तलाश में

25 अगस्त 2020   |  मंजू गीत   (282 बार पढ़ा जा चुका है)

खड़ी है दिवारें बिन छत के हैं घर । रात अंधेरी सुबह की तलाश में है घर। नींव गहरी, टूटा फर्श बेहतर अर्श के इंतजार में है। दो कच्चे कांधे, दो दीह का बोझ संभाले, ढूंढते हैं संग दिल वर, जहां मिलें उन्हें खुशियों भरा कल। बेचैन रातें, टूटी नींद मां को सोने नहीं देती, ज़मीन कोरी, खुला आसमान छाया नहीं छत की। पढ़ाई पूरी, उम्र पूरी, फिर भी तलाश ना हुई पूरी, दूर रिश्ते, दूर नाते, दूर दोस्त दूर है नसीबों से रंग सुनहरे। गज भर का साथ नहीं, गज भर की जुबान सभी की, बिन माली की बगिया में कांटे कब तक रक्षक फूलों के? राम भरोसे खड़ी है दिवारें बिन छत की.. रात अंधेरी सुबह की तलाश में है घर

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