मेरी ये कविता ईश्वर की विशालता और उसके असीमित प्रकृति को समर्पित है। मुझे आश्चर्य होता है कि मैं इतने बड़े ब्रह्मांड का हिस्सा हूँ।ये ब्रह्मांड इतना बड़ा है कि सबसे नजदीक के तारे के पास भी जाने में वर्षों लग जाते है। इस कविता के माध्यम से मैंने इस ब्रह्मांड के यात्रा की परिकल्पना की है। आइये मेरे



स्वप्न

तन्हाइयों में गुम ख़ामोशियों की बन के आवाज़ गुनगुनाऊँ ज़िंदगी की थाप पर नाचती साँसें लय टूटने से पहले जी जाऊँ दरबार में ठुमरियाँ हैं सर झुकाये सहमी.सी हवायें शायरी कैसे सुनायें बेहिस क़लम में भरुँ स्याही बेखौफ़ तोड़कर बंदिश लबों कीए गीत गाऊँ गुम फ़िजायें गूँजती बारुदी पायल गुल खिले चुपचाप बुलबुल हैं घ



मेरे लिए पर्याप्त है ( लघु )

मेरे लिए पर्याप्त है ( लघु ) पूरा रास्ता,नहीं मालूम;वांछनीय गंतव्य, जहां जाना है, नहीं मालूम; एक बार में,



विजेता

तेरी मेरी मुहब्बत का मज़ा अल्लाह भी लेता हैतभी कुछ दूरियां वो दरम्यान हम सबको देता है लाख कोशिश करी मैंने, और सबने भी समझायाये मन राहें मुहब्बत में, ना पर कहने से चेता है अब ये जां मेरी तुम ही कहो , आ



ये ही तो प्यार है

तेरे मेरे बीच ना अब कोई दीवार हैजानेमन तू जान ले ये ही तो प्यार हैचढ़ गया एक बार तो उतरेगा ही नहींइस इश्क में होता सदा ऐसा खुमार है तू पास है मुझको पता चल ही जाएगा खुशबू भरी आती अगर कोई बयार हैतू मुस्कुरा रही है गर तन्हाई में कहीं फूलों में दिख जाती मुझको बहार है जो सुख मुझे तेरे क़रीब आने से मिलेमध



इशारा

एक तुम ही हो जिसने, मेरा जीवन संवारा हैमेरी इन धड़कनों ने नाम, बस तेरा पुकारा है मतलब का कोई खेल, न ये बातें मेरी समझोहर एक लफ्ज में मैंने दिया, तुमको इशारा हैएक तुम ही नहीं तन्हा, बेबसी मैं भी सहती हूँकितनी दुश्वारियों से वक्त, सोचो मैंने ग



किस्मत के धोखे

किस्मत के धोखे,ज़िन्दगी में, जब भी आते हैंकुछ भी करो, दिल को मगर, वो तो दुखाते हैंकभी सोचा ना था, यूँ ज़िन्दगी भी, रूठ जाएगीकुछ अपने , मुझे तो कोस के , हरदम सताते हैं मेरी कमजोरियां, मुझपे हमेशा, राज करती हैंसितारे भी, नई कोई राह ना, मुझको दिखाते हैं बिना चाहत के रिश्तों के, बोझ सब, सह नहीं सकते मेर



सच से मुकरने का

लो वादा कर दिया मैंने तुम्हें ना याद करने कारकीबों को मिलेगा अब पूरा मौका संवरने कामेरी चिंता नहीं करना मौत मुझको ना आएगीमुझे मालूम है रस्ता हर एक ग़म से उबरने कासभी ये जानते हैं छोर पे उस कुछ ना पाओगेलेकिन मज़ा कितना है राहे उल्फ़त गुजरने काख्वाइशें तैरने की तो ज़माने भर की रहती हैंसफलता को मगर फन चा



मैंने देखा था एक सपना



कविता

कर्ण को जो शांति दे,वीणा का वो मधुर क्रंदन हो तुम।मेरे ह्दय बाग कि,महकती कुमुदिनी हो तुम।कुण्ठित अस्तगामी इंसान को,जो बचा सके वो पतवार हो तुम।मधु के सरस स्वभाव सी,एक मीठी अनुभूति हो तुम।कलेवर की तपिस को जो हर सके,नीर की वो शीतल बौछार हो तुम।वृहद अनुराग प्रेम की,अनुपम निशानी हो तुम।क्षुब्धा पिपासा जो



यह भी होता हे यहीं

जब धुप लगी उसको तो , छाया कर दी उसने अपने ही सर का पल्लु उड़ा जब भुख लगी उसको ,तब पेट उसका भरा ,अपने हिस्से में आई आधी रोटी भी उसको खिला किन्तु - आश्चर्य हे या बिडम्ब्ना - इतने बड़े घर में, नहीं मिली उन दोनों को ,अपना हि सर ढकने की थोड़ी सि भी



विपरीत के विपरीत

विपरीत के विपरीत कुछ-कुछ लोग कुछ-कुछ शब्दों को भूल गए, बिसर गए;हमारे पास शब्द हैं, उपयुक्त शब्द हैं, पर कमजोर शब्द पर आ गए। कुछ-कुछ शब्दों के अर्थ भी भूल गए, बिसर गए;और गलत उपयोग शुरू हो गए;मैं भी इन कुछ-कुछ लोगों में हूं, हम जागरूकता से क्यों दूर हो गए।।अनिवार्य है,इस विपरीत धारा के विपरीत जाना;भाष



मरा जा रहा हूँ

""""" """""मरा जा रहा हूँ (हास्य)""""" """' ************************* प्रिय मुझसे तेरा यूँ मुंह का फुलाना, नखरे दिखाना यूँ रूठ के सो जाना, गजब ढा रहा है, गजब ढा रहा है। न हँसना तनिक भी न सजना सवरना, न आँखें दिखाना न लड़ना झगड़ना, गजब ढा रहा है, गजब ढा रहा है। ओ तिरछी नजर से न मुझको रिझाना, न कसमों



जीवन यात्रा

जीवन यात्रा कदम कदम, जिन्दगी बढ़ती रहती, आगे की ओर;बचपन से जवानी, जवानी से बुढ़ापे की ओर।. . . . जवानी से बुढ़ापे की ओर।। जीवन में आते हैं, कुछ ऐसे क्षण;शादी, सेवनिवृत्ती हैं, कुछ ऐसे ही क्षण। जब बदल जाती है जिंदगी, एकदम से;. . . . एकदम से;सिर्फ एक कदम च



फ़साना

मुहब्बत कर तो ली मैंने, मगर लुट कर ये जाना हैमुकम्मल हो नहीं सकता, ये बस ऐसा फ़साना हैख्वाब तो लुट गए सारे, अब तो मायूस बैठा हूँटूटे ख्वाबों की लाशों को, उमर भर अब उठाना हैकोई दिल की नहीं सुनता, सभी रिश्तों के हामी हैंबड़ा नफरत भरा भीतर से, पर सारा ज़माना है वो करता है, वो डरता है, संवरता



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