देवी का आभास

19 मई 2020   |  शिल्पा रोंघे   (439 बार पढ़ा जा चुका है)

देवी का आभास

35 साल की वो औरत माथे पर बड़ा सा तिलक, आंखों में गहरा काजल लगाकर अपने लंबे केश लहराने लगी।

हां मुझे महसूस हो रही है, हां मेरे शरीर में उसका प्रवेश हो चुका है....हां उसकी उपस्थिती मुझे महसूस हो रही है...जय मां...जय मां... मनोरमा ऐसा कहने लगी।

अपने मिट्टी से बने कमरें में लकड़ी के पटिए पर उसने कुछ देवी के चित्र लगा रखे थे। धूप, कपूर और अगरबत्ती की सुंगध से सारा वातावरण महकने लगा।

गेंदे और सफेद पुष्पों को अर्पित करने के बाद वो बोली बोल बच्चा क्या जानना चाहता है तू ?”

15 साल का दुबला पतला मरियल सा लड़का बोला हमेशा बीमार रहता हूं, दवा भी ठीक से नहीं लगती है सिर दर्द से परेशान रहता हूं

आंखे बंद करके मनोरमा ने जवाब दिया आज से ठीक 4 महीने बाद जैसे बाढ़ के पानी का स्तर धीरे धीरे उतरता है वैसे ही ये भी मंद गति से ही जाएगा

धन्यवाद देवी मां कहते हुए 300 रुपए और एक मिठाई का डिब्बावो लड़का उसके हाथों में देकर चलता बना।

फिर वहां 60 साल की बूढ़ी औरत आई बोली प्रणाम माता रानी मेरी बहू और मेरा हमेशा झगड़ा होता रहता है, कहती है अलग रहूंगी पति को लेकर, मान ही नहीं रही है, क्या करुं

फिर आंखे बंद करके मनोरमा बोली किसी ने जादू टोना कर दिया है तेरे घर पर इसलिए दशा बिगड़ गई है

जा ये नारियल अपने देवघर में रख आ सब ठीक हो जाएगा और जुबां पर काबू रखा कर, 10 दिन मौन व्रत रख

जानकी भी अपने बेटे को लेकर वहां पहुंच गई जो शहर से बीई करके लौटा था

बोली बहुत मेहनत करता है कहीं नौकरी नहीं लग रही

ये ले लाल धागा इसकी कलाई पर बांध दे दो महीने के अंदर काम हो जाएगा

जानकी ने अपनी बटुए 500 रुपए निकल कर उसके हाथ में रख दिए।

मनोरमा की 16 साल की उम्र में शादी हो गई थी बस आठवी तक ही पढ़ पाई, पति खेती किसानी करता लेकिन थोड़ी सी जमीन में भरण पोषण ना होता था, इसी बीच उसके दो लड़के और एक लड़की हो गई।

कोई मिडिल तो कोई हाईस्कूल में पढ़ रहा था। अचानक लंबी बीमारी के बाद उसके पति की मौत हो गई इलाज में जो थोड़ी बहुत जमीन थी भी बिक गई, रिश्तेदारों भी कहां तक साथ देते बच्चों की पढ़ाई तो क्या रोजी रोटी के तक लाले पड़ने लगे।

थक हार की मनोरमा ने खूब आराधना शुरु कर दी की, कुछ तो कृपा हो ईश्वर की। समस्याएं तो दूर नहीं हुई उसे आभास होने लगा की देवी उसके शरीर में आती है तो फिर क्या था बात सारे गांव में फ़ैल गई और लोग उसके पास अपनी समस्याएं लेकर आने लगे ज्यादातर लोग की मनोकामना पूरी भी होने लगी थी जिसकी वजह से लोगों का विश्वास उस पर बढ़ने लगा।

दरअसल जो लोग उसके पास आते उनमें इच्छाशक्ति का आभाव था और वो उसकी बातों पर अंधा विश्वास करने लगे थे जिनसे सिर्फ उनका खोया हुआ आत्मविश्वास लौट आता था।

मुश्किल हालतों से जूझ रही मनोरमा खुद भी ये समझ पाने में असमर्थ थी कि ये सिर्फ उसके मन का वहम है कि उसके शरीर में देवी आती है, असर तो सिर्फ लोगों पर उसकी दी गई सहानुभूति का हो रहा था जो अक्सर थके- हारे लोगों को इस दुनिया में नहीं मिल पाती है।

शिल्पा रोंघे


© सर्वाधिकार सुरक्षित, कहानी के सभी पात्र काल्पनिक है जिसका जीवित या मृत व्यक्ति

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