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कविता

कविता से सम्बंधित लेख निम्नलिखित है :-

दो पत्ती का श्रमनाद !

 पसीने से अमोल मोती देखे हैं कहीं ?कल देखा उन मोतियों को मैंनेबेज़ार ढुलकते लुढ़कतेमुन्नार की चाय की चुस्कियों का स्वादऔर इन नमकीन जज़्बातों का स्वादक्या कहा ....बकवास करती हूँ मैं !कोई तुलना है इनकी ! सड़कों पर अपने इन मोतियों की कीमतमेहनतकशी की इज़्ज़त ही तो मांगी है इन्होंनेसखियों की गोद में एक झपकी ले


बनैली बौराई तुम ?

  तुम कितनी शांत हो गयी हो अब ,बीरान सी भी .वो बावली बौराई सरफिरीलड़की कहाँ छुपी है रे ? जानती हो , कितनी गहरी अँधेरी खाइयों मेंधकेल दी जाती सी महसूसती हूँ खुद कोजब तुम्हारे उस रूप को करती हूँ याद . क्यों बिगड़ती हो यूँ ?जानती हो न ,तु


मेरी पाती

बादल की छाती परओस की स्याही सेसूरज की किरणों सेलिखी मैंने पातीभावनाओं को चुन चुनशब्दों में पिरो करसजा मैंने दीजिसे विविध भांतिऐ चंचल हवा सुन लेमेरा तू कहनाले जा उड़ा कर इसेजहाँ बस्ता हो मेरा साथी


पत्थरबाज़

वे मासूम हैं और उनके पत्थर अहिंसक । भले दहशतगर्दों की आड़ बन जायें । वे पत्थर मारें और हम फूल बरसायेँ ये भी देखें कि उनमें खार न हों । ऐसे मशवरे जो लोग देते हैं । उन्हें वे पत्थर क्यों न खिलाये जायें ? र र


सँभलिए

सँभलिए --------------- कभी कभी डर लगता है, वो प्यार न मुझसे कर बैठे, साथ मेरा ले भावुक होकर, घरवालों से ना लड़ बैठे। जो थोड़ा परिवार बचा है वह भी टूटा जाएगा, मैं हूँ अकेला, सदा अकेला, कोई मुझसे क्या कुछ पाएगा।। दोष न दे वो भले मुझे पर, खुद को माफ करूँ कैसे?


हार का उपहार

हार का उपहार बरसों परवानों को, दीपक कीलौ में जलते देखा है,शमा के चारों ओर पड़ेवे ढेर पतंगे देखा है. कालेज में गोरी छोरी कोघेरे छोरों को देखा है,खुद नारी नर की ओर खिंचे,ऐसा कब किसने देखा है. उसने क्या देखा, क्या जाने,किसकी उम्मीद जताती है,कहीं, ढ़ोल के भीतर पोल न हो,यह सोच न क्यों घबराती है. वह करती


प्रेम का अहसास

यदि मैं तुम्हे प्रेम करता हूँ,तो सिर्फ प्रेम करता हूँ,मैं प्रेम करता हूँ उस सच्चाई सेजिसे कभी महसूस किया थातुम्हारी आवाज़ में,मैं प्रेम करता हूँ तो उस झूठ से भीजो कभी लज्जित नहीं होता,जो ठहाके लगाता है मेरी न


टाइम का कुछ यूज हो जाये‬

तुम्हारे साथ बैठे टाइम का कुछ यूज हो जाए। तुम्हें चाहे या देखे दिल कन्फियूज होजाए।। तुम्हारे साथ ............| तुम्हें चाहे या देखे............|| हमारी हर कहानी हर जगह सुरखी पर हो दिलवर। कभी हम तुम मिले ऐसे की ब्रेकिंग न्यूज हो जाए।। उसे देने चले एक रोज ग्रीटिंग कार


यह कम है क्या

तुम मेरे साथ हो, यह कम है क्या चाहती हो मुझे, यह कम है क्या भर आती हैं आँखें, मेरे दर्द, मेरी ख़ुशी में, यह कम है क्या बाँट नहीं सकती मेरा समय किसी और के साथ, यह कम है क्याजान छिड़कती हो मुझ पर, यह कम है क्या कर देती हो हँस कर मेरी हर ख़ता को माफ़, यह कम है क्या स्वीकारा है मुझे सब कमज़ोरियों के साथ


हज़ारों की दौड़ में !

हज़ारों की भीड़ में एक दीवाना वो भी था.... उसके नफरत से वाकिफ एक अनजान वो भी था... सच्चाई से परे अपनी ही दुनिया में... अनकही लफ़्ज़ों का एक फ़साना वो भी था... तो सुनते है आपको उस अधूरे प्यार की बात... रोज़ तनहाइयों में कट रही थी उसकी अकेली रात... बताने से कतराता था...छुपाने स


तेरे दिल में जलता है दीपक मेरे प्रेम का

तुम्हें जो देखा तो पलको तले लाखो दिये से देखो जलने लगे .... तुम हो मेरी धड़कन , फिर जिस्म में क्यों नही धडकती हो ...... तुम हो मेरी सांस , फिर क्यों इस तरह उखड़ती हो ?……तू जो नही तो केसी खुशी ?मायूसी मे डूबी ह


ये कहाँ से आ गयी बहार है

ये कहाँ से आ गयी बहार है ,बंद तोमेरी गली का द्वार है। ख़्वाहिशें टकरा केचूर


बेटियां

हाइकु 5.7.5 के क्रम वाली क्षणिक कविता है और इसमें एक क्षण को उसकी सम्‍पूर्णता सहित अभिव्‍यक्‍त किया जाता है। इस वीडियो में बेटियों के विषय में कुछ हिन्‍दी हाइकु दे रहे हैं। विश्‍वास हैं अवश्‍य पसन्‍द आएंगे। पसन्‍द आने पर लाईकए कमन्‍टए शेयर व सब्‍सक्राईब करें। धन्‍यवाद ! ब


भाषायी पाखंडों की धुरी

वह अपनी भाषा में बोलता हैमैं अपनी भाषा में सुनता हूँशब्दों की प्रतीति ऐसी हैविभिन्न अर्थों को गुनता हूँ अर्थ और आशय की दूरीअपनी स्थितियों की मजबूरीभाषायी पाखंडों की धुरीलपलपाती जीभ सेगिरते हुए नमकीन शब्दमिठास के आभास मेंगुमसुम और निःशब्द क्यों ज़मीन की बात खोती हैज़मीन छोड़कर ज़मीन को देखनाहवा में खड़े


कब गीत प्रेम के गाऊँगी

अन्तर्मन का यह आर्तनाद्आत्मा पर आच्छादित विषादजीवन में पसरा अवसाद,कब दूर इसे कर पाऊँगी कब गीत प्रेम के गाऊँगी ?दुर्बल मन के अगणित विकाररुग्णित तन के कुत्सित विचारभावनाओं का उठता ये ज्वार क्या जीत इन्हें मैं पाऊँगी ?कब गीत प्रेम के गाऊँगी ..?जो बीत गया सो बीत गयाजो शेष बचा वह अस्थिर हैअपने इस व्याकुल


माँ-बाप के पैर छुए हुआ एक जमाना

कवि: शिवदत्त श्रोत्रियछोड़ा घर सोच कर, किस्मत आजमाना पर क्यों ना लौट मैं, कोई करके बहाना जन्नत ढूंढता था, जन्नत से दूर होकर माँ-बाप के पैर छुए हुआ एक जमाना ॥


ऐसी मेरी एक बहना है

ऐसी मेरी एक बहना हैनन्ही छोटी सी चुलबुल सीघर आँगन मे वो बुलबुल सीफूलो सी जिसकी मुस्कान हैजिसके अस्तित्व से घर मे जान हैउसके बारे मे क्या लिखूवो खुद ही एक पहचान हैमै चरण पदिक हू अगर वो हीरो जड़ा एक गहना हैऐसी मेरी एक .बहना है………..कितनी खुशिया थी उस पल मेजब साथ-२ हम खेला करतेछोटी छोटी सी नाराजीतो कभी


साहित्य (कविता ,कहानी ,)पतन की ओर

आजकल हमारे देश में नौजवानो के लिए साहित्य से लगाव ही नहीं |कविता,कहानी क्या है जानते ही नहीं |न लेखक को पहचानते हैं न कवि को |साहित्य से दूर ही रहते हैं वो तो आजकल अश्लील वीडियो ,अश्लील मूवीज एंव भोजपुरी के अश्लील गाने एंव फिल्मो को देखना पसंद करते हैं इन सबका हमारे देश मे तेजी से वृद्धि भी हो रहा ह


देश बेंच के खा डाला है नेता और दलालों ने

देश बेंच के खा डाला है नेता और दलालों ने ।जनता के घर डाका डाला मिलकर नमक हरामों ने ।खादी टोपी बर्बादी की बनी आज परिचायक है ।चोर उचक्के आज बन गए जनता के जन नायक हैं ।गाली – गोली किस्मत अपनी जीवन फँसा सवालों में ।देश बेंच के खा डाला है नेता और दलालों ने ।सरकारी जोंकें चिपकी हैं लोकतन्त्र के सीने में ।


बातें कुछ अनकही सी...........: रेलवे टिकट

बीते दिन थे कईजब से होकर आया मैं घर छुट्टी हुई थी कॉलेज मेंमैं भागे-भागे पहुँचा रेलवे टिकट-घर भीड़ बरी थी टिकेट-घर में आठ में से खिड़कियाँ खुली थी केवल छह पीछे मुड़ा था मैं क्यूँकि वहाँ लिखा था भारत माता की जय ट्रेन एक घंटे में थी लाइनें लम


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