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कविता

कविता से सम्बंधित लेख निम्नलिखित है :-

प्यार की बरसात शबनमी थी

प्यार कि बरसात शबनमी थी कल रात बस तुम्हारी कमी थी प्यार कि बरसात शबनमी थी जिसमे भींग के भी हम प्यासे रहे कहा गया आखिर वो बरसा हुआ पानी जो देखा तो पाया कि आँखों



अपनी ही दुनियां

शान्त चेहरे की अपनी हीहोती एक कहानी पर दिलके अंदरहोते जज्बातों के तूफान,अंदर ही अंदर बंबद किताब के पन्ने पनीलीऑंखों से अनगिनत सपने झाकते , जीवनका हर लम्हा तितर बितर,जीवन का अर्थ समझ नही आता, भावहीन सी सोचती,खुद को साबित करने को उउतावली , पूछती अपने आप से,



झूमते हुए चली

प्रयाग से सारनाथहर कदम पे साथ साथझूमते हुए चली अपनी मित्र मंडली भक्ति की बयार मेहंसी खुशी के सार मे मौज की फुहार मे दोस्ती मे प्यार मे हर्ष से भरी हुई डगर डगर गली गली झूमते हुए चली अपनी मित्र मंडली किसने किया ये प्रचार कौन था सूत्र ध



दिल सलामत रहे बस यही दुआ करूँगा

कभी किसी से ना मोहबत करूँगा दिल सलामत रहे बस यही दुआ करूँगा अपने होठो से ना तेरा नाम लूँगा जब भी आएगी तेरी याद अपनी परछाई से लिपट के रो लूंगा मैं क्यूँ मोहब्त पे इल्जाम लूँगा जब तलक जियूँगा तन्हा



ईर्ष्या

अरुणोदय की मधुमय बेला में मैंने उसे देखा। नव प्रभा की भांति वह भी हर्ष से खिला था, मानो धरा से फूटी किसी नई कोंपल को पहली धूप का स्नेह मिला था। शिष्टता के अलंकार में अति विनीत हो, उसने मुझसे नमस्कार किया , और अप्रतिम आनंद का प्रतिमान मेरे ह्रदय में उतार दिया। मुझे



प्रहरी ( कुलदीप पांडेय ' आजाद ' )

लालच के आगे तुम अपने,अधिकारों को मत भूलो |लोकतन्त्र के प्रहरी हो तुम,हाथ उठा नभ को छू लो |बाहर से बाग दिख रहा पर,अंदर से क्या सूरत है ?जो माली कंटक छाँट सके,उसकी आज जरूरत है |वर्षों से दबी जो चिंगारी,उसको आज जलाओ तो,आँचल से बाहर निकलो,भ्रष्टाचर मिटाओ तो |मातृभूमि प्रणों से प्यारी,प्यारा प्राणों से



मातृभूमि की यही कहानी ( कुलदीप पांडेय ' आजाद' )

नित नव पल्लव सूख रहे हैं,स्वप्न हृदय के टूट रहे हैं |उपवन कैसे अस्त-व्यस्त है,नहीं नजर आता रँग धानी |मातृभूमि की यही कहानी | आजादी के अंकुर फूटे,सत्य मार्ग से रिश्ते टूटे |भ्रष्टाचार,कुरीति फली है,बढ़ती दिन-दिन है हैवानी |मातृभूमि की यही कहानी | प्रहरी कैसे लुप्त हो गए,पुष्प खिले वे कहाँ खो गए |उनको



आँगन

फूलों और कलियों से आँगन सजाना भी है,कीचड और काँटों से दामन बचाना भी है,महकेगा चमन-ऐ- गुलिस्तां अपना तभी,हर मौसम की गर्दिश से इसे बचाना भी है !!डी के निवातिया



हे पिता !

मेरी कविता " हे पिता ! " के कुछ अंश ....तुमने कितना कुछ दिया मुझेमैं तुमको क्या दे पाउँगा,जन्मों जन्मों तक जनक मेरे ! मैं याचक बन कर आउंगा. कितनी मन्नत, कितनी पूजा,कितनी कामना किया होगा,पुत्रों का पथ हो निष्कंटकपल पल आशीष दि



आईने की छवि

मुहब्बत ग़र समझता वो तो यूँ रूठा नहीं होताअलि के चूम लेने से फूल झूठा नहीं होताना संग जाएगा कुछ तेरे ना संग जाएगा कुछ मेरेसमझता बात ये ग़र वो साथ छूटा नहीं होताआईने की छवि घर को कभी रुसवा नहीं करतीतेरा पत्थर ना लगता तो कांच टूटा नहीं होतादोष सब देते हैं मुझको मगर सच भी तो पहचानोचमक होती ना हीरे में



अलोकाभास

तुम दबे रहे पन्नों के पीछे जाने कब तक मेरे साथी,तुम साथ चले मेरे चिंतन में हो साथ नहीं फिर भी साथी. ..मैं व्यक्ति मगर, मैं व्यक्त नहीं गूँगा हूँ खुद को कहने में, कल-कल कर बहता ही रहता बिछड़ा जल जैसे बहने में. ...जाने कितने सुरभित पल, क्षण मुस्कान मार कर चले गए,



चाँद पर सैर को जा रहीं बेटियाँ

चाँद पर सैर को जा रहीं बेटियाँ जीतकर ट्रॉफियाँ ला रहीं बेटियाँ कोख में मारते हो भला क्यूँ इन्हें ज़ुर्म क्या जो सज़ा पा रहीं बेटियाँ अस्मतें जो सरेराह लुटतीं कहीं मौत बेमौत अपना रहीं बेटियाँ बैठ डोली चलीं जब पिया की गली क्यूँ दहे



कीलों वाला बिस्तर

शायरों, कवियों की कल्पना में होता था काँटों वाला बिस्तर, चंगों ने बना दिया है अब भाले-सी कीलों वाला रूह कंपाने वाला बिस्तर। अँग्रेज़ीदां लोगों ने इसे ANTI HOMELESS IRON SPIKES कहा है,ग़रीबों ने अमीरों की दुत्कार को ज़माना-दर-ज़माना सहजता से सहा है। महानगर मुम्बई में एक निजी बैंक के बाहर ख़ाली पड़े



हौले से

तुम मेरी ज़िन्दगी में युँहि हौले से आ गएसावन के मेघों की तरह अम्बर पे छा गएतक़दीर के जुए ने मुझे यूँ तो छला कियालेकिन मेरा नसीब था जो तुमको पा गएग़मगीन हुईं महफिलें इक साथ जब छुटालेकिन तुम्हारे गीत मेरे कानों को भा गएछीना तुम्हें पहलू से मेरे मज़बूर कर मुझेलेकिन कभी भी तुम मेरे ख्वाबों से ना गएजीते



अंतर्मन से

जो तुमने सुनी, सुनी. ..न सुनी. .मेरे अंतर्मन की पीड़ा थी .... अनवरत कह रहा हूँ गाथा, पुष्पों को छंदों में बांधे, हूँ थका हुआ, नहिं सोया मैं पलकों से अंजलि दे दे कर ... मेरे शब्दों में छद्म नहीं मिटटी में मिलावट क्या होगी ?अस्



मुहब्बत का सरूर

देख के मन लगे गर किसी को पाने मेंहो गई उस से मुहब्बत तुम्हें ज़माने मेंअकेले तुम रहोगे बीच में जो लोगों केतन्हा खुद को नहीं पाओगे तब वीराने मेंमुहब्बत का सरूर जब दिलों में होता हैएक अदा दीखती है छुप के मुस्कुराने मेंइन मयखानों को तुम दोष कैसा देते होयहाँ हर शख्स महारत है बस पिलाने मेंतेरी तारीफ अब म



मिला तुम करो ....

कई बार देखा है मैंने तुम्हे, ख़ुशी होती है देख कर बार बार .......महीने में अक्सर मिला तुम करो, मेरी सैलरी मेरी जाने बहार ......



मेरा दोस्त

पहले आँगन में रहता था, अब खिड़की पे आता है।मुस्का के अपना उजला मुखड़ा कुछ यूँ दिखलाता है।देख के उसको खुश होती, मैं हौले से मुस्काती हूँ।झटपट सीढ़ी चढ़कर छत पर मैं आ जाती हूँ।प्यारी प्यारी बातें करता, कितना मुझे हँसाता है।परेशानी में देख मुझे वह अच्छे से समझाता है।।अपने मन की सारी दुविधा मैं उससे साझा कर



एकाकीपन

वो शहर के नुक्कड़ का बड़ा मकान और उसका छोटा सा कमरा, स्मृतियों के पार कहीं भूला कहीं बिसरा। असफलताओं से निराश, मुझे देख उदास, मुझसे लिपट गया और बोला, चल मेरी सूनी पड़ी दीवारों को फिर सजाते हैं, और कुछ नए स्लोगन आदि यहाँ चिपकाते हैं। भूल गया कैसे अपने हर इम्तिहान से पहले



मैं धड़कन हू मुझे दिल मे अपने बन्द कर लो

कौन तेरी मासूम नज़रो से गिरना चाहता है मैं आँसू हू मुझे पलकों मे बन्द कर लो अगर अपना समझती हो मुझको ,तो ख़ुद के इतना क़रीब रख लो मैं धड़कन हू , मुझे दिल मे अपने बन्द कर लो प्यार का ये अफ़साना आ



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