कविता



जात आदमी के

आसाँ नहीं समझना हर बात आदमी के,कि हँसने पे हो जाते वारदात आदमी के।सीने में जल रहे है अगन दफ़न दफ़न से ,बुझे हैं ना कफ़न से अलात आदमी के?ईमां नहीं है जग पे ना खुद पे है भरोसा,रुके कहाँ रुके हैं सवालात आदमी के?दिन में हैं बेचैनी और रातों को उलझन,संभले नहीं संभलते हयात आदमी के।दो गज



नयी उम्मीदें

खुद ही से मैं नज़रें चुराने लगी हूं,उन यादों से दामन छुड़ाने लगी हूँ ।खुद ही से खुद ही का पता पूछती हूँ,न जाने कहाँ मैं विलीन हो चुकी हूँ ।अरमानों को अपने दबाने लगी हूँ,पहचान अपनी भुलाने लगी हूँ ।भटकने लगी राह मंज़िल की अपनी,कहूँ क्या किधर थी, किधर को चली हूँ । ....और पढ़ें



शब्दों की माला

शब्दों की मालाशब्दजब तक मुझको न था उचित ज्ञान,शब्दों के प्रयोग से थी मैं अनजान,न था इन पर मेरा तनिक ध्यान,न ही थी इनकी मैं कद्रदान।मंडराते थे ये मेरे आसपास,छोड़ते न थे कभी मेरा ये साथ,इनको मुझसे थी यही एक आस,कभी तो इनका मुझे होगा एहसास।धीरे से मुझे इनसे प्यार हुआ,इन शब्दों



मुक्तक

सुलगते आग को मै इश्क़ बता देता हूँइस तरह लफ्ज़ों का मै जाल बना देता हूँजो मेरे इश्क में पतंगों से जल गये यारोंउन्ही को आज से आशिक करार देता हूँ ©®डॉ नरेन्द्र कुमार पटेल



जिंदगी की बही

★☆जिंदगी की बही☆★जिंदगी की- ना बांचे बहीआज करदे- उसे तूं सहीआँसुओं की- नदी बह रहीलबों पे- खुशी छा रहीजिंदगी की- बांचे ना बहीआज करदे- उसे तूं सहीजोश की किरणें- छा रहींगर अँगुलियाँ- हरकत ना करीपन्ना पलट- देखा ना कभीआगे की फिक्र- करो अब सभीकिश्ती साहिल की ओर- चलीमंझधार में- थी वो फंसीजिंदगी की- पूरी ब



नया साल 2021

अंधकार का जो साया था, तिमिर घनेरा जो छाया था,निज निलयों में बंद पड़े थे,रोशन दीपक मंद पड़े थे।निज श्वांस पे पहरा जारी, अंदर हीं रहना लाचारी ,साल विगत था अत्याचारी,दुख के हीं तो थे अधिकारी।निराशा के बादल फल कर,रखते सबको घर के अंदर,जाने कौन लोक से आए, घन घ



नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ

सभी सुखी हों, सभी रोगमुक्त रहें, कोरोना जैसी किसी भी महामारी सब मुक्तहों... सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े…भारतीय जीवन दर्शन की इसी उदात्त भावना के साथ पूर्ण हर्ष और उल्लास से वर्ष 2020 को विदा करते हुए आइये स्वागत करें वर्ष 2021 का… सभी को नववर्ष की हर्ष भरी



अभिलाष

जीवन के मधु प्यास हमारे, छिपे किधर प्रभु पास हमारे?सब कहते तुम व्याप्त मही हो,पर मुझको क्यों प्राप्त नहीं हो?नाना शोध करता रहता हूँ, फिर भी विस्मय में रहता हूँ,इस जीवन को तुम धरते हो, इस सृष्टि को तुम रचते हो।कहते कण कण में बसते हो,फिर क्यों मन बुद्धि हरते हो ?सक्त हुआ मन निरासक्त पे,अभिव



तुम शेर बन अड़े रहो....

तुम शेर बन अड़े रहो....कोरोना अभी गया नहीं...शेर बन अड़े रहो, घर में ही डटे रहोशेरनी भी साथ हो, शावक भी पास होबाहर हवा ठीक नहीं, निकलना उचित नहींशेर बन अड़े रहो, घर में ही डटे रहो...।दूध की मांग हो या सब्जी की पुकार होभले राशन की कमी हो, तुम फिकर करो नहींतुम निडर खड़े रहो, बिल्कुल डरो नहींशेर बन अड़े रहो



दोस्ती



जीव और जगत

जीव तुझमें और जगत में, है फरक किस बात की,ज्यों थोड़ा सा फर्क शामिल,मेघ और बरसात की।वाटिका विस्तार सारा , फूल में बिखरा हुआ,त्यों वीणा का सार सारा, राग में निखरा हुआ।चाँदनी है क्या असल में , चाँद का प



प्रकृति रहस्य

🕉️🕉️🕉️🐚सृष्टि-रहस्य🐚🕉️🕉️🕉️नश्वर जगत् है- धारणा भ्रामक- त्रुटिपुर्ण हैब्रह्म सत्य है एवम् जगत् सापेक्षित सत्य हैवस्तु का रूप रंग आकार बदल सकता हैतरंग का खेल सारा नष्ट नहीं हो सकता हैमहाविध्वंस धातक सस्त्रादि बन सकते हैंमहल ढह मिट्टी का मलवा बन सकते हैंपंचतत्व का ये तन जल राख बन जाता हैसृ



बारामती का शेर....

बारामती का शेर....बारामती के लोंगों ने बस एक ही नाम को है पूजा शरद पवार नाम मान्यवर हर गली शहर में है गूँजासाहब महाराष्ट्र की धरती पर ऐसा नाम कहाँ है दूजाराजनीति गलियारे में भी वही नाम जाता है पूजा।बड़े महारथी पाँव चूमते झुक झुककर भाई जिसकेगाथा क्या गाऊँ मैं भाई उसके चरित्र की महिमा केबोल कभी बड़ बोलन



चलो तुम बताओ

प्यार तो तुमने भी मुझसे किया था मैं तो तुम्हारा प्यार लिखीचलो तुम बताओ...... झूठ ही सही मगर तुमने भी तो मेरी बेबफाई उससे सुनाई होगी मैं तो तुम्हारी यादों के अंक मेंआंसुओं से तकिये पर तुम्हारी तस्वीर बनाती हूँ चलो तुम बताओ......अपने दर-ओ



नसीब अपना अपना...

नसीब अपना-अपनाकिसी ने सच कहा है साहबदुनिया में सभी लेकर आते हैंनसीब अपना-अपना....।विधिना ने जो लिख दियातकदीर छठी की रात मिटाए से भी नहीं मिटतालकीर खींची जो हाथ....।नसीब में होता है तोबिना माँगे मोती मिल जाता हैनसीब में न होने परमाँगने से भीख भी नहीं मिलती है।ये तो नसीब का ही खेल हैरात का सपना सुबह स



एक मसीहा जग में आया....

एक मसीहा जग में आया....एक मसीहा जग में आयादलितों का भगवान बनाराजनीति मन को ना भायाज्ञानसाधना ही आधार बना।निर्धनता को धता बतायाछात्रवृत्ति से अरमान सजोयाकाला पलटन में स्थान मिलागुरू से पूरा सम्मान मिला।अर्थशास्त्र जो मन को भायाडॉक्टरेट की डिग्री दिलवायावर्णव्यवस्था थी मन में चुभतीशोध प्रबंध उस पर ही



गुम हूँ उसके याद में.....

गुम हूँ उसके याद में....गुम हूँ उसके याद में, जिसे चाहा था कभीगोदी में सुलाकर जिसने, दुलारा था कभीप्रसव-वेदना की पीड़ा से, जाया था कभीदुःख सहकर उसने, पाला-पोसा था कभीरात-रात भर जागकर, सुलाया था कभी।गुम हूँ उसके याद में, जिसने दुनिया में लाया था कभीअपने सपनों को तोड़-तोड़कर, जिलाया था कभीखुद भूखी रह-रहक



शामत मुझ पर ही आनी है....

शामत मुझ पर ही आनी है...शादी अपनों की होया किसी बेगाने कीखर्चा उतना ही है जीश्रीमतीजी के जाने की। जब देखो तब सुनाती रहती हैंखर्च ही क्या है? खर्च ही क्या है?सुन – सुनकर कान पक गयादुकानों के चक्कर काटते-काटतेसच मानों पूरा दिन बीत गया….जेब खाली होकर क्रेडिट पर आ गया। सोचा छोड़ो अब तो झंझट छूटातभी खनकती



मां

माँ! तुम्हारी बस इतनी सी कहानी।दर्द-दुख-सुख-बच्चे औ, कुर्बानी।जन्म देकर जननी जब तुम बन गई।मानो खुद की खुद से ही ठन गई।अपने सपने और शौक हुए पुराने।बच्चों के सुख-दुख निज तुमने माने।नौ माह कोख और जनन की पीड़ा।तुम सह गए समझ प्रिय-बाल-क्रीड़ा।



वक़्त का तराजू

वक़्त का तराजूवक़्त वह तराजू है साहबजो बुरे वक़्त में अपनों का वजन बता देता हैपराये को साथ लाकर खड़ा कर देता हैवक़्त ही वह मरहम है साहबजो गहरे से गहरे घाव को भी फौरन भर देता हैऔर भरे हुए घाव को कुरेदकर हरा कर देता हैवक़्त ही सबसे बड़ा गुरू है साहबजटिल पाठ को भी पल भर में समझा देता हैमूर्ख को भी विद्वता का



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