हनुमान चालीसा !! तात्विक अनुशीलन !! भाग ३७

04 अक्तूबर 2020   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (418 बार पढ़ा जा चुका है)

हनुमान चालीसा !! तात्विक अनुशीलन !! भाग ३७

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‼️ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼️


🟣 *श्री हनुमान चालीसा* 🟣

*!! तात्त्विक अनुशीलन !!*


🩸 *सैंतीसवाँ - भाग* 🩸


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*गतांक से आगे :--*


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*छत्तीसवें भाग* में आपने पढ़ा :


*तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा !*

*राम मिलाय राजपद दीन्हा !!*

*--------------------------*


अब आगे :---


*तुम्हारो मंत्र बिभीषण माना !*

*लंकेश्वर भए सब जग जाना*

*---------------------------*


मनुष्य ईश्वर को तो जानता है परंतु जब तक उसका *ईश्वर के प्रति विश्वास* नहीं होता तब तक उसको ईश्वर की प्राप्ति नहीं हो पाती है , और यह विश्वास जगाने के लिए जीवन में सद्गुरु का होना बहुत आवश्यक है | लंका में रहने वाले *विभीषण* यद्यपि भगवान श्री राम के भक्त एवं सज्जन व्यक्ति थे परंतु भगवान राम के प्रति वह विश्वास दृढ़ नहीं हो पा रहा था जो राम जी से मिला सकता | *विभीषण* में एक हीन भावना थी कि मेरे जैसा व्यक्ति राम जी को कैसे प्राप्त कर सकता है ? क्योंकि रावण के कारण उच्च पुलस्त्यकुल तामस के रूप में प्रतिष्ठित हो चुका था | दुर्जन व्यक्तियों का निरंतर साथ था और कोई साधन नहीं था | साधन इसलिए नहीं था क्योंकि रावण के राज्य में सात्विक अनुष्ठान नहीं हो सकता था | इन्हीं सब कारणों से *विभीषण* को यह विश्वास नहीं था कि हमें भगवान राम की प्राप्ति हो सकती है | अपनी यह हीन भावना उन्होंने *हनुमान जी* के समक्ष प्रकट भी कर दी थी |


*तात कबहुं मोहि जानि अनाथा !*

*करिहहिं कृपा भानु कुल नाथा !!*

*तामस तनु कछु साधन नाहीं !*

*प्रीति न पद सरोज मन माहीं !!*


जब *हनुमान जी* ने *विभीषण* के भीतर यह हीन भावना देखी तो उन्होंने *विभीषण जी* से कहा कि हे *विभीषण* कि मुझे देखो ! मैं कौन हूं ?


*कहहुँ कवन मैं परम कुलीना !*

*कपि चंचल सबही बिधि हीना !*

*प्रात लेइ जो नाम हमारा !*

*तेहि दिन ताहि न मिलइ अहारा !!*

*अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुवीर !*

*कीन्हीं कृपा !!!!*


*हनुमान जी* का यही वक्तव्य *विभीषण* के लिए *मंत्र* हो गया | *मंत्र* कौन दे सकता है ? *मंत्र* देने का अधिकार गुरु को होता है और *हनुमान जी* क्या है ? *हनुमान जी जगद्गुरु भगवान शिव के अवतार हैं !*


विचार कीजिए इसके पूर्व *हनुमान जी* ने सुग्रीव को राम जी से मिलाया तथा राज्य पर भी दे दिया यहां पर सुग्रीव को इस योग्य नहीं समझा कि वह स्वयं यह सब प्राप्त कर सके परंतु *विभीषण* के प्रसंग में यह देखने को मिलता है कि यहां पर *हनुमान जी* ने *विभीषण* से मंत्रणा मात्र की थी *मंत्र* दिया था और *विभीषण* ने इस *मंत्र* को मान करके लंका का राज्य प्राप्त किया | *भगवत्प्रेमी सज्जनों !* आज के युग में अनेक लोग अपने गुरु से मंत्र ले लेते हैं परंतु कहीं ना कहीं से उस मंत्र पर उनका विश्वास नहीं जम पाता है इसलिए उनको इच्छित फल की प्राप्ति नहीं होती और *विभीषण* ने श्रद्धालु बन कर के उस *मंत्र* को ग्रहण किया और उस पर विश्वास करके भगवान श्री राम के शत्रु पक्ष के होते हुए भी युद्ध जैसे संवेदनशील अवसर पर उनकी शरण में गए | और जब विभीषण जी भगवान श्री राम की शरण में जाते हैं तब *हनुमान जी* उनकी कोई सिफारिश भी भगवान राम से नहीं करते हैं क्योंकि सच्चा गुरु वही होता है जो अपने शिष्य को दिए हुए *मंत्र* पर स्वयं दृढ़ होता है तथा उसका यह विश्वास भी होता है कि हमारा शिष्य इस *मंत्र* के बल पर ही ईश्वर को प्राप्त कर लेगा | यहां पर *विभीषण जी* ने भगवान श्रीराम से प्रथम मिलन में एक बात कही कि हे राम जी | मैं आपको जानता नहीं हूं परंतु आप के विषय में हमने सुना है :- *श्रवण सुजस सुनि आयहुँ*


*मंत्र एवं मंत्रणा* दोनों में भिन्नता होती है | कुछ लोग कह सकते हैं कि जिस प्रकार *हनुमान जी* ने *विभीषण* को श्री राम के विषय में बताया था उसी प्रकार *विभीषण* ने भी तो सीता जी के विषय में *हनुमान* को बताया था तो क्या *विभीषण* ने जो बताया वह भी *मंत्र* था ? यहां पर मैं यही कहना चाहूंगा कि वह *मंत्र* नहीं मंत्रणा थी क्योंकि *मंत्र* ईश्वर से मिलाने के लिए दिया जाता है माया से नहीं | *मंत्र* से ब्रह्म को तो प्राप्त किया जा सकता है परंतु माया को प्राप्त करने के लिअ तो युक्ति ही लगानी पड़ती है | भगवान श्री राम पूर्णब्रह्म परमात्मा है तो सीता जी माया है | माया से मिलाने के लिए तो युक्ति बताई जाती है इसीलिए तुलसीदास जी ने लिख दिया है

*जुगुति विभीषण सकल बताई !*

*चलेउ पवनसुत बिदा कराई !!*


यह यथार्थ सत्य है कि ब्रह्म से मिलने के बाद मायाका ज्ञान युक्ति से ही हो सकता है अन्यथा उसका लय ब्रह्म में ही होने से अलग से दिखाई नहीं देती | इसलिए *हनुमान जी* को *विभीषण* ने अशोक वाटिका में भी शोकमग्न सीता को देखने की युक्ति बताई थी *मंत्र* नहीं | *मंत्र* से *विभीषण* का रामजी से मिलना क्यों नहीं कहा गया *लंकेश्वर* होने का भाव तुलसीदास बाबा ने क्यों लिखा ? इस पर भी विचार कर लिया जाय | *लंकेश्वर भए सब जग जाना* लिख करके यह बताने का प्रयास किया है कि भगवान राम से *विभीषण* का मिलना सभी लोग नहीं जान सकते थे लेकिन जब *विभीषण जी* लंका के राजा बने तो *विभीषण* को सभी लोग जान गए आ *एक अन्य भाव* यह है कि *विभीषण जी* जब भगवान श्रीराम से मिले तो उनके साथ कुछ ही दिन रहे परंतु जब *लंकेश्वर हुए* तो एक कल्प तक लंका का शासन किया और सभी युगों के लोगों ने उनको भली प्रकार जान लिया | इसीलिए तुलसीदास जी महाराज ने *लंकेश्वर भए सब जग जाना* लिखकर *राम मंत्र* की महत्ता सिद्ध की है |



*शेष अगले भाग में :---*



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आचार्य अर्जुन तिवारी

पुराण प्रवक्ता/यज्ञकर्म विशेषज्ञ

संरक्षक

संकटमोचन हनुमानमंदिर

बड़ागाँव श्रीअयोध्या जी

9935328830


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