माँ का रुदन

13 अगस्त 2020   |  Shashi Gupta   (426 बार पढ़ा जा चुका है)

 माँ का रुदन


माँ का रुदन

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अरे ! ये कैसा रुदन है..? स्वतंत्रता दिवस पर्व पर उल्लासपूर्ण वातावरण में देशभक्ति के गीत गुनगुनाते हुये चिरौरीलाल शहीद उद्यान से निकला ही था कि किसी स्त्री के सिसकने की आवाज़ से उसके कदम ठिठक गये थे। ऐसे खुशनुमा माहौल में रुदन का स्वर सुन चकित हो वह इधर-उधर देखने लगा था। उसने अपने कान उस ओर कर यह सुनने का प्रयत्न किया कि मन को विकल करने वाली यह आवाज़ किसकी है। और फिर जब पीछे पलट कर देखा तो स्तब्ध रह गया था चिरौरी । क्योंकि इसी उद्यान में अमर शहीदों की आदमकद प्रतिमाओं के समक्ष एक स्त्री बैठी हुई थी, जो कभी देश की स्वतंत्रता के लिए सर्वोच्च बलिदान करने वाले भारत माता के इन वीर सपूतों के मुखमंडल को अपना सिर उठाकर गर्व से निहारती, तो कभी आँखें नीचे कर विलाप करती दिखी । उसकी वाणी में अथाह वेदना थी। मानों दर्द का समुंदर इस उपवन में उमड़ पड़ा हो।


चकित हृदय से वह स्वयं से प्रश्न करता है --अभी कुछ देर पूर्व ही तो इस उद्यान में अनेक राजनेता, अफ़सर और अन्य विशिष्टजन जुटे हुये थे। जिन्होंने इन शहीदों की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने के पश्चात शहीद स्तंभ के समक्ष आत्मनिर्भर भारत पर बड़ी-बड़ी लच्छेदार बातें कही थीं। झंडारोहण कर मुख्य अतिथि ने 'सबका विकास, सबको काम, सबका कल्याण और सबका साथ ' ऐसा उद्घोष करते हुये राष्ट्र के प्रति अपनी वचनबद्धता दोहराई थी। कैसा पावन वातावरण था ? जैसे लग रहा था कि गाँधी बाबा के सारे अनुयायी खादी धारण किये उनके सपने को साकार करने यहाँ आ पहुँचे हों। वर्ष में दो बार यह अद्भुत दृश्य इस उद्यान में अवश्य देखने को मिलता है। देशभक्ति वाले गीत भी सुनने को मिलते हैं।


किन्तु पंद्रह अगस्त के दिन इस पार्क में रोने की आवाज़ उसने इससे पूर्व कभी नहीं सुनी थी या यूँ भी कह लें कि उसने इस रुदन को सुनने का प्रयत्न ही नहीं किया था। उसके जीवन का अधिकांश समय तो अपनी शिक्षा की डिग्री लिये आजीविका की खोज में बड़े लोगों की चिरौरी करते गुजर गया है। और तभी से न जाने कैसे उसका नाम चिरौरीलाल पड़ गया है।कर्तव्यनिष्ठ हो कर भी आज़ाद भारत में वह स्वालंबी नहीं बन सका। जब भी सरकार बदलती, उसे लगता कि जैस रामराज्य आने वाला है,किन्तु चुनावी बुखार उतरते ही उस जैसे करोड़ों निम्न-मध्यवर्गीय लोगों की झोली खाली ही रह जाती है। जब स्वतंत्र राष्ट्र में भी लोकतंत्रीय शासन की व्यवहारिक क्रियाओं से देश के युवा नैराश्य की अवस्था में हों, उनकी शिक्षा का कोई मोल नहीं हो,तो ऐसी व्यवस्था अराजकता को जन्म देती है।


वक़्त के थपेड़ों की मार सहते-सहते चिरौरीलाल का पौरूष अब थकने को है,किन्तु बेरोजगारी साढ़ेसाती बनी सिर पर चढ़ी हुई है । वह समझ गया था कि यह ग़रीबी किसी एक व्यक्ति की व्यक्तिगत व्यवस्था का फल नहीं है, इसके लिए सामूहिक व्यवस्था दोषी है। हाँ,एक काम यह अच्छा हुआ है कि इस जीवन संघर्ष ने उसकी शुष्क संवेदनाओं की तंतुओं में स्पंदन ला दिया है, तभी इस उल्लास भरे दिन में भी इस स्त्री की अस्फुट-सी आवाज़ उस तक पहुँच पायी थी , अन्यथा समारोह समापन से लौट रहे अन्य किसी ने महिला के विलाप को नहीं सुना था ।


ओह ! कितना दर्द है इस नारी के स्वर में। उत्सुकतावश चिरौरी दबे पाँव वापस उद्यान की ओर बढ़ जाता है। और जहाँ वह विस्मयपूर्ण नेत्रों से उस महिला को देखता ही रह जाता है।

" हाय ! यह कैसा अनर्थ है? ये तो अपनी भारत माता हैं ! आज़ के दिन इन्हीं का तो पूजन-वंदन देश का हर नागरिक करता है। और ये यहाँ आपने शहीद पुत्रों के समक्ष विलाप रही हैं।" यह मार्मिक दृश्य देख भय से उसका हृदय काँप उठा था । इस स्थिति में माता से आँखें मिलाने का साहस नहीं जुटा पाता है। वह शहीद स्तंभ के ओट में छिपकर रुदन कर रही माँ भारती की बातें सुनने लगता है।


उसने देखा भारत माता खुदीराम बोस की प्रतिमा से कुछ कह रही थीं। हाँ ,याद हो आया..इसी अमर क्रांति दूत की शहादत से जुड़े गीत उसने ऐसे राष्ट्रीय पर्वों पर कोलकाता में अपने विद्यालय में सुना था । मात्र 19 वर्ष की अवस्था में खुदीराम आजादी के दस्तावेज़ पर सुनहरे अक्षरों में अपना हस्ताक्षर बना बढ़ गये थे , उस मंजिल की ओर जिसके समक्ष यदि अमृत कलश भी बेमानी है। बंगाल का हर शख़्स इस बालक के चरणों में नतमस्तक दिखा था उसे उस दिन। माँ भारती अपने इसी बलिदानी सपूत से रुँधे कंठ से शिकायत कर रही थी-- रे खुदी ! स्मरण कर जाने से पूर्व तूने अपनी माता से क्या वादा किया था, यही न..


एक बार बिदाई दे माँ घुरे आशी।

आमी हाँसी- हाँसी पोरबो फाँसी,

देखबे भारतवासी ।


पर देख न मेरे लाल ,आज जब देश आज़ाद है, तो तू नहीं आया, तेरे बलिदानी भाई-बंधु भी नहीं आए । और मेरे इस तिरंगे की डोर जिनके हाथों में हैं, वे सफ़ेदपोश जो तेरे उत्तराधिकारी बन बैठे हैं। वे ऐसे राष्ट्रीय पर्वों पर वैसे तो कितनी अच्छी बातें करते हैं। वे कहते हैं -- नये दौर में लिख देंगे मिल के नयी कहानी, हम हैं हिन्दुस्तानी । किन्तु मंच बदलते ही गिरगिट के तरह रंग बदल लेते हैं। फिर शुरू हो जाती है जातिवाद,क्षेत्रवाद ,धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर नफ़रत की सियासत। मर जाती है इंसानियत। वे पूंजीवाद, साम्यवाद, समाजवाद का ढोल बजाकर देश की भोली जनता को छल रहे हैं। आज अवाम में ख़ासी कड़ुवाहट है। अपनी बादशाहत बचाने के लिए ये कुछ भी कर सकते हैं। सत्ता पाते ही ये राजनेता निरंकुशता का पर्याय बन जाते हैं। और अब तो माफ़िया भी माननीय बन कर मेरे तिरंगे को अपावन कर रहे हैं। जिनके शासन में मेरी बेटियों की अस्मत सुरक्षित नहीं है। दुराचारी मेरे आँचल को मैला कर रहे हैं। बोल,कैसे करूँ मैं अपने स्वाभिमान की रक्षा,जब देश की निर्बल जनता गाँधी जी के उन तीन बंदरों की भाँति अपने मुख, आँख और कानों को बंद किये हो ? क्या अहिंसा के पुजारी ऐसे ही होते हैं ?


पुत्रों, तुम सभी ने मुझे फ़िरंगियों की बेड़ियों से मुक्त करवाने के लिए खुशी-खुशी अनेक कष्ट सहे थे । अपना सब कुछ मुझ पर न्यौछावर कर दिया था। और ये दौलत के पुजारी देश को बेच रहे हैं। अब तो मुझे भी नहीं पता कि इनमें से कौन जयचंद और कौन शकुनि है। कहाँ गये तुम्हारे जैसे पुत्र , जिन्होंने अपने पवित्र रक्त से भक्तिपूर्वक अपनी इस प्यारी भारतमाता के पाँव पखारे थे, किन्तु इन सफ़ेदपोशों में से कितने मेरे लिए रक्तदान किया है ? तुम्हारे मिशन का इन्होंने जनाज़ा निकाल दिया है। चाल, चरित्र, चिंतन जैसे आदर्श वाक्य इतिहास के पन्ने में दफ़न हो चुके हैं।


भारत माता कहती ही जा रही थीं-- क्या प्राचीन भारतवर्ष के मानचित्र में तूने कभी मेरी भव्य तस्वीर को देखा है ? क्या स्वतंत्र भारत में भी मैं वैसी ही हूँ ? और तो और ये मुझे इण्डिया कहने लगे हैं। क्या मैं इनके लिए माता नहीं रही ? खुदी, मेरी व्यथा-कथा को समझ रहे हो ? विचार और कार्य की स्वतंत्रता अवश्य ही मनुष्य को जीवन की उन्नति का मार्ग दिखलाता है, परंतु स्वतंत्रता का अर्थ स्वछंदता तो नहीं होता न पुत्र ?


यह सब सुनकर चिरौरीलाल अश्रु से भरी माँ भारती की आँखों में झाँकने का साहस नहीं कर सका था। ग्लानि से उसका हृदय विकल हो उठा था। किन्तु अडानी-अंबानी बनने की चाहत रखने वालों के इस देश में अब भगत सिंह बनना कौन चाहेगा ? वह भी नहीं..? अकस्मात उसे ऐसा लगा कि मानों अपनी दुखियारी माँ की चीत्कार सुनकर इन शहीदों के मुखमंडल पर कठोरता छाने लगी हो। नाक के नथुने फड़फड़ाने लगे हों। नेत्र लाल अंगार हो गए हों।जैसे किसी सुप्त ज्वालामुखी ने मुँह खोल दिया हो। जिसमें से धुँआ निकल रहा था।

उसे ऐसा लगा मानों ये प्रतिमाएँ कह रही हों-


वक़्त गुलशन पे पड़ा तब तो लहू हमने दिया।

अब बहार आई तो कहते हो तेरा काम नहीं।।


चिरौरीलाल से इस उद्यान में और ठहरते नहीं बन रहा था। उसका दम घुटने लगा था । तभी उसकी चेतना ने आवाज़ लगायी --इससे पहले कि इनमें से लावा बहे , भाग चिरौरी.. भाग..।


-- व्याकुल पथिक

( 13-8-2020 )



अगला लेख: नौकरानी



Shashi Gupta
14 अगस्त 2020

जी आभार, प्रणाम।

आलोक सिन्हा
14 अगस्त 2020

सच मैं बहुत अच्छा लेख है ।

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