कार्तिक पूर्णिमा :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

12 नवम्बर 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (479 बार पढ़ा जा चुका है)

कार्तिक पूर्णिमा :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म में समय - समय पर अनेक व्रत / त्यौहार मनाये जाते रहते हैं | यहाँ शायद ही कोई दिन ऐसा हो जिस दिन कोई व्रत या पर्व न मनाया जाता हो | कार्तिक मास तो सबसे दिव्य है | अनेक अलौकिक , पौराणिक एवं लोक मान्यताओं के रूप में अनेक त्योहारों को स्वयं में समेटे हुए कार्तिक मास का आज समापन हो रहा है | जहां एक ओर इन त्योहारों के माध्यम से मनुष्य एक दूसरे के समीप आता है वही दूसरी ओर धर्म की भी स्थापना होती है | आज कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन "कार्तिक पूर्णिमा" का व्रत श्रद्धा एवं विश्वास के साथ मनाया जाता है | हमारे पुराणों में कहा गया है कि वर्ष भर गंगा जी के स्नान का जो फल प्राप्त होता है वही फल कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्नान करने मात्र से मिल जाता है | आज के दिन का इतिहास बहुत ही दिव्य है , कार्तिक पूर्णिमा को "त्रिपुरी अमावस्या" भी कहा जाता है क्योंकि आज के दिन ही भूतभावन भोलेनाथ ने त्रिपुरासुर का वध किया था | उसी प्रसन्नता में देवताओं ने काशी में देव दीपावली मनाई थी | मनुष्यों के द्वारा कार्तिक अमावस्या को दीपावली मनाई जाती है देवताओं के द्वारा ठीक पन्द्रह दिन बाद कार्तिक पूर्णिमा को देव दीपावली मनाई जाती है | इसका एक रहस्य और भी है कि देवोत्थानी एकादशी के दिन जब भगवान श्री हरि निद्रा का त्याग करते हैं तो उसके ठीक तीन दिन बाद देवताओं के द्वारा उनका भव्य पूजन करके असंख्य दीपमालिकाओं के द्वारा आरती उतारी जाती है , इसलिए आज के दिन भगवान शिव एवं भगवान विष्णु का पूजन करके दीपदान करने का बहुत बड़ा महत्व है | आज भी काशी में देव दीपावली गंगा जी के घाट पर बहुत ही भव्य रूप से मनाई जाती है | सनातन धर्म के प्रत्येक त्योहार स्वयं में दिव्य एवं भव्य है इनकी विशेषता यह है कि इन त्यहारों में कोई ना कोई रहस्य अवश्य छुपा होता है आवश्यकता है इन कारणों एवं रहस्यों को जानने की |*


*आज ही सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानकदेव जी री जयन्ती भी पूरे देश में बड़ी धूमधाम से मवायी जाती है | आज मनुष्य ने भले ही बहुत प्रगति कर ली है परंतु आज के वैज्ञानिक युग में भी हमारे पौराणिक व्रत एवं पर्व स्वयं की अलौकिकता एवं दिव्यता बनाए हुए हैं | समय-समय पर सनातन धर्म पर एवं सनातन की मान्यताओं पर अनेको आघात हुए परंतु सनातन सदैव सनातन के संरक्षकों का ऋणी रहेगा जिन्होंने सनातन की मान्यताओं को संरक्षित रखा | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" परमपिता परमात्मा का कोटिश: धन्यवाद ज्ञापित करता हूं जिन्होंने हमें मानव तन तो प्रदान ही किया साथ ही सनातन की दिव्यता भी प्रदान की | आज संसार में अनेकों धर्म / संप्रदाय स्थापित हो चुके हैं परंतु जो रहस्य एवं जीव मात्र के कल्याण की भावना एवं मान्यताएं सनातन धर्म में प्राप्त हो जाती हैं वह अन्यत्र कहीं भी नहीं प्राप्त होती है | कष्ट इस बात का है कि आज कुछ सनातन धर्मी अपनी दिव्यता को भूल कर के दूसरों की ओर देख रहे हैं , उन्हें शायद नही पता है कि सनातन आदिकाल से ही इस धरा धाम पर स्थापित होकर के सर्वश्रेष्ठ रहा है | कोई भी धर्म / संप्रदाय सनातन धर्म की बराबरी कभी नहीं कर सकता क्योंकि सबका मूल सनातन ही है | आज मनुष्य भटक रहा है तो उसका कारण सिर्फ और सिर्फ अज्ञानता ही कहा जा सकता है | हम कितने श्रेष्ठ हैं , हमारी मान्यताएं कितनी दिव्य हैं यह जाने बिना दूसरे धर्म संप्रदाय की ओर देखना या उसमें प्रवेश करने का प्रयास करना महज मूर्खता ही है | यह वैसे ही कहा जाएगा जिस प्रकार किसी मणि का त्याग करके मनुष्य चमकते हुए कांच की ओर आकर्षित हो जाता है | आवश्यकता है कांच और मणि में अंतर समझने की , यदि सनातन मणि है तो अन्य धर्म संप्रदाय को कांच की संज्ञा दी जा सकती है |*


*जब तक मनुष्य स्वयं को नहीं जान पाता तब तक उसे अनेकों आशंकाएं एवं जिज्ञासायें घेरे रहती हैं | उसी प्रकार मनुष्य जब तक सनातन को नहीं जान पाता तब तक वह आशंकाओं एवं जिज्ञासाओं से घिरा हुआ भटका करता है जिस दिन सनातन धर्म के गुणों को मनुष्य समझ जाएगा उसी दिन उसकी तमाम जिज्ञासाओं का अंत हो जाएगा |*

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