ज्ञाानी कौन ??:-- आचार्य अर्जुन तिवारी

19 अक्तूबर 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (427 बार पढ़ा जा चुका है)

ज्ञाानी कौन ??:-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरा धाम पर वैसे तो मनुष्य की कई श्रेणियां हैं परंतु आध्यात्मिक दृष्टि से मनुष्य को दो श्रेणियों में बांटा गया है :- प्रथम भक्त एवं दूसरा ज्ञानी | भक्त एवं ज्ञानी दोनों ही आध्यात्मिक पथ के पथिक हैं परंतु दोनों में भी भेद है | जहाँ भक्त बनना कुछ सरल है वहीं ज्ञानी बनना अत्यंत कठिन | भक्तों के लिए मात्र भगवद्भजन का आश्रय बताया गया है तो ज्ञानियों के लिए अनेक नियम प्रतिपादित किये गये हैं | इन नियमों का पालन करके अनेक महापुरुष ज्ञानी होकरके मानव मात्र के लिए कल्याणकारी सिद्ध हुए हैं | कुरुक्षेत्र के मैदान में मोहित हुए अर्जुन को गीता का ज्ञान देते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ज्ञानी पुरुषों के विषय में बताते हैं कि :- हे अर्जुन ! विनम्रता , दम्भहीनता , अहिंसा , सहिष्णुता , सरलता , प्रामाणिक गुरु के पास जाना , पवित्रता , स्थिरता , आत्मसंयम , इन्द्रियतृप्ति के विषयों का परित्याग , अहंकार का अभाव , जन्म - मृत्यु , वृद्धावस्था तथा रोग के दोषों की अनुभूति , वैराग्य , सन्तान , स्त्री , घर तथा अन्य वस्तुओं की ममता से मुक्ति , अच्छी तथा बुरी घटनाओं के प्रति समभाव , मेरे प्रति निरन्तर अनन्य भक्ति , एकान्त स्थान में रहने की इच्छा , जन समूह से विलगाव , आत्म-साक्षात्कार की महत्ता को स्वीकारना , तथा परम सत्य की दार्शनिक खोज - इन सबका पालन करने वाला ही ज्ञानी कहा जा सकता है और इनके अतिरिक्त जो भी है, वह सब अज्ञान है | जो भी इन नियमों को स्वीकार कर लेता है तो वह ज्ञानी कहलाता है | यहाँ प्रमुख बात यह है कि भक्त तो ज्ञानी बन जाता है परंतु ज्ञानी बनकर भक्त बनना बहुत ही दुष्कर कार्य है |*


*आज के आधुनिक युग में जहाँ विज्ञान नित्य नई सफलता अर्जित कर रहा है वहीं अध्यात्मपथ के पथिकों की संख्या कम होती जा रही है | भक्त एवं ज्ञानी दिखाई तो बहुत पड़ते हैं परंतु अधिकतर सिंह की खाल में सियार ही मिलते है | आज स्वयं को ज्ञानी कहने एवं मानने वालों की एक लम्बी कतार समाज में देखी जा सकती है परंतु यदि भगवान श्रीकृष्ण द्वारा ज्ञानियों के उपरवर्णित लक्षण के विषय में विचार किया जाय तो किसी भी ज्ञानी के भीतर इन बीसों लक्ष्णों में से एक भी नहीं दिखाई पड़ते | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज के समाज में देख रहा हूँ कि थोड़ा बहुत ज्ञानार्जन कर लेने के बाद कुछ लोग स्वयं ही स्वयं को ज्ञानी घोषित करने लगते हैं | ऐसे - ऐसे लोग आज समाज में ज्ञानी बनने का ढोंग कर रहे हैं जिनको अपने कर्तव्यों का भी भान नहीं है , जिन्होंने पुस्तकीय ज्ञान तो प्राप्त कर लिया है परंतु मैं स्वयं क्या हूं ? या मेरे कर्तव्य क्या है ? इसका ज्ञान नहीं प्राप्त कर पाये हैं | अपने माता पिता एवं गुरु की अवहेलना करके नित्य बड़े - बड़े ज्ञानवर्धक उपदेश / संदेश देने वाले ज्ञानियों की आज बाढ़ सी आ गयी है | ज्ञान का अर्थ होता है कि ज्ञानी काम - क्रोध - मोहादिक विकारों से स्वयं को बचाकर रखता है परंतु आज के ज्ञानियों में इन सबमें सबसे प्रबल विकार अहंकार की प्रबलता देखी जा रही है | पुस्तकीय ज्ञान प्राप्त करके ज्ञानी बन जाना तो बहुत सरल है परंतु ज्ञानी के लक्षणों से स्वयं को युक्त करना आज के युग में असंभव ही प्रतीत होता है | आज के ज्ञानियों में बात - बात पर क्रोध , एक दूसरे से ईर्ष्या , दूसरों को यथाशीघ्र पददलित करने की कामना अधिक परिलक्षित होती है , जो कि उचित नहीं कही जा सकती | इस पर विचार अवश्य करना चाहिए कि जो लक्षण गीता में भगवान ने बताये हैं क्या हमने उनको आत्मसात करने का प्रयास किया ? यही नहीं तो ज्ञानी कहलवाने का ढोंग करने से कोई ज्ञानी नहीं हो जायेगा |भगवान के दो पुत्र कहे गये हैं :- १- भक्त , २- ज्ञानी | भक्त तो भगवान को प्राप्त हो जाता है परंतु ज्ञानी अपने ज्ञान के चक्रव्यूह में उलझकर रह जाता है | क्योंकि वह पूर्ण ज्ञानी न तो बन पाता है और न ही बनना ही चाहता है | अल्प ज्ञान आ जाने के बाद वह स्वयं को ज्ञानी समझ लेने का दोषी हो जाता है |*


*ज्ञानी होने का प्रथम गुण है विनम्रता | आज बड़ी मुश्किल से इस गुण का दर्शन ज्ञानियों में हो रहा है | सरलता की कमी एवं अहंकार की प्रबलता ही आज के अधिकतर ज्ञानियों की पहचान बन गयी है |*

अगला लेख: आज के भगवान :--- आचार्य अर्जुन तिवारी



vidya sharma
20 अक्तूबर 2019

बहुत ही ज्ञान परख रचना

आभार शर्मा जी

vidya sharma
20 अक्तूबर 2019

बहुत ही ज्ञान परख रचना

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
25 अक्तूबर 2019
*सनातन धर्म के मानने वाले भारत वंशी सनातन की मान्यताओं एवं परम्पराओं को आदिकाल से मानते चले आये हैं | इन्हीं मान्यताओं एवं परम्पराओं ने सम्पूर्ण विश्व के समक्ष एक उदाहरण प्रस्तुत किया है | सनातन की संस्त परम्पराओं में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वैज्ञानिकता भी ओतप्
25 अक्तूबर 2019
30 अक्तूबर 2019
*मानव जीवन में पवित्रता का बहुत बड़ा महत्त्व है | प्रत्येक मनुष्य स्वयं को स्वच्छ एवं पवित्र रखना चाहता है | नित्य अनेक प्रकार से संसाधनों से स्वयं के शरीर को चमकाने का प्रयास मनुष्य द्वारा किया जाता है | क्या पवित्रता का यही अर्थ हो सकता है ?? हमारे मनीषियों ने बताया है कि प्रत्येक तन के भीतर एक मन
30 अक्तूबर 2019
22 अक्तूबर 2019
*भारत देश में अपने परिवार तथा समाज को संपन्न एवं दीर्घायु की कामना से नारियों ने समय-समय पर कठिन से कठिन व्रत का पालन किया है | वैसे तो वर्ष भर कोई न कोई पर्व एवं त्योहार यहां मनाया जाता रहता है , परंतु कार्तिक मास विशेष रुप से पर्व एवं त्योहारों के लिए माना जाता है | कार्तिक मास में नित्य नए-नए त्य
22 अक्तूबर 2019
01 नवम्बर 2019
*इस संसार में मनुष्य एक चेतन प्राणी है , उसके सारे क्रियाकलाप में चैतन्यता स्पष्ट दिखाई पड़ती है | मनुष्य को चैतन्य रखने में मनुष्य के मन का महत्वपूर्ण स्थान है | मनुष्य का यह मन एक तरफ तो ज्ञान का भंडार है वहीं दूसरी ओर अंधकार का गहरा समुद्र भी कहा जा सकता है | मन के अनेक क्रियाकलापों में सबसे महत्
01 नवम्बर 2019
31 अक्तूबर 2019
*मनुष्य इस धरा धाम पर जन्म लेकर के जीवन भर अनेकों कृत्य करते हुए अपनी जीवन यात्रा पूर्ण करता है | इस जीवन अनेक बार ऐसी स्थितियां प्रकट हो जाती है मनुष्य किसी वस्तु , विषय या किसी व्यक्ति के प्रति इतना आकर्षित लगने लगता है कि उस वस्तु विशेष के लिए कई बार संसार को भी ठुकराने का संकल्प ले लेता है | आखि
31 अक्तूबर 2019
28 अक्तूबर 2019
*मानव जीवन पा करके मनुष्य लंबी आयु जीता है | जीवन को निरोगी एवं दीर्घ जीवी रखने के लिए मनुष्य की मुख्य आवश्यकता है भोजन करना | पौष्टिक भोजन करके मनुष्य एक सुंदर एवं स्वस्थ शरीर प्राप्त करता है | मानव जीवन में भोजन का क्या महत्व है इसको बताने की आवश्यकता नहीं है , नित्य अपने घरों में अनेकों प्रकार
28 अक्तूबर 2019
19 अक्तूबर 2019
*हमारा देश भारत आध्यात्मिक सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक दृष्टि से आदिकाल से ही सर्वश्रेष्ठ रहा है | संपूर्ण विश्व भारत देश से ही ज्ञान - विज्ञान प्राप्त करता रहा है | संपूर्ण विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है जहां समय-समय पर ईश्वरीय शक्तियों ने अवतार धारण किया जिन्हें भगवान की संज्ञा दी गई | भगवान धरा धा
19 अक्तूबर 2019
13 अक्तूबर 2019
*सृष्टि के आदिकाल में परब्रह्म के द्वारा वेदों का प्राकट्य हुआ | वेदों को सुनकर हमारे ऋषियों ने शास्त्रों की रचना की | उन्हीं को आधार मानकर हमारे महापुरुषों के द्वारा अनेकानेक ग्रंथों की रचना की गयी जो कि मानव मात्र के लिए एक मार्गदर्शक की भूमिका में रहे हैं | इन ग्रंथों का मानव जीवन में बहुत ही महत
13 अक्तूबर 2019
24 अक्तूबर 2019
*सनातन धर्म में मानव जीवन को चार भागों में विभक्त करते हुए इन्हें आश्रम कहा गया है | जो क्रमश: ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , सन्यास एवं वानप्रस्थ के नाम से जाना जाता है | जीवन का प्रथम आश्रम ब्रह्मचर्य कहा जाता है | ब्रह्मचर्य एक ऐसा विषय है जिस पर आदिकाल से लेकर आज तक तीखी बहस होती रही है | स्वयं को ब्रह्म
24 अक्तूबर 2019
11 अक्तूबर 2019
*माता - पिता के संयोग से परिवार में जन्म लेने के बाद मनुष्य धीरे धीरे समाज को जानता - पहचानता है क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक जीव है। समाज ही उसका कर्मक्षेत्र है। अतः उसे स्वयं को समाज के लिए उपयोगी बनाना पड़ता है। मनुष्य ईश्वर की भक्ति एवं सेवा बहुत ही तन्मयता से करता है परंतु समाज की ओर बगुत ही कम ध्य
11 अक्तूबर 2019
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x