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कविता

कविता से सम्बंधित लेख निम्नलिखित है :-

सेना सदा महान है - शिशिर मधुकर

सेना सदा महान है उससे ही हिन्दुस्तान हैलेकिन हमारी कमज़ोरियों से बढ़ती ना उसकी शान हैजब भी कोई सैनिक अपना शहीद होता हैहर नागरिक का मन निश्चित ही बहुत रोता हैलेकिन जिस तरह से खबर मीडिया दिखाती हैदुश्मनो को वो तो बस खुशियां दे जाती हैरोते बिलखते परिजन जिस दर्द को दिखाते हैंदुश्मनो के वो तो सदा हौंसले



तेरी चाहतों के जैसा - -शिशिर मधुकर

चाहा बहुत ना दिल से तुझे दूर कर सकेभूलूँ तुम्हें ना वो मुझे मजबूर कर सके आनंद वो मैंने पा लिया जिसकी तलाश थीबाकी नशे ना मुझको कभी चूर कर सके एक तेरी उल्फत ने मुझे ऊंचा उठा दियाबाकी जतन ना मुझको यहाँ मशहूर कर सके यूँ तो दीवाने भी कई हर मोड़ पे मिलेतेरी चाहतों के जैसा ना पर नूर कर सके रग रग में तुम ही



तेरा जो साथ मिलता – शिशिर मधुकर

तेरा चेहरा जो दिख जाता वहीँ बरसात हो जातीबिना बोले ही नज़रो से दिलों की बात हो जाती अगर तुम चाँद के जैसा खुद का श्रृंगार कर लेतेये दावा है मेरा खुद ब खुद सुहानी रात हो जाती काश तुम मुस्कुरा कर के मेरे पहलू में आ जातेवो ही मेरे लिए तो खुशियों की सौगात हो जाती तू जिसके पास हो उसका रसूख ऊँचा रहता हैतेर



ख़ूबसूरत कायनात

हवाओं में तेरी ख़ुशबू फ़िज़ाओं में तेरी हँसी फूलों में तेरी झलक चाँदनी में तेरा नूररवि में तेरी दमकनीर में तेरी शीतलता आकाश में तेरी छवि माटी में तेरी महक बना रही है ख़ूबसूरत इस कायनात को २५ जून २०१७जिनेवा



पर कौन सुनेगा उसकी ?

शाम को आने मे थोड़ी देरीहो गयी उसकोघर का माहौल बदल चुकाथा एकदमवो सहमी हुई सी डरी डरीआती है आँगन मेहर चेहरे पर देखती हैकई सवालसुबह का खुशनुमा माहौलधधक रहा था अबउसके लिए बर्फ से कोमल हृदय मेदावानल सा लग रहा थावो खामोश रह कर सुनती है बहुत कुछऔर रोक लेती है नीर कोआँखो की दहलीज परपहुचती है अपने कमरे मेजह



सामाजिक समरसता

 29 जून 2017 का एक चित्र मुझे परेशान किये था। राजकोट में प्रधानमंत्री का 9 किलोमीटर लम्बा रोड शो लोग अनुमानित ख़र्च 70 करोड़ रुपये तक बता रहे हैं। 9 जुलाई 2017 का दूसरा चित्र गाँव बसंतपुर पांगरी ज़िला सीहोर म. प्र. राधा 14 वर्ष कुं



कैसे जान पाओगे मुझको

अगर तुमने प्रेम नही कियातो कैसे जान पाओगे मुझकोकिसी को जी भरकर नही चाहाकिसी के लिए नही बहायाआँखों से नीर रात भरकिसी के लिए अपना तकिया नहीभिगोया कभीनही रही सीलन तुम्हारे कमरेमे अगर कभीतो कैसे जान पाओगे मुझको ||हृदय के अंतः पटल सेअगर नही उठी कभी तरंगेनही बिताई रात अगरचाँद और तारो के साथनही सुनी कभी न



चल चले फिर आज वहीं

अरसे बीत गए तुझे दिल की बात बताए अरसे बीत गए तेरे दिल की बात सुने चल चलें फिर आज वहीं हुई थी शुरू जहाँ से अपनी दास्ताँबैठे थे जिस जगह थामे हाथों में हाथदेख रहे थे सपने, आखों में एक दूजे कीउसी जगह जहाँ चुपचाप बैठे थे, सहमे से फिर किया था तुमने और मैंने साथ में ईज़हार अपने प्यार का और एक हो गए थे दो द



यादों के झरोखे

अधर तेरे कभी कपकपायें तो होंगे कभी मेरे यादों के झरोखे छाये तो होंगे,क्या भूलकर भी अभी तुम याद करती होक्यूँ आई हिचकी मुझे इस तरह क्या अब भी मुझे तुम याद करती हो ! उत्तेजनाओं के बादल उमड़ते तो होंगेबरसातो के हिलोर मन में उठते तो होंगें, क्या अब भी संजोकर बैठे हो उन सवनो को क्यूँ बहक गया हूँ इस म



लम्बा नाम

ट्रेन में एक आदमी सबके छोटे नाम का मजाक उड़ा रहा था तभी वो मुझसे बोला - “हैलो मेरा नाम चंद्रशेखरन मुत्तुगन रामस्वामी पल्लीराजन भीमाशंकरन अय्यर! ….. और आपका नाम?”“नरेन्द्र” मैंने जवाब दिया तो वो हँसते हुए बोला “हमारे यहाँ इतना छोटा नाम किसी का नहीं होता”! मैंने जवाब दि



14 जुलाई 2017

बेवफा निकली तू

जिस तस्वीर को सीने से लगाया,वो ही दगा कर गयीहाँ लगा यूँ कीजिसने हमें जीना सि



अभी हारा नहीं हूँ

मैं अभी रुका हूँ थोड़ा थमा हूँ पर हारा नहीं हूँ नज़र अभी भी मुकाम पर है पैरो के छालो को देखा नहीं हूँ पीठ पर कई खंजर लहू बहा रहे है पर आखों से आंसू नहीं छलका हूँ विचारो की कश्मकश में उलझा है मन पर आस को छोड़ा नहीं हूँ निष्प्राण सा है तन पर दिल क



यह हो नहीं सकता

भले, सूरज पश्चिम से उग जाए मगर, कोई चाहें तुम्हें, मुझ से ज़्यादा यह हो नहीं सकताभले, चाँद उतर कर आ जाए धरती परमगर, कोई चाहें तुम्हें, मुझ से ज़्यादा यह हो नहीं सकता भले, रगों में बहता ख़ून पानी हो जाए मगर, कोई चाहें तुम्हें, मुझ से ज़्यादा यह हो नहीं सकताभले, सागर का नीर मीठा हो जाए मगर, कोई चाहें



मौक़ा ढूँढता हूँ

कुछ अनकही बातों को कहने का मौक़ा ढूँढता हूँ दिल में छुपे राज़ का इजहार, करने का मौक़ा ढूँढता हूँ खुली आँखों से देखे ख़्वाबों को मुकम्मल करने का, मौक़ा ढूँढता हूँ इस मोहब्बत को तुझ पे लुटाने का मौक़ा ढूँढता हूँ ज़िंदगी के इस पड़ाव परतेरा साथ पाने का मौक़ा ढूँढता हूँतुझे फिर अपना बनाने कामौक़ा ढूँढता



ज़िंदगी इन्हीं में है

इस चार दिन की ज़िंदगी में चार पल ख़ुशी के हैं तू जी ले इन्हें कुछ इस तरह कि ज़िंदगी इन्हीं में है मस्कुराहटों से गिन तू साल अपनी उम्र के हँसी ख़ुशी से बीते जो पलज़िंदगी इन्हीं में है छोड़ कुछ मीठी यादें उम्र के हर पड़ाव परपीछे मुड़ जब देखेगा ज़िंदगी इन्हीं में है ५ जुलाई २०१७जिनेवा



पैमाने के दायरों में रहना... (नज़्म) #ज़हन

पैमाने के दायरों में रहना,छलक जाओ तो फिर ना कहना...जो जहां लकीरों की कद्र में पड़ा होउस से पंखों के ऊपर ना उलझना...किन्ही मर्ज़ियों में बिना बहस झुक जाना,तुम्हारी तक़दीर में है सिमटना...पैमाने के दायरों में रहना,छलक जाओ तो फिर ना कहना...क्या करोगे इंक़िलाब लाकर?आख़िर तो ग



सावन



ख़ुदकुशी करते रहे

यूँ मुसलसल ज़िन्दगी से मसख़री करते रहेज़िन्दगी भर आरज़ू-ए-ज़िन्दगी करते रहे एक मुद्दत से हक़ीक़त में नहीं आये यहाँ ख्वाब कि गलियों में जो आवारगी करते रहे बड़बड़ाना अक्स अपना आईने में देखकर इस तरह ज़ाहिर वो अपनी बेबसी करते रहे रोकने कि कोशिशें तो खूब कि पलकों ने पर इश्क़ में पागल थे आंसू ख़ुदकुशी करते रहे आ गया



एक गज़ल

विलायत गया न वकालत पढ़ी है।चेहरों पे लिक्खी इबारत पढ़ी है।पढ़ी हैं किताबें, मगर बेबसी में लगाकर के दिल, बस मुहब्बत पढ़ी है।न कर जुल्म इतने के सब्र टूट जाये मेरे भी दिल ने बग़ावत पढ़ी है ।मुनाफे से कम कुछ न मंजूर इसको दुनिया उसूल-ए-तिज़ारत पढ़ी है | मुस्कुराये लब, तो ख



आया ऋतुराज बसंत

शिशिर का प्रकोप ढलान पर आया ऋतुराज बसंत दालान परखेत-खलिहान / बाग़ -बग़ीचे पीलिमा का सुरभित आभामंडल, गुनगुनी धूप पुष्प-पत्तों ने पहने ओस के कुंडल। सरसों के पीले फूल गेंहूँ-जौ की नवोदित बालियां / दहकते ढाक - पलाश, सृष्टि का साकार सौंदर्य मोहक हो



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