*खुद्दारी*

04 मार्च 2020   |  Ramakant Mishra   (314 बार पढ़ा जा चुका है)


*खुद्दारी*

प्रिय स्नेही मित्रों जय श्रीकृष्णा

*खुद्दारी*

मैं पढते समय सोचा करता था कि वकालत पढकर न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बनूँगा और निरीह व असहाय एवं लाचार लोगों की मदद करूँगा। बी ए करते समय सोचा कि यल यल बी कर ही लूँ, हमे एक रोजी रोटी के लिए पेशा मिल जाएगा और ननिहाल वाले मेरा उपनाम वकील रख दिए थे, मेरा नाम भी सार्थक हो जाएगा।

लेकिन जब मै बी ए की अन्तिम वर्ष की परीक्षा दे रहा था तब तक मैं कुछ फिल्में देखा, तथा यथार्थ जीवन में लोगों द्वारा जानकारी मिली कि वकालत के पेशे में मुकदमा जीतने के लिए बहुत ही झूठ बोलना पडता है।

(*सामूहिक उत्कर्ष के लिए सामूहिक साधना* और श्री भुवन भाष्कर* लेख अवश्य पढेंं। तथा टिप्पणी बाक्स में अपनी राय से अवगत अवश्य कराएं।)

फिल्मों में देखा कि एक वकील पैसे के लिए एक अत्याचारी, भ्रष्टाचारी, अनैतिक ,चोर डाकू व बलात्कारी का मुकदमा लडकर बचा लेता है। जबकि पीडित व्यक्ति न्याय के लिए दर दर भटकता हुआ ठोकरे खाता फिरता है।

इस तरह से मेरे दिमाग मेंं वकीलो की एक नकारात्मक छवि बैठ गयी थी। फलस्वरूप मेरी खुद्दारी आडे आ गयी और हमें यल यल बी करने की सोच से विमुख कर दी।

क्योंकि मैं बचपन से ही धार्मिक, आध्यात्मिक, नैतिकतावादी, सामाजिक व मानवतावादी विचारधारा का पोषक रहा हूँ।

*इसलिए *खुद्दारी* आडे आनी ही थी।*

(लेख पढकर अपनी राय अवश्य दें।)
पं0 रमाकान्त मिश्र
कोइरीपुर सुलतानपुर
9450213496

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