हसन मियाँ कुछ कीजिये

05 अप्रैल 2020   |  सुमन पांडेय   (330 बार पढ़ा जा चुका है)

रामनाथ जी और हसन मियाँ , सदियों से साथ रह रहे हैं. एक ही धरती और एक ही देश में, बस चेहरा और जगह बदल जाया करती है. लेकिन किसी घटना को ले के दोनों के रवैये में बड़ा ही अंतर है.

जैसे अब हाल ही की घटना ले लीजिये, जब तबलिगी जमात ने गैर ज़िम्मेदाराना हरक़त की और देश में कोरोना संक्रमण बढ़ने का खतरा बढ़ गया, तो रामनाथ जी पूरी ज़िम्मेदारी से खड़े हुए और न सिर्फ इस गैर ज़िम्मेदारी की निंदा की, बल्कि हसन मियाँ के साथ भी ये कहते हुए खड़े हुए की एक घटना से पूरे धर्म या सम्प्रदाय को जोड़ा जाना गलत है. क्यूंकि हसन जैसे अच्छे लोग भी इस समाज में रहते हैं, हमे जाने अनजाने इस तरह उनका अपमान करना शोभा नहीं देता. रामनाथ जी आपको साधुवाद आपके भाईचारे की भावना के लिए.

और ये पहली बार नहीं है, रामनाथ जी हर पत्थरबाजी या मजहबी कट्टरपंथी घटना के बाद, सामने आकर हसन मियाँ और उनके जैसे अच्छे लोगो के समाज में होने की याद दिलाते हैं और इस वक़्त हसन मियाँ भी 'शुक्रिया दोस्त , आप जैसे लोगों की वजह से ही हिंदुस्तान में भाईचारा क़ायम है' कहना नहीं भूलते.

लेकिन हसन मियाँ तबलिगी ज़मात , पत्थरबाजों और मजहबी कट्टरपंथियों की निंदा नहीं करते और न ही हसन मियाँ कभी, इस या इसके जैसी अनेक घटनाओ को गलत कहते हैं. उन्हें दिनरात कोरोना मरीजों की तीमारदारी में लगे डॉक्टर, नर्सो, पुलिस पर तबलिगी जमात का थूकना या भद्दी टिप्पड़ी करना गलत नहीं लगता और शायद न ही दीखता है. लेकिन उन्हें किसी डॉक्टर या पुलिस की, किसी मजहबी के साथ की गयी लापरवाही दिख जाती है और उसे सोशल मीडिया माध्यम से दिन रात शेयर करते हैं.

लेकिन यही हसन मियाँ किसी महमूद की मॉब लिंचिग (जो की ग़लत है) के वक़्त, महमूद के साथ तो खड़े होते हैं, लेकिन जब उंगली रामनाथ के धर्म पर उठने लग जाती है तो , रामनाथ के साथ खड़े होना भूल जाते हैं. उन्हें शायद ये लगता है की, धार्मिक कट्टरपंथियों की सज़ा पूरे धर्म क लोगो को देना ज़ायज है. कभी भी सामने आ के ये नहीं कहते की, इसी धर्म में रामनाथ जी जैसे अच्छे लोग भी हैं और हमे धार्मिक सहिष्णुता बना के रखना चाहिए. हसन मिया ये याद नहीं रख पाते की देश जितना रामनाथ जी का है, उतना ही उनका भी है. इसकी अंतर्राष्ट्रीय छवि और धर्मनिरपेक्षता बनाये रखने की, जितनी ज़िम्मेदारी रामनाथ जी की है उतनी ही हसन मियाँ की भी है.

हसन मियाँ, रामनाथ जी को दुःख तब होता है, जब आपको पत्थरबाजी करने वाले और देश की सम्पति को नुक्सान पहुंचाने वाले मजहबी लोग या तो भटके हुए नौजवान लगते हैं, या आप खामोश रह जाते हैं. रामनाथ जी को टीस ये भी होती है कि लापरवाह डॉक्टर और पुलिस को पानी पी पीकर कोसने वाले हसन जी ग़ैर ज़िम्मेदार तबलिगी ज़मात के लिए कुछ क्यों नहीं कहते . इन सारी घटनाओं पे आपके रवैये से रामनाथ जी को दर्द ये होता है कि, कुछ भी हो जाए, आपके लिए मजहबी भाईचारा सही और ग़लत से ऊपर है.

तो हसन मियाँ एक सवाल, क्या धर्म और मजहब के बीच सामंजस्य और एकता बनाये रखने की 70-80% ज़िम्मेदारी रामनाथ जी की ही है क्या?

रामनाथ जी को आपसे होली , दिवाली की बधाई नहीं चाहिए, उनकी चाहत तो बस इतनी है की जब हसन मियां को मजहबी ग़लत और सच्चे रामनाथ जी में से एक के साथ खड़े होना हो, तो आप उनके साथ कंधे से कन्धा मिलाकर ग़लत के खिलाफ खड़े हों. देखिएगा जिस दिन ऐसा हो गया धार्मिक और मज़हबी कट्टरपंथी दोनों समाप्त हो जायेंगे. हसन मियाँ करेंगे न आप, भाईचारा कायम रामनाथ जी के साथ मिलकर, खड़े होंगे न आप सच्चे रामनाथ जी के साथ, कहेंगे न आप मजहबी गलतियों को ग़लत ?

मेरा आपसे निवेदन है कि मजहबी भाईचारे का पर्दा हटाकर, सही को सही और ग़लत को ग़लत कहिये, इससे पहले कि रामनाथ जी देशगत भाईचारे को एक तरफ़ा ज़िंदा रखते रखते थक जाएं.


नोट: रामनाथ हिन्दू रीति रीवाजो में पले बढे हैं और हसन मियाँ मुस्लिम रीति रीवाजो में, पर हैँ दोनों हिंदुस्तानी.

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