रोशनी के साथ क्यों धुआँ उठा चिराग से

30 अक्तूबर 2019   |  Shashi Gupta   (447 बार पढ़ा जा चुका है)

रोशनी के साथ क्यों धुआँ उठा चिराग से

हमारी छोटी-छोटी खुशियाँ (भाग -5)

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मैं अपनी भावनाओं से ऊपर उठकर इन दीपकों की तरह अपने दर्द को अपनी खुशी बनाने की कला सीख रहा हूँ। आँसू को मोती समझना यदि आ गया ,तो जीवन की पाठशाला में हो रही इस कठिन परीक्षा में स्वयं को सफल समझूँगा।

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सुबह के साढ़े चार बज रहे थे, जब मैं होटल से बाहर निकला , तो देखा कि बुजुर्ग महिलाएँ टूटे सूप को पीट रही थीं ,कल दीपावली पर लक्ष्मी का आह्वान किया गया और आज दरिद्रता को घर से बाहर निकाला जा रहा था। जिसकी हमें आवश्यकता है ,उसका गुणगान करते हैं और अनुपयोगी वस्तुओं को पुराने सूप के समान दरिद्रता की निशानी बता,फेंक देते हैं , यद्यपि हम दूसरों को यह ज्ञान बांटते नहीं अघाते हैं कि सुख-दुःख सिक्के के दो पहलू हैं।

मैंने यह भी देखा कि घर-आंगन को रोशन करने के लिये जले ये नन्हे मासूम दीपक जल-जल के बुझ चुके हैं। जिन्हें दीपावली की शाम पँक्तियों में सजाकर रख गया था,अगले दिन सुबह उन्हीं हाथों ने उन्हें बेदर्दी से भवन के बाहर फेंक दिया , क्योंकि उनकी उपयोगिता समाप्त हो चुकी थी । अतः उनके प्रति कोई मोह नहीं रहा ।

इस जगत की नश्वरता और निष्ठुरता दोनों का बोध कराते हैं ये सूप और दीपक । वस्तु /व्यक्ति कितना भी उपयोगी और सुंदर हो , आवश्यकता समाप्त होते ही उसकी उपेक्षा होती है ,यही अटल सत्य है। मेरा अनुभव तो कहता है कि प्रेम एवम स्नेह की भी यही परिभाषा है, जो कल अपनों जैसे लग रहे थे, आज उनकी आँखों में घृणा और जुबां पर कड़वी वाणी है, प्रिय मित्र भी शत्रु हो जाते हैं।

इसी कठोर अनुभूति ने कुछ माह पूर्व मेरे विकल हृदय को अब नयी दिशा और उर्जा दी है। इस घटना के पश्चात मैं जीवन के रहस्य को समझ रहा हूँ , इसलिये नियति को धन्यवाद देता हूँ कि उसने इस जग के लौकिक संबंधों के सत्य को मेरे सम्मुख प्रगट किया । अतः मैं अपनी भावनाओं से ऊपर उठकर इन दीपकों की तरह अपने दर्द को अपनी खुशी बनाने की कला सीख रहा हूँ। आँसू को मोती समझना यदि आ गया ,तो जीवन की पाठशाला में हो रही इस कठिन परीक्षा में स्वयं को सफल समझूँगा।

इसी चिंतन में खोया मैं और थोड़ा आगे लालडिग्गी की ओर बढ़ा तो देखा कि कृत्रिम प्रकाश से जगमगा रहे एक भवन के चबूतरे पर एक असहाय अनाथ वृद्ध ठंड से संघर्ष कर रहा था । उसके लिये दीपावली की खुशियों का मायने यह रहा कि कहीं से भिक्षा में बढ़िया भोजन मिल गया था। अतीत में कोई तो उसका अपना था।

यहसब देख मैं अपने संस्मरण, अनुभूतियों और चिन्तन को विस्तार देने में जुटा हूँ । अपनत्व भरी मेरी भावनाओं को कुचलने में वे शुभचिंतक ही अग्रिम पँक्ति में थें, जिन्हें मैंने संवेदनशील समझा। सो, मैं इस दीपक की पीड़ा को समझ सकता हूँ कि बुझने से पहले उसने हमें रोशनी देने के लिये किस तरह से स्वयं को जलाया है। अमावस की स्याह रात को इन्हीं नन्हे दीपों ने स्वयं का बलिदान दे ,हमारे लिये जगमग किया था, बदले में इन्हें क्या मिला ?

हम मनुष्य कितने स्वार्थी हैं , संबंधों का मूल्यांकन तक नहीं कर पाते , फिर दीया बन क्या खाक जलेंगे ?

दीपावली की पूर्व संध्या पर मैं जिस होटल में रहता हूँ उसके समीप ही मुकेरी बाजार में एक अस्सी वर्षीया बुजुर्ग महिला वहाँ की सुरक्षा व्यवस्था देख रही महिला थानाध्यक्ष गीता राय से यह गुहार लगाते दिखी कि उसके पुत्रों ने दो वर्ष पूर्व उसे घर से निकाल दिया है। उसने पास के शिवमंदिर में शरण ले रखी है, दो जून की रोटी के लिये कुछ घरों में झाड़ू-पोंछा करती है,किन्तु सर्दी का मौसम शुरू होने से उसकी बूढ़ी हड्डियों में इस ठंड से लड़ने की क्षमता अब नहीं है।अपने दोनों पुत्रों से उसकी बस इतनी ही मांग थी कि उसे उसके घर में सिर छिपाने के लिये स्थान मिल जाए , परंतु वे नहीं पसीजे।

यह कहते-कहते उस दुखियारी माँ का गला रुँध गया और आँखों से अश्रुधारा बह चली थी।यह कैसी विडंबना है कि जिन पुत्रों को उसने नौ माह अपने गर्भ में पाला, वे उसे ईंट- पत्थर के मकान में भी रहने नहीं दे रहे हैं।

एक वृद्ध माँ को इस स्थिति में हाथ जोड़े देख महिला थानाध्यक्ष ही नहीं वहाँ उपस्थित तमाशबीनों का हृदय भी द्रवित हो उठा। यह तो खाकी वर्दी का प्रभाव था कि वृद्धा के दोनों पुत्र सहम गये और अपनी माँ को घर ले गये। घरवापसी की खुशी में इस बुजुर्ग महिला ने जो आशीर्वाद महिला दरोगा को दिया है , वह निश्चित ही फलीभूत होगा ।

तनिक विचार करें कि यह कैसी मानवता है कि पुत्र अपनी माँ की सेवा करना तो दूर उसे उसके ही घर से बाहर निकाल दे रहे हैं। यह कैसा सभ्य समाज है कि पिछले दो वर्षों से यह बुजुर्ग महिला मंदिर में शरण लिये हुये है और वह न्याय नहीं कर रहा है। ये कैसे संवेदनशील इंसान हैं, जो इस अस्सी वर्षीया वृद्धा से झाड़ू- पोंछा करवा रहे हैं, क्या ससम्मान उसे दो वक्त का भोजन नहीं दे सकता है। हम कब बनेंगे मानव ? कैसा विचित्र संसार है यह,जहाँ हमारी संवेदनाओं और भावनाओं का कोई मोल नहीं है।

इस बयालीस कमरों वाले होटल में कल की रात जब मैं बिलकुल अकेला था। रोशनी के पर्व दीपावली की इस तन्हाई भरी स्याह रात में मुझे स्वयं को ज्ञान एवं वैराग्य के दीप से जगमग करना था , जिसे मैंने अपने गुरुदेव से प्राप्त किया था।

तभी मुझे एक गीत की ये पँक्तियाँ याद हो आई-

ये रोशनी के साथ क्यों

धुआँ उठा चिराग से

ये ख़्वाब देखती हूँ मैं

के जग पड़ी हूँ ख़्वाब से..

इस शाश्वत सत्य से आत्मसाक्षात्कार करता रहा कि रोशनी एवं धुएँ का क्या संबंध है।

मध्यरात्रि तक होटल के इर्द-गिर्द पटाखे बज रहे थे , परंतु पटाखों को हाथ लगाये मुझे साढ़े तीन दशक से ऊपर हो गये हैं। अब सोचता हूँ कि चलो अच्छा ही है , मुझे पटाखा नहीं बनना , जो भभक कर, विस्फोट कर अपना अस्तित्व पल भर में समाप्त कर ले साथ ही वातावरण को प्रदूषित करे । मुझे तो इस मासूम दीपक की तरह टिमटिमाते रहना है ,जो बुझने से पहले घंटों अंधकार से संघर्ष करता है, वह भी औरों के लिये, क्यों कि स्वयं उसके लिये तो नियति ने " अंधकार " तय कर रखा है। अतः मैंने सच्चे हृदय से परमात्मा से सिर्फ एक ही बात कही है-

इक दीप जले मेरे मन में प्रभु

जहाँ तम न हो,कोई ग़म न हो

जग से मेरा कोई अनुबंध न हो

जो बंधन हो , तेरे संग अब हो..

अनुबंध , संबंध और स्नेह आत्मीयता को प्रदर्शित करने वाले ऐसे शब्द न जाने क्यों तक्षक बन सदैव मेरी भावनाओं को डसने के लिये फन उठाये रहते हैं। नियति को मुझसे क्या शिकायत है ? बचपन में इन बुझे दीपकों को मैंने कभी फेंका भी तो न था। मैं इन्हें एकत्रित कर ताख पर रख दिया करता था। महंगे खिलौनों की अपेक्षा दीयों से तराजू बनाने में मुझे कहीं अधिक खुशी मिलती थी । नहीं पता क्यों प्रत्येक सजीव एवं निर्जीव वस्तुओं से मेरी भावनाएँ जुड़ी रहती थीं। मैं किसी को भी खोना नहीं चाहता था । यह भी कैसा मेरा बालहठ था और फिर एक-एक कर मेरे सामने से ही सबकुछ फिसलता गया।

मैं वेदना भरी इस जीवनसफर में कुछ यूँ गुनगुनाते रहा -


बिछड़ गया हर साथी देकर पल दो पल का साथ

किसको फ़ुरसत है जो थामे दीवानों का हाथ

हमने तो जब कलियाँ माँगी काँटों का हार मिला..

दीपावली पर विंध्यवासिनी भैया सस्नेह टिफिन पहुँचा गये। घर का बना मेरे स्वास्थ्य के अनुरूप भोजन था। यह मेरे लिये कम खुशी की बात नहीं कि जिसका उल्लेख मैं नहीं करूँ। मैंने जो कुछ भी भोज्यपदार्थ था , उसको दो भाग में बांट दिया, दोपहर चावल-दाल तो रात रोटी-सब्जी। ऐसे किसी विशेष पर्व पर कालिम्पोंग की तरह टिफिन देख ,उदास होने की जगह अब मैं हर्षित होता हूँ कि घर का भोजन मिला है। क्या हुआ जो मेरे संग भोजन ग्रहण करने वाला कोई अपना नहीं है, लेकिन यह टिफिन ही आज मेरी छोटी- छोटी खुशियों में प्रमुख है।

पटाखों के शोर के मध्यम शांतिचित्त हो मैं इस दीपावली की रात अपनी खुशियों को खोज रहा था, तभी मेरा ध्यान विंध्याचल स्थित वृद्धाश्रम की ओर गया। यहाँ आश्रय पाए वृद्धजनों में से सभी निराश्रित नहीं हैं, अनेक ऐसे भी हैं, जिनका अपना परिवार है, परंतु वे अपनों से उपेक्षित हैं। सोचता रहा कि अपनों ने ही इनका क्यों तिरस्कार किया। क्या मेरी वेदना इनसे अधिक है? इन्हें और मुझे भी अपनी छोटी- छोटी खुशियों को संभालना होगा ।

धनतेरस पर्व पर डैफोडिल स्कूल के बच्चों ने इस वृद्धाश्रम पर आकर इन निराश्रितों को ढेर सारी खुशियाँ दी, इनसे खूब बातें की । उन्होंने अपने नृत्य से इनका मन मोहने का प्रयास किया, यही नहीं अपने हाथों से इन्हें मिठाई , चॉकलेट, फल, चिप्स, बिस्किट और नमकीन के पैकेट भी दिये । इन बच्चों को ऐसा करते देख इन असहाय बुजुर्गों के नेत्रों से जो नीर बहे , उसमें खुशी और ग़म दोनों ही मिश्रित थें। अपनों से मिले दर्द और गैरों से मिले स्नेह को परिभाषित करने के लिये इनके पास शब्द नहीं थें। इन्होंने इन बच्चों को खूब आशीष दिया । अगले दिन अन्य सामाजिक संस्थाओं द्वारा भी इन्हें दीपावली का उपहार दिया गया , जबकि रोशनी और फुलझड़ियाँ लेकर पहुँचे पाल्क नामक संस्था के सदस्यों ने इनकी दिवाली को जगमग करने का प्रयास किया , किन्तु ऐसे जीवन की कल्पना क्या कभी इन्होंने की होगी ? इन्हें अब इसी में अपनी खुशी तलाशनी है।

मुझे भी मेरे कुछ मित्रों और शुभचिंतकों ने सस्नेह दीपावली के उपहार दिये हैं। एक बंजारे , एक यतीम के लिये यह खुशी क्या कम है ?

यद्यपि एक बार पुनः ननिहाल में गुजरे अपने बचपन की मधुर स्मृतियों को टटोलने की तीव्र इच्छा होती रही । बड़ा बाजार स्थित छोटे नाना जी की मिठाई की दुकान गुप्ता ब्रदर्स का सोन पापड़ी ,तिवारी ब्रदर्स का समोसा( सिंघाड़ा) और देशबंधु की मीठी दही संग में मैदे की लूची- चने की दाल की याद आयी । वैसे, काजू बर्फी , मलाई गिलौरी और रस माधुरी ये तीनों ही मेरे सबसे प्रिय मिष्ठान थें।

खैर, माँ गयी, बचपन गया और उनका वह स्नेह भी अतीत की यादें बन दफन हो गया।

मैं यतीम हो गया और ताउम्र अपनी ज़िदंगी से यह सवाल पूछता रह गया -


एक हसरत थी कि आँचल का मुझे प्यार मिले

मैने मंज़िल को तलाशा मुझे बाज़ार मिले

ज़िन्दगी और बता तेरा इरादा क्या है...


सच कहूँ तो मैं ऐसा इंसान बनना चाहता हूँ , जो विचारवान तो हो, परंतु कल्पनाओं में उड़ने वाला नहीं। मेरा चिंतन मेरे भावुक मन को दिशा दे रहा है। मैं अपने इस हृदयरूपी समुद्र के मंथन में लगा हूँ , जिससे हलाहल ( व्याकुलता ) के पश्चात अमृत (आनंद ) की प्राप्ति होती है । इस अंतर्निहित ज्ञान के प्रकाशित होने पर उस शिव का दर्शन सम्भव है ,जो सत्यम -शिवम- सुंदरम है । क्रमशः

- व्याकुल पथिक

( जीवन की पाठशाला )

अगला लेख: इक वो भी दीपावली थी..



आदरणीय , आपकी रचना "जीवन की पाठशाला" के भावों एवं उच्चकोटीय लेखन शैली ने मंत्रमुग्ध कर दिया

Shashi Gupta
30 अक्तूबर 2019

आचार्य जी, आपकी टिप्पणी से मुझे अत्यधिक प्रसन्नता हुई है, आभारी हूँ, प्रणाम।

Shashi Gupta
30 अक्तूबर 2019

आचार्य जी,आपकी टिप्पणी से अत्यधिक प्रसन्नता हुई मुझे, आभार ही, प्रणाम।

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