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कविता

कविता से सम्बंधित लेख निम्नलिखित है :-

कविता - आ लिपट गले

चप्पा चप्पा हर सडक सडककरता मेरा दिल धडक धडकतुझसे मिलने की चाहत मेंन रहता दिल मेरा राहत मेंहै तू गई कहाँ मेरी बंजारनआ लिपट गले जा मनहारन. तेरी झीनी उस खुशबू मेंखोता रहता क्यों मजनू मैंलाली गुलाब सी होंठ खूबनरमाई जैसे हो घास दूबअब लौट के आजा मनभावनआ गले लिपट जा मनहारन. उन सख्त गर्म दोपहरी मेंउन नर्म अ



इस शतक को शून्य कर दो...!

शून्य से सौ बनानासफलता पर इतरानाकाबिलियत का अपनेबेसाख्ता जश्न मनाना...जो कोई पूछ दे अगरसूरमां हो बहुत तुम गरबस ये करके दिखा दोचक्रव्यूह में घुसे शान सेजरा निकल कर दिखा दोये जो शतक लगाया हैउसे फिर से शून्य बना दो...इतना चले हैं हम सबकि रास्ते चिढ़ गयें हैंइतने हासिल किये मुकम्मलमंजिलें बेनूर हो चली है



डाकिया

डाकिया अब भी आता है बस्तियों में थैले में नीरस डाक लेकर, पहले आता था जज़्बातों से लबालब थैले में आशावान सरस डाक लेकर। गाँव से शहर चला बेटा या चली बेटी तो माँ कहती थी -पहुँचने पर चिट्ठी ज़रूर भेजना बेटा या बेटी चिट्ठी लिखते थे क़ायदे भरपूर लिखते थे बड़ों को प्रणाम छो



मुझे चाँद चाहिए

तोड़ लूँ,... उस नक्षत्र को जिस और कोई इंगित करे, मुझे वो उड़ान चाहिए,हाँ - हाँ मुझे चाँद चाहिए | नीले क्षितिज पे टंगी छिद्रों वाली,उस काली चादर का वो सबसे बड़ा सुराख़ चाहिए, हाँ - हाँ मुझे चाँद चाहिए |



कुछ फायदा नहीं

कुछ फायदा नहींमैं सोचता हूँ, खुद को समझाऊँ बैठ कर एकदिनमगर, कुछ फायदा नहीं ||तुम क्या हो, हकीकत हो या ख़्वाब होकिसी दिन फुर्सत से सोचेंगे, अभी कुछ फायदा नहीं ||कभी छिपते है कभी निकल आते है, कितने मासूम है ये मेरे आँशुमैंने कभी पूछा नहीं किसके लिए गिर रहे हो तुमक्योकि कुछ फायदा नहींतुम पूछती मुझसे तो



नई शुरुआत करते हैं

भले ही मुद्दतों से हम ना तुमसे बात करते हैंतेरे ख़्वाबों में ही लेकिन बसर दिन रात करते हैंये माना बाग़ उजड़ा है बहारें अब ना आती हैंउम्मीदें मन में रख मेघा फिर भी बरसात करते हैंजिन्हें इस ज़िन्दगी में प्यार में भगवान दिखता हैहदें सब तोड़ कर वो फिर से मुलाक़ात करते हैंभूल कुछ हो गईं तुमसे चूक मैंने भ



निशां तो फिर भी रहते हैं

भले ही घाव भर जाएं निशां तो फिर भी रहते हैंमुहब्बत के गमों को आज हम तन्हा ही सहते हैंवो पत्थर हैं ज़माने से कभी कुछ भी नहीं बोलामगर हम उनसे लिपटे आज भी झरने से बहते हैंबड़ी चिंता है दुनिया को कहीं वो बात ना कर लेंतभी जज्बात मन के आज वो नज़रों से कहते हैंकटेगी ज़िन्दगी खुशहाल हो बस साथ में उनकेमहल पर



याद आज भी है

वो मंज़र याद आज भी हैजब देखा था तुझे पहली बारवो ज़माना याद आज भी हैजब चाहा था किसी को पहली बारवो लम्हे याद आज भी हैंजो गुज़रे थे तेरे साथ पहली बारवो बातें याद आज भी हैंजो कि थीं तुम से पहली बारउन ख़तों का मज़मून याद आज भी हैजो लिखे थे तुझे पहली बारवो प्यार रहेगा साथ मेरे ज़िंदगी भरजो हुआ था तुम तुमस



वंदना

हे जग जननी आस तुम्हाराशब्दों को देती तुम धारावाणी को स्वर मिलता तुमसेकण-कण में है वास तुम्हारा |दिनकर का है ओज तुम्ही सेशशि की शीतलता है तुमसेनभ गंगा की रजत धार मेंझिलमिल करता सार तुम्हारा |सिर पर रख दो वरद हस्त माँलिखती रहूँ अनवरत मैं माँहर पन्ने पर अंतर्मन केलिखती हूँ उपकार तुम्हारा || मीना धर



दोहे

हे भगवन ! वर दीजिए, रहे सुखी संसार |घर परिवार समाज पर, बरसे कृपा अपार ||दीन दुखी कोई न हो, औ सूखे की मार |अम्बर बरसे प्रेम से, भरे अन्न भण्डार ||कृपा करो हे शारदे, बढ़े कलम की धार |अक्षर चमके दूर से, शब्द मिले भरमार ||बेटी सदन की लक्ष्मी, मिले उसे सम्मान |रोती जिस घर में बहू, होती विपत निधान ||मीना



और वो चला गया. ..

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क़तरा क़तरा इश्क़ ....

क़तरा क़तरा इश्क़ मुझसे रूठता रहाहर ख़्वाब निंगाहों में मेरा टूटता रहा ...!कश्ती लहर के संग मेरी डूबती रहीमेरे हाथ से दामन जो तेरा छूटता रहा ...!!



कविता गर्म लावे

*गर्म लावे* ✍संजीव खुदशाह मै जानता हूं, अगर मै कुछ कहता ये मेरी जीभ काट ली जाती। मै जानता हूं, अगर मै कुछ सुनता मेरे कानों में गर्म लावे ठूंस दिये जाते। जिसे बताते थे तुम अपना, रहस्य खजाने का जिस पर तुम आध्यात्म के नाम पर इठलाते थे इतना मैने आज इनको पढ़ लिया है। जान लिया है वो कारण, जीभ को काटने का



कैसी दीपावली

अब कहाँ रौशनी कैसी परछाईंयाँबस अंधेरों के मेले हैं तनहाइयाँ ...!खोए नग़मे सा अब ढूँढता हूँ तुम्हेंछोड़कर यूँ मुझे गुम हुए तुम कहाँ ...!तुम बिना है अधूरा सा संसार सबख़ाली ख़ाली सा है ज़िन्दगी का मकाँ ...!है तुम्हारे बिना हर तरफ़ तीरगी कैसी दीपावली कैसा रौशन जहाँ ...!सोचता हूँ फ़क़त देखकर ये चमकजल उठे काश फ़ि



गरीब और त्यौहार

गरीबों के लिये टसुए न टपकाइये ,कुछ कर सकते हैं तो करिये ,बेचारगी न फैलाइये . गरीबी पर राजनीति होती रही है और होती रहेगी .गरीबों पर तरस न फैशन बनाइये .साल भर में क्या किया जरा वो गिनाइये .एन त्यौहार पर आत्मग्लानि न पसराइये पर्व



क्या है अस्तित्व मेरा



मगर, फिर भी...

बहुत बोलती थी वो...बोलती भी क्या थीमुट्ठी में सच तौलती थीतसव्वुर में अफसानों पर हकीकत के रंग उडेलती थीअल्हड़ थी वो नामुरादअरमानों से लुकाछिपी खेलती थीछू के मुझको सांसों सेअहसासों के मायने पूछती थीगुम हो कर यूं ही अक्सरअपनी आमद बुलंद करती



शख्सियत पर शख्सियत को , लुटा कर देख ले?

शख्सियत पर शख्सियत को , क्यों न लुटा कर देख ले?फ़िर बने रौनक- ए- ज़िंदगी, तेरे लिए मेरे लिए।सोचता क्या फिर रहा तू ?, व्यर्थ कर यहाँ से वहाँ ।मरना है एक दिन सभी को, और फ़िर जाना कहाँ?कुछ साथ है,-कुछ छूट जाते, डगर पर डगर चलते हुए।पर न कर गुरूर खुद पर, साथ चल और हौसला देते हुए।इंसानियत ही इंसानियत हो, और



कोई मजहब नहीं होता

कवि: शिवदत्त श्रोत्रियतुम्हारे वास्ते मैंने भी बनाया था एक मंदिरजो तुम आती तो कोई गज़ब नहीं होता ||मन्दिर मस्ज़िद गुरद्वारे हर जगह झलकते हैबेचारे आंशुओं का कोई मजहब नहीं होता ||तुम्हारे शहर का मिज़ाज़ कितना अज़ीज़ थाहम दोनों बहकते कुछ अजब नहीं होता ||जिनके ज़िक्र में कभी गुजर जाते थे मौसमउनका चर्चा भी अब ह



अहम् ब्रह्मास्मि...

मेरा ईश्वर, मेरे सामने खड़ा,मेरा ही विराट रूप तो है,मेरी अपनी ही क्षमताओं के,क्षितिज के उस पार खड़ा, खुद मैं ही ‘परमात्मा’ तो हूं,... अहम् ब्रह्मास्मि, इति सत्यम,मैं अपनी ही राह का मंजिल,अपनी संभावनाओं का भक्त,पूर्णता की ईश्वरता का आध्य,मैं ही साधन, मैं ही साध्य,मैं ही पूजा, मैं आराधन,मैं स्वयं अपना



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