कविता

अटल मृत्यु

तुम वाणी की समरसता थेतुम थे संसद की एक तान...तुम राष्ट्रगीत थे भारत कातुम सवा अरब का राष्ट्रगान..! होगा तुम जैसा धीर कहाँयह घाव नहीं भर पाएगा...इतिहास अगर ख़ुद भी चाहेतुमको ना दोहरा पाएगा..!तुम स्वर्णमयी ग



अटल हु मैं अटल

मै अटल हु और हमेशा अटल रहुँगा तुम्हे हमेशा याद आता रहुँगा आज जाता हु , घर से बुलावा आ गया है मगर तुम रोना मत , मैं तो हर युग में आता रहुँगा म



हमारे दिलों में जयजयकार बनके

क्या लिखूँ उनके लिए ? जो करोड़ो दिलों पर राज किए ा कौन नहीं है आपके कायल ?सम्पूर्ण राष्ट्र को आप गौरवान्वित किये ा मिट गया है शरीर आपका ,पर हमेशा जीवित रहेंगे ,हमारे दिलों में जयजयकार बनके ा



अमर शहीद के नाम --

जब तक हैं सूरज चाँद --अटल नाम तुम्हारा है , ओ ! माँ भारत के लाल ! अमर बलिदान तुम्हारा है !!-आनी ही थी मौत तो इक दिन -- जाने किस मोड़ पे आ जाती.- कैसे पर गर्व से फूलती , - मातृभूमि की छाती ;-दिग -दिंगत में गूंज रहा आज--यशोगान तुम्हारा है !!ओ ! माँ भार



माँ भारती की आरती

माँ भारती की आरती, हम यूँ सदा गाते रहे।चरणों में अपनी माँ के, हम शीश झुकाते रहे।।है मन में इक आस, कि बढ़ता रहे विश्वासप्रेम की धारा दिलों में, हम सदा बहाते रहे।माँ भारती की आरती, हम यूँ सदा गाते रहे।।खेतों में हो हरियाली, चहुँओर हो खुशहाली फूल खुशियों के हम, सदा ही उगाते रहे।माँ भारती की आरती, हम यूँ



युवा सोच - देशप्रेम

देशप्रेम सदा ही बहता है,हमसब की ही नस-नस में। आन पड़ी तो जान भी देंगे,खाते हैं हम, ये कसमें। माना हमने कभी लड़ी नहीं,देशहित में एक लड़ाई। पर हमको जब-जब मौका मिला,हम ने भी, जान



है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिये - गोपालदास "नीरज

बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिएजिस तरह से भी हो ये मौसम बदलना चाहिएरोज़ जो चेहरे बदलते है लिबासों की तरहअब जनाज़ा ज़ोर से उनका निकलना चाहिएअब भी कुछ लोगो ने बेची है न अपनी आत्माये पतन का सिलसिला कुछ और चलना चाहिएफूल बन कर जो जिया वो यहाँ मसला गयाजीस्त को फ़ौलाद के साँचे में ढलना चाहिएछिनता हो जब



सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है - पियूष मिश्रा

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैदेखना है ज़ोर कितना बाज़ुए-क़ातिल में हैवक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमाँहम अभी से क्या बताएँ क्या हमारे दिल में हैसरफ़रोशी की...देख फाँसी का ये फंदा ख़ौफ़ से है काँपताउफ़्फ़ कि जल्लादों की हालत भी बड़ी मुश्किल में हैनर्म स्याही से लिखे शेरों की बातें चुक गईंइ



मकान की ऊपरी मंज़िल पर - गुलज़ार

मकान की ऊपरी मंज़िल पर अब कोई नहीं रहतावो कमरे बंद हैं कबसेजो 24 सीढियां जो उन तक पहुँचती थी, अब ऊपर नहीं जातीमकान की ऊपरी मंज़िल पर अब कोई नहीं रहतावहाँ कमरों में, इतना याद है मुझकोखिलौने एक पुरानी टोकरी में भर के रखे थेबहुत से तो उठाने, फेंकने, रखने में चूरा हो गएवहाँ एक बालकनी भी थी, जहां एक बेंत



जिस देश में गंगा बहती है: शैलेन्द्र

जिस देश में गंगा बहती है: शैलेन्द्रहोठों पे सच्चाई रहती है, जहां दिल में सफ़ाई रहती हैहम उस देश के वासी हैं, हम उस देश के वासी हैंजिस देश में गंगा बहती हैमेहमां जो हमारा होता है, वो जान से प्यारा होता हैज़्यादा की नहीं लालच हमको, थोड़े मे गुज़ारा होता हैबच्चों के लिये जो धरती माँ, सदियों से सभी कुछ



आजादी: राम प्रसाद बिस्मिल

आजादी: राम प्रसाद बिस्मिलइलाही ख़ैर! वो हरदम नई बेदाद करते हैं,हमें तोहमत लगाते हैं, जो हम फ़रियाद करते हैंकभी आज़ाद करते हैं, कभी बेदाद करते हैंमगर इस पर भी हम सौ जी से उनको याद करते हैंअसीराने-क़फ़स से काश, यह सैयाद कह देतारहो आज़ाद होकर, हम तुम्हें आज़ाद करते हैंरहा करता है अहले-ग़म को क्या-क्या



क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह पर कविता

बात सुनो भाई भगत सिंहगुंडे चोर इंडिया के…बात सुनो भाई भगत सिंहगुंडे चोर इंडिया के…भारत माँ को लुटते है जनता के सपने टूटते हैं,गरीब भूके मरते है अमीरों के घर भरते है….लड़किया सड़े तेजाब मैजवानी रुले शराब में…आज देश आजाद है आज देश आजाद हैआपकी क़ुरबानी पर नाज है.पर क्या करे ऐसी आजादी काहर दिन दिखती बर्बाद



स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ

आज 14 अगस्त है,स्वतन्त्रता दिवस की पूर्व सन्ध्या... और कल फिर से पूरा देश स्वतन्त्रता दिवस कीवर्षगाँठ पूर्ण हर्षोल्लास के साथ मनाएगा... अपने सहित सभी को स्वतन्त्रता दिवस कीहार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ...स्वतन्त्रता – आज़ादी – व्यक्ति को जब उसके अपनेढंग से जीवंन जीने का अवसर प्राप्त होता है तो निश्चित र



पश्चाताप

एक दिन बातों-बातों में फूल और तितली झगड़ पड़े तमाशबीन भाँपने लगे माजरा खड़े-खड़े कोमल कुसुम की नैसर्गिक सुषमा में समाया माधुर्य नयनाभिराम रंग, ख़ुशबू , मकरन्द की ख़ातिर मधुमक्खी, तितली, भँवरे करते विश्राम फूल आत्ममुग्ध हुआ कहते-कहते तितली खिल्ली उड़ाने में हुई मशग़ूल यारी की मान-मर्यादा, लिहाज़ गयी भूल बोली



सावन के झूले

सावन के झूले कलहरियाली तीज – जिसे मधुस्रवा तीज भी कहा जाता है – का उमंगपूर्ण त्यौहार है,जिसे उत्तर भारत में सभी महिलाएँ बड़े उत्साह से मनाती हैं और आम या नीम की डालियोंपर पड़े झूलों में पेंग बढ़ाती अपनी महत्त्वकांक्षाओं की ऊँचाईयों का स्पर्श करने काप्रयास करती हैं | सर्वप्र



पथ पर बढ़ते ही जाना है

पथ पर बढ़ते ही जाना हैअभी बढ़ाया पहला पग है, अभी न मग को पहचाना है |अभी कहाँ रुकने की वेला, मुझको बड़ी दूर जाना है ||कहीं मोह के विकट भँवर में फँसकर राह भूल ना जाऊँ | कहीं समझकर सबको अपना जाग जाग कर सो ना जाऊँ |मुझको सावधान रहकर ही सबके मन को पा जाना है ||और न कोई साथी, केवल



दुर्दशा नारी की

युग -युग से श्रापों से श्रापित, इज़्ज़त को सदा ललायित ,कृष्णा के पावन धरती पर ,होती रही हूँ घोर अपमानित ा खटक रहा है वजूद अपना ,खुद पर ही झललाई हूँ ,भागीदार मैं सृष्टि रचने में ,खुद ही सृष्टि से दुत्कारी गयी ा कहाँ सुरक्षित मैं रही ?कोई जरा मुझको बताना ,मुहल्ले



कजरारी बरसात

रात भर से रुकरुक कर बारिश हो रही है - मुरझाई प्रकृति को मानों नए प्राण मिल गए हैं... वो बातअलग है कि दिल्ली जैसे महानगरों में तथा दूसरी जगहों पर भी - जहाँ आबादी बढ़ने केसाथ साथ “घरों” की जगह “मल्टीस्टोरीड अपार्टमेंट्स” के रूप में कंकरीट के घनेजंगलों ने ले ली है... बिल्डिंग



रात भर छाए रहे बादल

रात भर छाए रहे बादल / प्रतीक्षा में भोर की और उनसे झरती नेह रस की हलकी हलकी बूँदें भिगोती रहीं धरा बावली को नेह के रस में...बरखा की इस भीगी रुत में पेड़ों की हरी हरी पत्तियों / पुष्पों से लदी टहनियों के मध्य से झाँकता सवेरे का सूरज बिखराता है लाल गुलाबी प्रकाश इस धरा पर..



बूंदें

आसमां से धरती तक पदयात्रा करती हरित पर्ण पर मोती सी चमकती बूंद बूंद घट भरे बहती बूंदे सरिता बने काली ने संहार कर एक एक रक्त बूंद चूसा बापू ने रक्त बूंद बहाये बिना नयी क्रांति का आह्वान किया बरसती अमृत बूंदें टेसू पूनम की रोगी काया को निरोगी करे मन को लुभाती ओस की बूंदें क्षणभंगुर सम अस्तित्व का ज



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