कविता



आकर तनिक मुझको सुलाओ

जीवन की भाग दौड़ में उलझा मन... न जाने कितने उतारों चढ़ावों से थकित मन कभीन कभी ऐसी कामना अवश्य करता है कि कोई उसका अपना उसे मीठी तान सुनाकर ऐसी नींदसुला दे कि थकित मन को कुछ पलों के लिए विश्राम प्राप्त हो जाए... कुछ ऐसे ही उलझेसुलझे से भाव हैं हमारी आज की रचना में... जिसका शीर्षक है “आकर तनिक मुझको स



दूर ना जाना , पास आना विचारों के सागर में संग ग़ोता लगाना मनमोहक सपने दिखाना सपनों में मंजिल को खोजते हुए रास्तों से इश्क हो जाना मंजिल के मिल ज

दूर ना जाना ,पास आनाविचारों के सागर में संग ग़ोता लगाना मनमोहक सपने दिखाना सपनों में मंजिल को खोजते हुए रास्तों से इश्क हो जाना मंजिल के मिल जाने पर भी रास्तों से मोह न जाना यह कुछ वैसा ही है जैसे मृत्यु रुपी मंजिल तक जानाऔर पथ रूपी जिंदगी से लगन लग जाना।



अनमोल वचन

अनमोल वचनश्रद्धा सम भक्ति नहीं, जो कोई जाने मोलहीरा तो दामों मिले, श्रद्धा-भक्ति अनमोल।दयावान सबसे बड़ा, जिय हिय होत उदारतीनहुँ लोक का सुख मिले, करे जो परोपकार।स्वार्थी सारा जग मिले, उपकारी मिले न कोयसज्जन से सज्जन मिले, अमन चैन सुख होय।सब कुछ होत है श्रम से, नित श्रम करो तुम धायसीधी उँगली घी न निकसे



परम सत्य प्रकृति का

परमसत्य प्रकृति काआज सभी ने कन्या पूजन के साथ नौदिनों से चली आ रही दुर्गा पूजा सम्पन्न की और अब अपराजिता देवी की आराधना के साथविजयादशमी का पर्व मनाया जा रहा है... जिसे बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक कहाजाता है... सभी को विजयादशमी की अनेकशः हार्दिक शुभकामनाएँ... आप सभी जीवन के हरक्षेत्र में विजय प



कोरोना की काली भयावह रात

कोरोना की वो काली भयावह रातमाना कि आज है कोरोना की काली भयावह रातदरअसल मिली है अपने कट्टर पड़ोसी से सौगातयूँ ही कोई देता है अर्जित अपनी थाती व विरासतसच पूछो तो ये है करनी यमराज के साथ मुलाक़ात..।नींद भी आती नहीं, आते नहीं सपनेंबेसब्री बढ़ती जाती है याद आते हैं अपनेंसमाचारपत्रों में पढ़कर भयावहता की खबरे



मातारानी के दरबार में दुःख दर्द मिटाए जाते हैं....

मातारानी के दरबार में दुःख दर्द मिटाए जाते हैं...मातारानी के दरबार में दुःख दर्द मिटाए जाते हैं..दुनिया के सताए लोग यहाँ सीने से लगाए जाते हैं।मातारानी के दरबार में दुःख दर्द मिटाए जाते हैं।संसार मिला है रहने को यहाँ दुःख ही दुःख है सहने कोपर भर-भर के अमृत के प्याले यहाँ रोज पिलाये जाते हैं।मातारानी



युवा

जल रही हो जिसमें लौ आत्मज्ञान की समझ हो जिसको स्वाभिमान की हृदय में हो जिसके करुणा व प्रेम भरा बाधाओं व संघर्षों से जो नहीं कभी डरा अपनी संस्कृति की हो जिसको पहचान भेदभाव से विमुख करे सबका सम्मान स्वदेश से करे जो प्रेम अपरम्पार जानता हो चलाना कलम व तलवार राष्ट्र निर्माण में जो सदैव बने अगुवा वास्तव



प्रेम परिधि

बिंदु और रेखा में परस्पर आकर्षण हुआ तत्पश्चात् आकर्षण प्रेम में परिणत धीरे-धीरे रेखा की लंबाई बढ़ती गई और वह वृत्त में रूपांतरित हो गयी उसने अपनी परिधि में बिंदु को घेर लिया अब वह बिंदु उस वृत्त को ही संपूर्ण संसार समझने लगा क्योंकि उसकी दृष्टि प्रेम परिधि से परे देख पाने में असमर्थ हो गई थी कुछ समय



आलिंगन

पृथक् थी प्रकृति हमारी भिन्न था एक-दूसरे से श्रम ईंट के जैसी सख़्त थी वो और मैं था सीमेंट-सा नरम भूख थी उसको केवल भावों की मैं था जन्मों-से प्रेम का प्यासा जगत् बोले जाति-धर्म की बोली हम समझते थे प्यार की भाषा प्रेम अपार था हम दोनों में मगर ना जाने क्यों नहीं होता था हमारा मिलन पड़ा प्रेम का जल ज्यों



पास और दूर

वो जब मेरे पास थी थी मेरी ज़िंदगी रुकी हुई अब वो मुझसे दूर है ज़िंदगी फिर से चल पड़ी जब था उसके पास मैं मैं नहीं था कहीं भी मुझमें अब केवल मैं ही मैं हूँ वो कहीं नहीं है मुझमें जब थी मेरे पास वो था उसे खोने का डर खोकर उसको हो गया अब हर डर से बेख़बर ✍️आलोक कौशिक



करियर

करियर चौराहे पर बैठामैं रास्तों को गिन रहा कभी रास्ते को नापता ,तो कभी चुपके से रास्तों में झांकता जाना तो मुझे करियर बनाने को है लेकिन यह रास्तेयह संकट मुसीबतें मुझे रोकने के लिए लगातार ताक रहे हैहर रास्ते में एक घोड़ा लिए बुद्धिमान खड़े हैसबके पास दिखाने को प्रमाण है यह देखिए जनाब हमारे घोड़े पर



करियर

करियर चौराहे पर बैठामैं रास्तों को गिन रहा कभी रास्ते को नापता ,तो कभी चुपके से रास्तों में झांकता जाना तो मुझे करियर बनाने को है लेकिन यह रास्तेयह संकट मुसीबतें मुझे रोकने के लिए लगातार ताक रहे हैहर रास्ते में एक घोड़ा लिए बुद्धिमान खड़े हैसबके पास दिखाने को प्रमाण है यह देखिए जनाब हमारे घोड़े पर



है मनुष्य इतना घमंड ना कर प्रकृति का तू दमन ना कर यह जग सबका है पशु पक्षियो को खत्म ना कर यह जीव जंतु दुश्मन नहीं तेरे साथी है इनके बिना तू कुछ

है मनुष्य इतना घमंड ना कर प्रकृति का तू दमन ना कर यह जग सबका है पशु पक्षियो को खत्म ना कर यह जीव जंतु दुश्मन नहीं तेरे साथी है इनके बिना तू कुछ नहीं यह तेरे जीवन के बाराती है पंछी चाहे कितना ही ऊंचा उड़ जाए खाने के लिए धरती पर झोली फैलाए



अभिनव मिश्र



जिंदगी



महाप्राण निराला के प्रति

छायावाद के चार प्रमुख स्तम्भोंमें से एक महानकवि निराला... नवगीत केउद्भावक और प्रवर्तक... कल महाप्राण निराला जी की पुण्य तिथि के अवसर पर कुछ पंक्तियाँ श्रद्धांजलिस्वरूप प्रस्तुत की थीं... जो आज आप सबों के साथ साँझा कर रहे हैं... निराला जीजैसा भावुक और उदारमना कवि वास्तव में समस्त जगती के प्राणों में



सुबह से शाम हो रही है न्याय के लिए आँखें रो रही है कभी निर्भया तो कभी हाथरस जैसी घटनाए हर रोज हो रही है लगता है आज कल धरती पर मानव तो है लेकिन म

सुबह से शाम हो रही है न्याय के लिए आँखें रो रही है कभी निर्भया तो कभी हाथरस जैसी घटनाए हर रोज हो रही है लगता है आज कल धरती पर मानव तो है लेकिन मानवता धीरे धीरे जग से खो रही है किसको फर्क पड़ता है यहां न्यायपालिका में लाखों मुकदमे विचाराधीन है निर्दोष भी कारा गृह में मौन है अब यह गाँधी का देश नहीं है



तू कभी न दुर्बल हो सकती

काव्य मैराथन में आज सप्तम दिवस कीरचना प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसका शीर्षक है “तूकभी न दुर्बल हो सकती”... अपनी आज की रचना प्रस्तुत करें उससे पहले दो बातें...हमारी प्रकृति वास्तव में नारी रूपा है... जाने कितने रहस्य इसके गर्भ में समाएहुए हैं… शक्ति के न जाने कितने स्रोत प्रकृति ने अपने भीतर धारण किये हु



उठो बहना शमशीर उठा लो....

"उठो बहना शमशीर उठा लो..."उठो बहना शमशीर उठा लोसोयी सरकार न जागेगीहर घर में है दुःशासन बैठाऔर कब तक तू भागेगी...?समय आ गया फिर बन जाओतुम झाँसी की रानीशमशीर उठाकर लिख डालोएकदम नई कहानीमरते दम तक याद रहेसबको एकदम जुबानी....।उठो बहना शमशीर उठा लोबन जाओ तुम मरदानीकोई नज़र



माँ है हिंदी

तेरी सुंदरता और भी बढ़ जाती है जब माथे पर लगी होती है बिंदी निकालने वाले तो चाँदनी की भी निकालते है चिंदी कलम भी गर्व महसूस करती है जब कागज पर लिखते है हिंदी हिंदी के शब्द सुनकर तोप्राचीन काल में मोहिनी हुई थी जिंदी संस्कृत की पुत्री है सिंधी की बहन मेरी मात्र भाषा और मेरी माँ है हिंद



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