मनुष्यता से पशुता की ओर :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

11 दिसम्बर 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (434 बार पढ़ा जा चुका है)

मनुष्यता से पशुता की ओर :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*आदिकाल में परमपिता परमात्मा ने इस धरती पर जीवन की सृष्टि करते हुए अनेकों प्राणियों का सृजन किया | पशु पक्षी जिन्हें हम जानवर कहते हैं इनके साथ ही मनुष्य का भी निर्माण हुआ | मनुष्य ने अपने बुद्धि कौशल से निरंतर विकास किया और समाज में स्थापित हुआ | यदि वैज्ञानिक तथ्यों को माना जाय तो मनुष्य भी पहले पशु की ही भाँति जीवन यापन करता था परंतु धीरे-धीरे मनुष्य ने विकास करना प्रारंभ किया , अग्नि की खोज की , समूह में रहना प्रारंभ किया और परिवार बनाते हुए विकास के क्रम में एक सुंदर समाज का निर्माण किया और स्वयं को पशुता की श्रेणी से अलग कर लिया | जहां एक ओर पशु मात्र भोजन एवं प्रजनन के लिए जाने जाते हैं वही मनुष्य ने समाज के हित के लिए अनेकों कार्य किये | मानव समाज में मनुष्य के लिए हिंसक पशुओं से सदैव खतरा माना गया है और उनसे बचने के लिए अनेक उपाय मनुष्यों ने किए | मनुष्य का कर्तव्य समाज एवं परिवार के लिए तो था ही साथ ही स्वयं के कल्याण के लिए आध्यात्मिकता की शरण भी मनुष्य ने पकड़ी और ऐसा करके मनुष्य दिव्यता को प्राप्त होता गया | पूर्वकाल में अपने इन्हीं क्रियाकलापों से मनुष्य ने पशुओं के ऊपर अधिकार तो किया साथ ही उनके खतरे से बचने के लिए अनेकों संसाधन भी बनाए परंतु धीरे-धीरे मनुष्यों की महत्वाकांक्षा इतनी बढ़ गई कि उन्होंने पशुता को स्वयं में समावेशित करना प्रारंभ कर दिया | जिस पशुता को त्याग करके मनुष्य ने अपने आचार - विचार एवं व्यवहार से समाज में स्वयं को स्थापित किया था धीरे-धीरे वही पशुता मनुष्य के हृदय में पुनः स्थापित होने लगी और आज यदि देखा जाए तो मनुष्य पशु से भी बदतर जीवन जीने के लिए तत्पर दिखाई पड़ता है | मनुष्यता के मूल मानव धर्म का त्याग करके मनुष्य पशुओं की श्रेणी में आने लगा | जहां यह मान्यता है कि पशु किसी दूसरे का ध्यान ना दे करके स्वयं के जीवन यापन में व्यस्त रहते हैं वही क्रियाकलाप आज अधिकतर मनुष्य भी करने लगे हैं | यह देखकर यह विचार करने पर विवश हो जाना पड़ता है कि हमारे पूर्वजों ने पशु से मनुष्य बनने के लिए जो अथक परिश्रम किया था उस परिश्रम को आज के मनुष्यों ने व्यर्थ करते हुए पुन: उसी पशुता की ओर कदम बढ़ा दिए हैं |*


*आज चारों पशुता का ही तांडव दिखाई पड़ रहा है | पशु को मनुष्यों के लिए हिंसक माना जाता रहा है परंतु आज किसी भी पशु की अपेक्षा मनुष्य सबसे ज्यादा हिंसक दिखाई पड़ रहा है | लोग अपने घरों में दरवाजे लगाते हैं , संदूको में ताले लगाते हैं , विचार कीजिए क्या वह ताला कोई पशु तोड़ सकता है ? जी नहीं ! मनुष्य ने सुरक्षा बढ़ाई तो मनुष्यों के लिए ही क्योंकि एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के लिए जितना घातक हो रहा है उतना पशु कभी भी नहीं हुआ | आज समाज में जिधर देखो उधर ही मनुष्य के द्वारा पशुता का व्यवहार करते हुए तांडव किया जा रहा है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" विचार करता हूं की आदिमानव जिसे हमारे वैज्ञानिक पशु श्रेणी का मानते हैं उस श्रेणी को छोड़ करके मनुष्य बनने वाला मनुष्य आज पुन: अपनी उसी पशुता की ओर बढ़ चुका है | जिस प्रकार पशु को लोक लज्जा नहीं होती है और वह कहीं भी खड़ा होकर के अपने सहचर के साथ संभोग की क्रिया करने लगता है आज उसी प्रकार मनुष्य भी लोकलज्जा का त्याग कर चुका है , जिसका परिणाम आज बलात्कार एवं व्यभिचार के रूप में सबके समक्ष उपस्थित है | कहने का तात्पर्य है कि पशु से मनुष्य बने मनुष्य ने पुनः पशुता को स्वयं में धारण कर लिया | आज मनुष्य एवं पशु में कोई विशेष अंतर नहीं दिखाई पड़ता | जिस प्रकार पशु में परिवार की भावना नहीं होती है उसी प्रकार आज के मनुष्यों ने भी अपने पूर्वजों का त्याग करके एकल परिवारों का गठन प्रारंभ कर दिया एवं आज समस्त विश्व में मानव प्रजाति के लिए सबसे बड़ा खतरा मनुष्य ही दिखाई पड़ता है | विचार कीजिए हम कहां थे और कहां आ गए | मनुष्य को मनुष्यता की ओर लौटना पड़ेगा और इसके लिए आवश्यक है कि जिन संस्कारों का त्याग हमने कर दिया है उन संस्कारों को पुनः जीवन में धारण किया जाय अन्यथा मनुष्य से पूर्ण पशु बनने में अब बहुत ज्यादा समय नहीं लगेगा |*


*धरती का सर्वश्रेष्ठ प्राणी मनुष्य आज यदि पशुता को प्राप्त हो रहा है तो उसका कारण सिर्फ संस्कारों की कमी है , इन संस्कारों को पुनः स्थापित करके ही मनुष्य मनुष्य बना रह सकता है |*

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