कविता



प्रेम और कृष्ण

💓💓💓💓💓💓💓💓💓💓💓💓💓💓 कृष्ण 💓💓💓💓💓💓💓💓💓💓💓💓💓💓महाभारत का पार्थ-सारथी नहीं,हमें तो ब्रज का कृष्ण चाहिए।राधा भाव से आह्लादितमित्रों का-साथ,चिर-परिचित लय-धुन-ताल चाहिए।।प्रेम की डोर तन कर,टूटी नहीं है कभी।अंत: युद्ध का,हमें दीर्ध विश्राम चाहिए।।।प्रेम सरिता में आप्लावन,अतिरेक प्या



“चिराग जलना चाहिए ”

“चिराग जलना चाहिए ” सिल गये हों होठ तो भी गुनगुनाना चाहिएअब पिटारी से कोई खुशबू निकलनी चाहिए |बदनुमा इस शहर की अब शाम ढलनी चाहिएखट्टे मीठे स्वाद को भी बदलना चाहिए |रहनुमा सारे किनारों को मचलना चाहिएठूठी सियासत बहुत बदरी अब सम्हलना चाहिए |विद



न बदल पाएगा.........

न बदल पायेगा तकदीर तेरी कोई और , तेरे हाथों में ही बसती है तेरी किस्मत की डोर , अगर चाहेगा तो पहुंचेगा तू बुलंदी पर तेरे जीवन में भी आएगा तरक्की का एक दौर .तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने , दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी . जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत , कल उनकी पीढियां



बिटिया तू हो चिर सुहागिनी

प्यारी बिटिया के विवाह पर बिटिया के लिए... बिटियाहो तू चिर सुहागिनी ||कम्पित कर से कम्पित स्वर से, झंकृत स्पन्दित तार तार सेमधुमय रसमय मनवीणा सेकोमल लय कोमल पुकार से गूँज रही ये मधुररागिनी |बिटिया हो तू चिर सुहागिनी ||स्वर्ण वर्ण से निर्झरिणी में, तुहिन बिन्दु से वनस्थली मेंसौरभ से अधखिली कली



भारत में

*भारत में*भारत में पूर्ण सत्य कोई नहीं लिखता अगर कभी किसी ने लिख दिया तो कहीं भी उसका प्रकाशन नहीं दिखता यदि पूर्ण सत्य को प्रकाशित करने की हो गई किसी की हिम्मत तो लोगों से बर्दाश्त नहीं होता और फिर चुकानी पड़ती है लेखक को सच लिखने की कीमत भारतीयों को मिथ्या प्रशंसा अत्यंत है भाता आख़िर करें क्या



मैं जब भी

कविताजब भी मैंमैं चुप बैठकर जब भी खुद से बात करता हूँ,मैं हर उस पल उसके साथ टहलता और विचरता हूँ।साथ मेरे दूर तक जाती है वीरान तन्हाईयां,फिर भी मैं उसकी बाहों में गर्म राहत महसूस करता हूँ।होता है सफर मेरा अधूरा दूर छीतिज तक, मैं फिर भी हर सफर में उसके साथ रहता हूँ।होती नहीं वो पास मेरे किसी भी पड़ा



कवि

कविमनन-चिंतन, पठन-पाठन में अग्रसारिता गह,बुद्धिजीवी कोई बन पाता है। तुकबंदी, कॉपी-एडिट वा कुछेक लकिरें उकेर,कवि कोई बन नहीं सकता है।। जन्मजात संस्कारों की पोटलीगर्भ से हीं कवि साथ लाता है। मानसिकत: परिपक्व हो मचल-उछल कर अभिव्यक्ति करता है।कवित्व स्वत: स्फुरित-स्फुटित हो,'रचनाकार' निखर उभरता है।। आलो



दिल की डायरी

💐💐💐💐💐💐 एक ख्याल आया जो मन में, डाल दिया तुमने उलझन में मिले जो तुम ऐसे डगर में, भूल गया सब पल भर में 💛💛💛💛💛💛 आसमान छूने की ललक थी



Hindi poetry on friends of benefits - मतलब की धूल; अर्चना की रचना

मतलबी दोस्ती पर आधारित हिंदी कविता मतलब की धूलवख्त की तेज़ धूप ने सब ज़ाहिर कर दिया है खरे सोने पर ऐसी बिखरी की उसकी चमक को काफ़ूर कर दिया है जब तक दाना डालते रहे चिड़िया उन्हें चुगती रही हुए जब हाथ खाली तो उसकी चोंच ने ज़ख़्मी कर दिया हैजब तक मेज़बान थे घर में रौनक लगी रही शाम



दधीचि

"ऋषि दधीचि" सम बन तुम देवों को तारो"चरैवेति-चरैवेति" का अमोध "मंत्र" उचारो"पूर्ण समर्पण" कर सर्वस्व अराध्य पर वारोबन जाओ तुम श्री कृष्ण सम--प्यारो-न्यारो"नीलकण्ठ" सम बन कर पीयो हलहल सारो**************************"देती रहती है नदी--मीठा जल होता हैलेता रहता ह



भैलेंटाइन परचम्

भैलेंटाइन परचम्पता नहीं था, आज भैलेंटाइन डे चल कर है आतादिन में याद दिलाते गर तो गिफ्ट-विफ्ट ले आतासाथ बैठ मोटेल में मटर-पनीर-पुलाव खाताउपर से मिष्टी आदतन रस-मलाई चार गटक जाताचल- रात हुई बहुत अब और जगा नहीं जाताभैलेंटाइन की बची-खुची कसर की पूरी कर पाताडॉ. कवि कुमार निर्मल



सफलता

सफलता..उपहार है श्रम का..स्वेद के कण-कण का..सफलता..परमानंद है..मान है सम्मान है..सफलता..श्रेय है लगन का..वटवृक्ष सी शीतल छाँव है..परिमाप है श्रेष्ठता का..सफलता..बल है संघर्ष का..मार्ग है उत्कर्ष का...है क्षण यही हर्ष का..स्वरचित :- राठौड़ मुकेश



सफलता

सफलता..उपहार है श्रम का..स्वेद के कण-कण का..सफलता..परमानंद है..मान है सम्मान है..सफलता..श्रेय है लगन का..वटवृक्ष सी शीतल छाँव है..परिमाप है श्रेष्ठता का..सफलता..बल है संघर्ष का..मार्ग है उत्कर्ष का...है क्षण यही हर्ष का..स्वरचित :- राठौड़ मुकेश



बचपन की कुछ यादें

कोई लौटा दो मुझे वो दोस्त सारे जो खेले थे साथ हमारे लड़ते झगड़ते भी थे एक दूसरे से फिर भी खुश थे सारेकहा चले गये वो दिन हमारे अब गाँव वीरान सा



मौन दुआएँ अमर रहेंगी !

श्वासों की आयु है सीमितये नयन भी बुझ ही जाएँगे !उर में संचित मधुबोलों केसंग्रह भी चुक ही जाएँगे !संग्रह भी च



सुस्वागत वसंत

"सुस्वागत वंसत"हरित-क्रांति की,प्रज्ज्वलित मशालपिली सरसों दृष्ट सर्वत्र,जिव-जंतु,समस्त विश्व.संपन्न-खुशहाल,प्रलय का भय त्याग,निर्भयता का करो वरण,अशुभ भाव त्याज्य, शुभ हों विचारस्वागत करतें है दृष्ट-अगोचर,सुहावन, 'ॠतु-बसंत बहार'माँ सरस्वती की रहे अहेतुकी कृपा,हो नित्य अद्भुत चमत्कारशुभारम्भ करो,पठन-



मुझको हैं सम्बल दे जातीं

मन भी बड़ी अजीब सी चीज़ है न ? कभी उदासी में भी मुस्काता है, और कभी आनन्द के आवेग में भी आँख भर आती है | और तब अनायास ही माँ बाबा की स्मृतियाँ और गहन होती जाती हैं | ऐसे ही कुछ पलों में लिखी गईं कुछ पंक्तियाँ... मुझको हैं सम्बल दे जातीं मन में छाता जब अँधियारा, या खुशियों की घटा उमड़ती |तब मीठी मुस्कान



पतझड़ से वसंत तक

🌵🌵🌵🌵🌵🌵🌵कभी पतझड़ के थपेड़ों से,मुरझा, झुक तुम जाते हो!🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿कभी वसंत की हवाओं से,मिल-जुल के मुस्कुराते हो!!🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🌞🌝🌞🌝🌞🌝🌝🌞सूरज की तपिश सह कर भी,फल-फूल डाल के लहराते हो!🌸🌷🌹🌻🌺🌻🌹🌸सावन-भादो की बौछारों से,झूम-झूम तुम इतराते हो!!⛅⚡☁☔☁⚡⛅सर्दियों के दस्तक के पहले



वसंत ऋतु की प्रथम कोपल

वसंत ऋतु और प्रथम कोपलनैसर्गिक बीज एक नील गगन से-पहला जब वसुन्धरा पर टपकामाटी की नमी से सिंचित हो वह-ध्रुतगति से निकसा- चमकाप्रकाश की सुक्ष्म उर्जा- उष्णतामाटी से मिला पोषण संचित कर-प्रथम अंकुरण बड़भागी वह पायाअहोभाग्य, पहली कोपल फुटी!लगा खोजने पादप नियंत्रक को--पर वह नहीं कहीं मिल रे पाया--हर पल महस



दुनिया का जादूगर

दुनिया का जादुगरविश्व लीला एवम् विश्व मेलातुम्हारी हीं अद्भुत रचना है।तुम्हारे दर पर इबादतखुद पर जादुगरीहर आदमी करता है।।डॉ. कवि कुमार निर्मल



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