कविता



आ, अब घर लौट चलें

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आ, अब घर लौट चलें

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पलायन का जन्म

हमने गरीब बन कर जन्म नहीं लिया था हां, अमीरी हमें विरासत में नहीं मिली थी हमारी क्षमताओं को परखने से पूर्व ही हमें गरीब घोषित कर दिया गया किंतु फिर भी हमने इसे स्वीकार नहीं किया कुदाल उठाया, धरती का सीना चीरा और बीज बो दिया हमारी मेहनत रंग लाई, फसल लहलहा उठी प्रसन्नता नेत्रों के रास्ते हृदय में पहुं



कोरोना अब कुछ करो ना

"कोरोना कुछ करो ना"कोरोना! कोरोना!! अब और कोई कुछ कहो ना।अलविदा कह मरे, ऐसा कुछ जतन करो ना।।चक्के थमे निजी वाहनों के, अब तो डरो ना।दान दिए एम पी-एम एल ए ने, ₹ गिनो ना।।शिरडी के साईं मंदिर ट्रस्ट ने दिए ५१ करोड़,बाकी भी आगे बढ़ें- खुल कर दान करो ना।हे महामहिम ट्रंप, चीन से बात आज करो ना।।रिक्त



प्रकृति

विध्वंसक धुंध से आच्छादितदिख रहा सृष्टि सर्वत्र किंतु होता नहीं मानव सचेत कभी प्रहार से पूर्वत्र सदियों तक रहकर मौन प्रकृति सहती अत्याचार करके क्षमा अपकर्मों को मानुष से करती प्यार आती जब भी पराकाष्ठा पर मनुज का अभिमान दंडित करती प्रकृति तब अपराध होता दंडमान पशु व पाद



इंद्रधनुष

इंद्रधनुषचिड़िया ने जब वर्षा के बाद सर उठाया, सामने चमचमाता हुआ इंद्रधनुषी दृष्य पाया ।घोंसले से देखा उसने दूर वादियों में,विशाल रंगबिरंगी काया दो पर्वतों के बीच में ।उस तक पहुंचने की चाह में बेसुध उड़ चलाइच्छा तीव्र हो तो भूख-प्यास क्या भला ?रास्ते में सर्द हवा, चील



जमुना किनारे कन्हैया पधारे

जमुना किनारे, कन्हैया पधारेजमुना किनारे, कन्हैया पधारे ।वृंदावन घाट पे बंसी पुकारे ॥ मनमोहिनी तान जब मधुबन में गूंजे;थिरकती पवन को दिशा भी न सूझे ।हर जीव के मन में मुरली रच जाये;मोहन के मोह से कैसे बचा जाये ? गाय बछ्ड़े गोपाल के पास आकर बैठ गये;मोर प्रेम वर्षा में सहज ही झ



समय की पुकार

🙏🙏 समय की पुकार🙏🙏निरीह पशु-पँछियों को अपनीक्षुधा का समान मत बनाओइनमें जीवन है, इनको अपनोंसे वंचित कर रे नहीं तड़पाओखाद्यान्न प्रचूर है, और उगाओ"अहिंसा" का सुमार्ग अपनाओ🌳🌲🌼🌺🌷🌺🌼🌲🌳सौन्दर्य वर्धन हो धरा काशुन्य पर मत सब जाओपशु-पादप-वृक्ष-ताल-तलैया के



स्वार्थ

अँधेरे में तो परछाई भी साथ छोड़ देती है जनाब हम तो फिर भी इंसान है औरों की किसी को फिकर नहीं बस खुद पर सब कुर्बान है ।



कोरोना का कहर और सृजन

कोरोना का कहर और सृजनसम्मेलनों और कवि -गोष्ठियों की चहुँदिसि मची धूम हैहर ओर शंखनाद् गुँजायमान्,कीर्तन का शोर हैनगमों-नज़्मों में अगन,टपका कलमों से ओज हैमन की जमी हुई भडास सारी है आज निकस रहीगुर्गों की नजर शर्म से उफ़!कत्तई झुक नहीं रहीवख्त है, चेत जा; आ रही कोरोना की बौछार हैनफरत नहीं किसी से,विश्व ब



बहन

दिखती है जिसमें मां की प्रतिच्छवि वह कोई और नहीं होती है बान्धवि जानती है पढ़ना भ्राता का अंतर्मन अंतर्यामी होती है ममतामयी बहन है जीवन धरा पर जब तक है वेगिनी उत्सवों में उल्लास भर देती है भगिनी :- आलोक कौशिक संक्षिप्त परिचय:-नाम- आलोक कौशिकशिक्षा- स्नातकोत्तर (अंग्रेजी साहित्य)पेशा- पत्रकारिता एवं



कृष्ण लीला

🐚🐚 कहानी कृष्ण की 🐚🐚 🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️"कृष्ण जन्माष्टमी" हम हर्षित हो मनाते हैं।"कृष्ण लीला" आज हम सबको सुनाते हैं।।कारागृह में ''महासंभूति'' का अवतरण हुआ।दुष्ट कंस का कहर, जन जन का दमन हुआ।।जमुना पार बासु यशोधा के घर कृष्ण को पहुँचाये।''पालक माँ'' को ब्रह्माण्ड मुख गुहा में प्



बस इतनी सी चाह .....

मुमकिन नहीं ये मेरे लिए कि मैं तुझको भूल जाऊँ भूल जाऊँ 'गर जो तू मेरा नाम बदल देना ........ इतनी सी चाह है तुझसे हर शक्ल में नज़र मैं आऊं .... जो नज़र न आयी तुझको तो तू शीशा बदल देना ........



ऊँचे सपने

उँचे सपने बिखर जाते हैं-बालू के टिब्बे की तरह!संतोष के गहने-चमक जाते हैं सोने की तरह!!DrKavi Kumar Nirmal



तुम

मैं अब भी तुम्हारे बारे मे लिखती हूँहाँ, मैं अब भी तुम्हारे बारे मे लिखती हूँ। एक अरसे से साथ हैं हम, और इस साथ के बारे मे लिखती हूँ। मैं अब भी तुम्हारे बारे मे लिखती हूँ। जानती हूँ कभी कहोगे नहीं तुम, परये बात बहुत खुशी देती है तुम्हे, किमैं अब भी तुम्हारे बारे मे लिखती हूँ। वो अहसास जो कुछ 18 साल



पानी

मछली जिसमे रहती है , जिसे अपना घर कहती है, जल ही है वो जीवनधारा ,जो हर नदी में बहती है । कभी बारिश की बुँदे बनकर पौधों की प्यास बुझती है इठलाती और बलखाती फिर वसुधा की गोद में समा जाती है ।शक्ति जिसकी अपार है ,समुद्री जीवों का जो



कवि सम्मेलन

स्वार्थपरायण होते आयोजक संग प्रचारप्रिय प्रायोजक भव्य मंच हो या कोई कक्ष उपस्थित होते सभी चक्ष सम्मुख रखकर अणुभाष करते केवल द्विअर्थी संभाष करता आरंभ उत्साही उद्घोषक समापन हेतु होता परितोषक करते केवल शब्दों का शोर चाहे वृद्ध हो या हो किशोर काव्य जिसकी प्रज्ञा से परे होता आनन्दित दिखते वही श्रोता करत



बच्चा बनने का मन है

खेलने का मन है, कूदने का मन हैआज फिर बच्चा बनने का मन हैदौड़ने का मन है चिखने चिल्लाने का मन हैबिना डरे जिंदगी जीने का मन हैक्योंकि आज मुझे जीने का मन है आज मुझे बच्चा बनने का मन हैये जीना भी क्या जीना था जिसमें ना भविष्य कि चिंता थीना भूतकाल के दुखो का रोना थाबस आज था और



पिता के अश्रु

बहने लगे जब चक्षुओं से किसी पिता के अश्रु अकारण समझ लो शैल संतापों का बना है नयननीर करके रूपांतरण पुकार रहे व्याकुल होकर रो रहा तात का अंतःकरण सुन सकोगे ना श्रुतिपटों से हिय से तुम करो श्रवण अंधियारा कर रहे जीवन में जिनको समझा था किरण स्पर्श करते नहीं हृदय कभी छू रहे वो केवल चरण :- आलोक कौशिक संक्षि



कागज की कहानी

🙏लधु कथा कागज की "काव्यात्मक"🙏रद्दी बही और अखबारों को कूट -काटबनी लुगदी से चमक- उभर मैं आता हूँचाहने वालों के रंग में सहज मैं रंग जाता हूँ'उकेरी लकिरों' से कवियों का मन पढ़ पाता हूँशास्त्र कहें या किताब, पुस्तकालयों में सज जाता हूँ'भोज पत्र' अब दुर्लभ, मैं हीं सबका म



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