‘‘50-50!’’ ‘‘क्या राजनीति में इसका अर्थ अलग होता है’’!

16 नवम्बर 2019   |  राजीव खण्डेलवाल   (406 बार पढ़ा जा चुका है)

‘‘50-50!’’ ‘‘क्या राजनीति में इसका अर्थ अलग होता है’’!

अंततः शिवसेना-भाजपा का वर्ष 1990 से चला आ रहा लगभग 30 वर्ष पुराना गठबंधन टूट गया। तथाकथित 50-50 फॉमूले को आधार बनाकर महाराष्ट्र विधानसभा के परिणाम आने के तुरन्त बाद से ही शिवसेना के प्रवक्ता एवं सांसद संजय राउत लगातार यही कहते रहे है कि मुख्यमंत्री तो शिवसेना का ही बनेगा। 50-50 के सूत्र को स्पष्ट करते हुये संजय राउत ने यह भी स्पष्ट किया कि लोकसभा चुनाव के समय भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के बीच परस्पर यह तय हुआ था कि, आगामी विधानसभा चुनाव में 50-50 की बराबरी की हिस्सेदारी होगी तथा सत्ता की भागीदारी भी 50-50 प्रतिशत की होगी। पिछले 20 दिनों से शिवसेना इस फॉमूले पर अडि़ग है, जिसको भाजपा द्वारा न मानने के कारण ही, शायद देश का सबसे पुराना लम्बे समय तक चलने वाला गठबंधन टूट गया।

यद्यपि अमित शाह का 50-50 के फॉमूले के विषय में कोई बयान नहीं आया और न ही किसी प्रकार का खंडन! लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने अमित शाह के हवाले से अवश्य यह कहा कि इस संबंध में उनकी अमित शाह से बात हुई है, और उन्होंने ऐसे किसी भी समझौते से स्पष्ट इंकार किया है। तथापि अमित शाह ने यह कहा कि शिवसेना की तरफ से ऐसा प्रस्ताव जरूर आया था। आज 20 दिन बाद अमित शाह का उक्त समझौते से इंकार करते हुये बयान अवश्य आया है। इतने दिनों बाद बयान आने पर प्रश्न लगाना तो लाजमी ही है। इसके विपरीत उद्धव ठाकरे ने बार-बार यह स्पष्ट किया कि इस पर सहमति बनी थी। परन्तु भाजपा उन्हें झूठा ठहराने पर तुली हुई है। यदि शिवसेना के प्रवक्ता संजय राऊत का यह कथन सही मान भी लिया जाय कि लोकसभा चुनाव के दौरान 50-50 के सूत्र पर दोनो पार्टी के बीच सहमति बनी थी, तो फिर शिवसेना को अपनी बात को सही सिद्ध करने के लिए निम्न बातों का जवाब देना आवश्यक होगा।

1. यदि 50-50 की समस्त बातों में साझेदारी तय हुई थी, तो फिर शिवसेना विधानसभा चुनाव में 50 प्रतिशत से कम सीटों पर चुनाव लड़ने के लिये कैसे सहमत हो गई? सीटों के बटवारे के समय ही इस आधार पर विरोध क्यों नहीं किया। उसी समय इस मुद्दे पर गठबंधन को तिलाजंली क्यों नहीं दे दी? क्योंकि 50-50 वाला फॉमूला तो विधानसभा चुनाव के पहले ही लोकसभा चुनाव के समय बन गया था, जैसा शिवसेना स्वयं दावा कर रही है। 2. यदि इस 50-50 के सूत्र में मुख्यमंत्री का पद भी शामिल है, अर्थात ‘‘ढ़ाई-ढ़ाई साल का मुख्यमंत्री’’ तो फिर पहले ही शिवसेना को मुख्यमंत्री पद क्यों मिलना चाहिए, बाद के ढ़ाई वर्ष में क्यों नहीं? जबकि भाजपा से शिवसेना की सीटे लगभग आधी (105-56) है।

3. क्या यह तय हुआ था कि 50-50 सूत्र के तहत शिवसेना को पहले मुख्यमंत्री का पद मिलेगा। यद्यपि ऐसा कोई दावा शिवसेना ने नहीं किया है, वह सिर्फ यह कह रही है कि मुख्यमंत्री तो शिवसेना का ही बनेगा। अतः बेहतर यह होता कि प्रथम ढ़ाई वर्ष वह भाजपा को मुख्यमंत्री पद व ढ़ाई वर्ष बाद उक्त फॉमूले के आधार पर मुख्यमंत्री पद पर दावा करती और नहीं मानने पर तब गठबंधन तोड़ती?

4. क्या 50-50 का फॉमूला विधानसभा विधानसभा अध्यक्ष पद पर भी लागू होगा। अर्थात ढ़ाई-ढ़ाई साल के लिए विधानसभा अध्यक्ष पर का भी बटवारा होगा, इस बाबत शिवसेना ने कुछ नहीं कहां। क्योंकि आपने सभ्यता सत्ता की आधे-आधे की भागीदारी की बात की है व समान रूप से बाटने की बात रही है।

5. क्या कम सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद मं़त्रिमंडल में भागादारी भी 50-50 फॉमूले कांे तहत ही होगी, यह भी स्पष्ट नहीं है।

6. क्या चुनाव परिणाम मेें बराबरी की जीत अथवा स्ट्राईकिंग रेट न आ पाने के बावजूद भी मंत्रिमंडल में 50-50 की ही भागाीदारी होगी?

7. क्या मंत्रियों के विभागों के बटवारे के संबंध में भी 50-50 का फॉमूला लागू होगा।

8. क्या ‘‘मलाईदार’’ विभाग को चिन्हित करके उनका बंटवारा भी उक्त फॉमूले के तहत होगा?

9. जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चुनाव के दौरान मंच पर भाषण देते हुये यह कहा था कि ‘‘केन्द्र में नरेन्द्र व महाराष्ट्र में देवेन्द्र’’। जब शिवसेना ने उक्त कथन पर आपत्ति क्यों नहीं की? नरेन्द्र मोदी ने अपने उक्त उद्बोदन में अपना आश्रय स्पष्ट कर दिया था।

मतलब साफ है!, सत्ता की भागीदारी के प्रत्येक अवसर पर पूर्ण रूप से पूर्ण शुद्धता के साथ 50-50 का फामूला लागू होगा, प्रश्न यह है? मतलब स्पष्ट है, शिवसेना के पास इन बातों का जवाब नहीं है। अतः शिवसेना का इस गठबंधन को तोड़ना बेमानी ही कहलायेगा, माना जायेगा।

वैसे तो राजनीति में ‘‘वायदा’’ नहीं वायदा खिलाफी ही अधिकतम होती है। वायदा करने के बावजूद सिंद्धान्त को एकतरफ रखकर व्यवहारिक राजनीति के चलते फायदे-लाभ की दृष्टि से ‘‘हैसियत’’ व शक्ति को देखकर ही वायदा निभाने के धर्म को पूरा किया जाता है। इस दृष्टिकोण से शिवसेना को चुनाव परिणाम को देखते हुयेे हैसियत का आकलन स्वयं कर लेना ज्यादा बेहतर होगा।

वैसे जहाँ तक भाजपा द्वारा वायदा खिलाफी का प्रश्न है, यह न तो कोई पहली बार हुआ है और न ही आखरी बार है। यहाँ भाजपा द्वारा मेरे साथ की गई वादा खिलाफी का उल्लेख करना सामयिक हो गया है। स्व. विजय कुमार खंडेलवाल सांसद के निधन से उत्पन्न हुये उपचुनाव में मुझे तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सहित प्रदेश के पूरे नेतृत्व ने एकमत से इस वायदे के साथ सहयोग मांगा कि आगामी विधानसभा चुनाव में आपको बैतूल विधानसभा से टिकिट दी जावेगी। लेकिन सिर्फ यही वादा खिलाफी नहीं हुई, बल्कि टिकिट न दिये जाने पर अपनी मजबूरी बताते हुये प्रादेशिक नेतृत्व ने (शिवराज सिंह सहित) निगम अध्यक्ष बनाने का पुनः आश्वासन दिया व भरोसा दिलाया। लेकिन पुनः वादा खिलाफी हुई। इससे स्पष्ट है, आज की राजनीति में नैतिकता का कोई स्तर न रह जाने के कारण वायदे का कोई महत्व नहीं रह गया है। इसलिये वायदे तो अंसख्य होते है, लेकिन परिपालन मात्र उंगलीयों पर गिनने लायक ही होते हैं।

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