कोरोना के दौर मे भी सहयोग न करने वाले लोग

18 अप्रैल 2020   |  अली   (306 बार पढ़ा जा चुका है)

कोरोना संक्रमण के फैलने के खतरों के इस भयावह दौर मे भी......

गुड़गांव के एक "मुस्लिम" गार्ड पर निज़ामुद्दीन मरकज़ मे जाने की बात छुपाने और एक ही परिवार के तीन सदस्यों को कोरोना संक्रमित करने का आरोप लगा...बात फैला दी गयी......बाद मे पता चला न वह गार्ड कभी मरकज़ गया और न उसे कभी कोरोना संक्रमण हुआ......


झूठेे बर्तन चाटने (एक समूह की परम्परा), फलों पर थूक लगाने (एक मानसिक रोगी द्वारा), पुलिस पर थूकने की ऐसी वीडियोज़ को व्यापक स्तर पर फैलाया गया जिनका कोरोना संक्रमण के दौर से कोई लेना-देना ही नही। कई मस्जिदों मे तबलीग़ी जमात के लोगों के लॉकडाउन की वजह से फँस जाने को "छुप जाना" बताया गया जिससे मामला शायद एक समुदाय द्वारा साज़िश का दिखाई दे। भारत मे काफ़ी लोग लापरवाह हैं, लेकिन एक समुदाय के लोगों की लापरवाही को कुछ लोगों द्वारा साज़िश का रंग देने की पूरी कोशिश की गयी। सरकारों की नाकामी की वजह से मुम्बई मे कुछ दिन पहले इकट्ठी हुई मज़दूरों की भीड़ को भी मस्जिद से जोड़ कर झूठी कड़ियां मिलाने की कोशिशें की गयीं।


एक ऐसे देश मे जहाँ अधिकतर लोग आरोपी व दोषी, आरोपी व उसका संगठन, संगठन व एक समुदाय आदि मे फर्क करने की ज़हमत तक न गवारा करते हों और सबको एक डण्डे से हाँक देते हों, वहाँ ये कहानियाँ बार बार मीडिया द्वार चलाये जाने का क्या मक़सद हो सकता है? कुछ अति उत्साहित मीडिया ने तब्लीग़ी जमात के आंकड़ों को भी बढ़ा दिया (बाद मे माफी माँग ली)...हालत ये हुई है कि कई जगह ऐसी झूठी कहानियों का पुलिस को खण्डन करना पड़ा और कई राज्य सरकारों ने तब्लीग़ी जमात के नाम से अलग केसों की गिनती को दिखाना बंद कर दिया।


डाक्टरों और पुलिस के साथ दुर्व्यवहार या उनके साथ मार-पीट पहली बार नहीं हो रहे हैं...कोरोना के दौर मे भी पुलिस के हाथ कटने से लेकर हाथ टूटने जैसी दुखद घटनायें इंदौर, मुज़फ़्फ़रनगर, पीलीभीत, पंजाब, बिहार, वाराणसी, मुरादाबाद आदि अनेकों जगहों पर हो चुकी हैं। डाक्टरों पर हमले की दुखद घटनायें भी इंदौर, मुरादाबाद के साथ साथ बिहार मे कई जगह हो चुकी हैं। आवश्यकता अपराधियों को सज़ा देने के साथ साथ इन घटनाओं के कारणों को जानने की है जिससे ऐसा आगे न हो। लेकिन यहां भी केवल एक समुदाय के विरुद्ध नेरेटिव ज़ोर पकड़ता दीख रहा है। आपराधिक कार्यों को साम्प्रदायिक रंग देने की पूरी कोशिश जारी है। यह हो सकता है कि किसी एक समुदाय के लोगों का अशिक्षा, जागरूकता की कमी या अन्य कारणों से अपराधों मे अनुपात तुलनात्मक रूप से अधिक हो...लेकिन वहां सीधे सीधे मुस्लिम या मोमिन मतलब पूरे समुदाय के नाम जैसे शब्दों का प्रयोग क्या बताता है? अपराधी अपराधी है और वह सज़ा का हक़दार है। किसी अपराध के लिये अपराधी के अलावा किसी और को अपराध बोध से ग्रस्त करने की कोशिश करना एक बहुत संकीर्ण सोच का परिणाम है।


इसके नतीजे मे साम्प्रदायिक आधार पर विभाजन (पिटाई तथा आर्थिक व सामाजिक बहिष्कार) की ख़बरें आने लगी हैं....इसका ज़िम्मेदार कौन है? जहां तक अपराधियों की बात है, उन को क़ानून देखेगा। इन हालात का फ़ायदा उठाते हुए असामाजिक तत्वों द्वारा मुस्लिमों मे डर और सरकारों के साथ पूरा सहयोग न करने व हिंदुओं मे मुस्लिमों का सम्पूर्ण बाइकाट करने जैसी अफ़वाहें सोशल मीडिया से जुड़े शायद हर व्यक्ति तक पहुंच चुकी होगीं.....इस के पीछे कौन हो सकता है?


किसी देश की अर्थव्यवस्था उसकी मुख्य ताक़त होती है। कोरोनावायरस की आफ़त से पहले ही भारतीय अर्थव्यवस्था कमज़ोर हालत मे पहुँच चुकी थी, कोरोना और लॉक डाउन के बाद उसकी बर्बादी के संकेत साफ़ दीख रहे हैं....लापरवाही करने वाले, सरकार से सहयोग न करने वाले या मेडिकल व पुलिस टीम्स पर हमले करने वालों का अपराध तो अपनी जगह हैं, जिन्हें शुद्ध आपराधिक दृष्टि से देखा जाना चाहिये, अगर भारत का सामाजिक ताना-बाना बिगड़ता है तो यह अर्थव्यवस्था की बर्बादी को सुनिश्चित कर देगा... जो किसी के लिये भी ठीक नहीं होगा। विश्वगुरू की बात तो सदियों के लिये भूल जाइये, हो सकता है इंग्लिश पर कमांड और अच्छी करनी पड़ जाये या शायद चायनीज़ और अरबी सीखने की नौबत आ जाये (समझदार को इशारा काफ़ी है)...इसलिये इस सामाजिक ताने बाने को टूटने से बचाइये, आज भी इन घटनाओं को छोड़ दिया जाये (ये क़ानून का मसला है) तो ज़मीनी स्तर पर फ़िज़ा अभी भी इतनी ज़हरीली नहीं हुई। । मज़बूत सामाजिक ताना-बाना हमारी असल ताक़त है...कहीं इसके कमज़ोर करने के पीछे तो कोई साज़िश नहीं..ग़ौर करने वाली बात यह है। इतना तो हर आदमी कर सकता है कि वह हर सूचना (ख़बर/वीडियो/ऑडियो) को बिना कन्फर्म किये आगे न बढ़ाये...अपने तक रोक ले यानि ....Break the Chain!

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