कविता

मेरे ही अंदर का उजड़ा हुआ बाग निकला

मैं अपने कमरे में बैठी हुई , खिड़की से बाहर देख रही थी ,बाहर कितना खालीपन और सन्नाटा था ,हवाओं में कोई हलचल नहीं ,न ही किसी पंछी का शोर था ,आसमा का चंचल नील नयन ,आज उदास बहुत था ,मालूम हो रहा था जैसे कोई तूफान आके ,इस गुलज़ार प्रकृति



हिन्दी कविता अमीर खुसरो | Amir Khusro Poems in Hindi

हिन्दी कविता अमीर खुसरो | Amir Khusro Poems in Hindi 1. सकल बन फूल रही सरसोंसकल बन फूल रही सरसों।बन बिन फूल रही सरसों।अम्बवा फूटे, टेसू फूले,कोयल बोले डार-डार,और गोरी करत सिंगार,मलनियाँ गेंदवा ले आईं कर सों,सकल बन फूल रही सरसों।तरह तरह के फूल खिलाए,ले गेंदवा हाथन में आए।निजामुदीन के दरवज़्ज़े पर,आव



दर्द-ए-महफिल सजा,अपने जख्मों को ताजा करती रही ा

दर्द-ए-महफिल सजा,अपने जख्मों को ताजा करती रही , किसी बेचैन दिल को नगमा सुना,मैं रोज मरहम बनती रहीअंदर-ही-अंदर जो टूटता रहा,वही नज्म मैं गुनगुनाती रही,नम आँखों के दर्द को समझे न मेरा महबूब ,अपने यार की दीवान



मै मीरा -सी दीवानी , तुमको कृष्णा बना लिया ा

आसमा से टूटकर ,एक सितारा जमीं पर गिरा , समझकर तुम्हारा दिल , मैंने दिल में छिपा लिया ,सजदे में जब भी हाथ उठा, लब पर तुम्हारा ही नाम आयाजान से भी ज्यादा अजीज हो मेरी जान ,मैं मीरा-सी दीवानी , तुमको कृष्णा बना लिया ा मेरे ही अंदर समाया है तू ,फिर भी ढूंढती



उलझन -- लघु कविता

इक मधुर एहसास है तुम संग - ये अल्हड लडकपन जीना , कभी सुलझाना ना चाहूं - वो मासूम सी उलझन जीना ! बीत ना मन का मौसम जाए - चाहूं समय यहीं थम जाए ; हों अटल ये पल -प्रणय के साथी - भय है, टूट ना ये भ्रम जाए संबल बन गया जीवन का - तुम संग ये नाता पावन जीना ! बांधूं अमर प्रीत- बंध मन के तुम सं



"मुक्तक"

"मुक्तक" सुखद आगमन आप का, माता महिमा प्यार।शारदीय नवरात में, सजा मातु दरबार।कीर्तन भजन व आरती, थाली पूजा फूल-नमन करूँ यश दायिनी, भजन करे परिवार।।-1मातु आगमन आप का, जल्दी हो इस बार।भक्त मंडली कर रही, माँ तेरा इंतजार।धूप दीप नैवेद्य है, अगर कपूरी थाल-हाथ-हाथ में कलश जल, और फूल का हार।।-2महातम मिश्र, ग



कलम हमारी

कौन सुने अब व्यथा हमारी, आज अकेली कलम हमारी,जो थी कभी पहचान हमारी, आज अकेली कलम हमारी।हाथों के स्पर्श मात्र से, पढ़ लेती थी हृदय की बाते,नैनों के कोरे पन्नों को, बतलाती थी मेरी यादें।कभी साथ जो देती थी, तम में, गम में, शरद शीत में,आज वही अनजान खड़ी है, इंतजार के मधुर प्रीत में।अभी शांत हू, व्याकुल भ



गजल

मेरी शायरी मुख्तलिफ है मेरे शेर अलग है अभी हासिल -ए -शोहरत मे देर अलग है ।अभी महफूज़ हूँ मै नाकामियों के साये में और मेरे हिस्से कि भी अन्धेर अलग है ।कोशिशों ने कामयाबियों से रिश्ता तोड़ लिया खुदा के



खुद में खोकर खुद को पाना

खुद में खोकर खुद को पाना काम ज़रा सा भारी हैं जिन नज़रो में देखी है हमनेसूरत अपनी वह नज़र तुम्हारी हैसारे ग़मो को हर देती है जो पल मेंकुछ ऐसी मुस्कान तुम्हारी है आँख मेरी लगने ही नहीं देती यादे तेरीक्या मेरी नींद भी अब तुम्हारी हैतुझको ही सोचू और तुझको ही



मै खून में अपने नहाया हु

दिल तुम्हारा तोड़ के मै भी खूब रोया हु तुमने शायद आसू बहाए होंगे मै खून मे अपने नहाया हु मै जानता हु कि तुम फूलो से भी नाजुक हो मगर यकीन जानो दिल तुम्हारा तो



आज देर रात तक

आज देर रात तक तेरे गुड नाईट के इंतजार में जागता रहा,मूंदी नम आंखो से मोबाइल की स्क्रीन को ताकता रहा।ये कहकर कि सो गया होगा तू मनाया मैने मेरे मन को,मन मुझसे दूर और मैं मन से दूर सारी रात भागता रहा।कोई खता अगर हुयी हो तो बता देता मुझको मेरे दोस्त,मैं रात भर चाँद से तुझको मनाने की भीख माँगता रहा।लडते



नेह तुलिका --

रंग दो मन की कोरी चादर हरे ,गुलाबी , लाल , सुनहरी रंग इठलायें जिस पर खिलकर !! सजे सपने इन्द्रधनुष के - नीड- नयन से मैं निहारूं सतरंगी आभा पर इसकी -तन -मन मैं अपना वारूँबहें नैन -जल कोष सहेजे-- मुस्काऊँ नेह -अनंत पलक भर !! स्नेहिल सन्देश तुम्



शक़्कर

एक रात दरवाजे पे देर रात कुछ आहट सी सुनाई दी ,बाहर जाकर देखा तो मोह्हबत खड़ी थी ।मैंने घड़ी मैं देखा 3 बज रहे थे और उसने खामोशियाँ के करवा को तोड़ते हुए बोला चीनी हैमुझे भी ना जाने उस पल क्या हुआ ना जाने कहा से हिम्मत आयी और जबान से निकल गया चलो साथ पीते है उसके चेहरे पे जिजक थी पहले शायद लेकिम बरसो



पन्नों पर भी पहरे हैं

पन्नों पर भी पहरे हैं✒️ बैठ चुका हूँ लिखने को कुछ, शब्द दूर ही ठहरे हैं,ज़हन पड़ा है सूना-सूना, पन्नों पर भी पहरे हैं।प्रेम किया वर्णों सेभावों कलम डुबोयासींची संस्कृति अपनीपूरा परिचय बोया,झंकृत अब मानस हैचमक रही है स्याहीपद्य सृजन में ठहराभटका सा एक राही;उभरें नहीं विचार पृष्ठ पर, सोये वे भी गहरे



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कविता

गांधी बाबा के स्वराज में सुरा बहुत है राज नहीं है | राज बहुत खुलते हैं लेकिन खिलता यहां समाज नहीं है | यह देखो कैसी विडंबना राजनीति में नीति नहीं है और राजनैतिक लोगों को नैतिकता



कुत्ते और इन्सान: अजय अमिताभ सुमन

मैंने ये कविता आदमी और कुत्तों के व्यवहार को ध्यान में रखते हुए लिखी है. मैंने देखा कि ईश्वर कुत्ते को स्वतन्त्र निर्णय लेने की शक्ति से वंचित रखा हुआ है. जबकि आदमी के पास स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता ह



हमारा सुख जीवन की उन रचनाओं में है जिससे मानवता विकसे

सदा सहज हो जीवन दाता कटुटा ना अपनाऊँ मानवता हित सदा समर्पित का जीवनदर्शन अपनाऊँ । जिस हित बना बना राष्ट्र यह उस हित बलि बलिदान सदा अपने को पाऊँ नाथ मालिक ईश है सृष्टा उसकी मर्जी पर चल पाऊँ नारी सम्मान सतत् जीवन माता का जीवन भारी भार ऋण से सदा



मैं और ब्रह्मांड:अजय अमिताभ सुमन

मेरी ये कविता ईश्वर की विशालता और उसके असीमित प्रकृति को समर्पित है। मुझे आश्चर्य होता है कि मैं इतने बड़े ब्रह्मांड का हिस्सा हूँ।आइये मेरे साथ इस ब्रह्मांड की यात्रा पर न



तुम खुश हो

कवितातुम खुश होविजय कुमार तिवारीआदिम काल में तुम्हीं शिकार करती थी,भालुओं का,हिंस्र जानवरों का और कबीले के पुरुषों का,बच्चों से वात्सल्य और जवान होती लड़कियों से हास-परिहासतुम्हारी इंसानियत के पहलू थे। तुम्हारी सत्ता के अधीन, पुरुष ललचाई निगाहों से देखता था,तुम्हारे फेंके गये टुकड़ों पर जिन्दा थाऔर



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