'कोरोना का खतरा अभी टला नहीं है'

08 नवम्बर 2020   |  अशोक सिंह 'अक्स'   (442 बार पढ़ा जा चुका है)

'कोरोना का खतरा अभी टला नहीं है'

'कोरोना का खतरा अभी टला नहीं है'


कोरोना का खतरा अभी टला नहीं है। जहाँ एक तरफ दावा किया जा रहा था कि अब कोरोना का खात्मा होने को आया है और सबकुछ खोल दिया गया, भले ही कुछ शर्तें रख दी गई। हमेशा सरकार प्रशासन सूचना जारी करने तक को अपनी जिम्मेदारी मानती है और उसीका निर्वहन करती है। जैसे सिगरेट के पैकेट पर लिख दिया जाता है कि 'सिगरेट का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।' ठीक इसी तरह से सभी प्रकार के तंबाखू, धूम्रपान सामग्री और मादक द्रव्यों पर लिख दिया जाता है और ये मान लेते हैं कि उनका कार्य व दायित्व पूर्ण हो गया। तो क्या सच में इतने से ही प्रशासन का दायित्व पूरा हो जाता है।

जवाब होगा जी बिल्कुल नहीं…. दरअसल यह तो सूचना जारी करके जिम्मेदारियों से दूर भागना हुआ.. और नहीं तो क्या..? जबतक वैक्सीन नहीं आ जाती और व्यापक रूप से प्रत्येक की सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम नहीं हो जाता तबतक खुले में घूमने की छूट देने और सबकुछ खोल देना बिल्कुल उचित नहीं है।

बिना पुख्ता इंतजाम व व्यवस्था के स्थिति को सामान्य करने का ही नतीजा है कि गुड़गांव में कोरोना का कहर देखने को मिल रहा है। अभी सबकुछ सामान्य होकर जुम्मा-जुम्मा ही हुआ कि संक्रमित मामले तेजी से सामने आने लगे। नवंबर के पहले दिन से ही कोराना संक्रमितों का नंबर बढ़ता जा रहा है। इस महीने के शुरुआती 6 दिन में 3200 से अधिक कोरोना संक्रमित मिल चुके हैं। 12 लोगों की मौत हो चुकी है। शुक्रवार को एक दिन में अब तक के सबसे अधिक 704 कोरोना संक्रमित मिले हैं। वहीं, शुक्रवार को 2 संक्रमितों की मौत भी हो गई। इसके बाद मौतों का आंकड़ा 224 पर पहुंच गया है। यहाँ दयनीय स्थिति बनती नजर आ रही है। दरअसल सात महीनें के बाद तो लोंगों में इतनी जागरूकता आ गई है कि उन्हें खुद इस मामले को गम्भीरता से लेनी चाहिए। पर ऐसा नहीं हो रहा है लोग इतनी आज़ादी से घूम रहे हैं जैसे जमाने के बाद उनको खुले में घूमने का अवसर मिला हो और वे उसको हाथ से जाने नहीं देना चाहते हैं।

अरे बंधुओं, कोरोना की बात को समझो, वह समय की नजाकत को समझाना चाहता है कि आवश्यकताएं समेटो, भौतिकता का त्याग करो, ज्यादा लालच मत करो। धन-दौलत पैसा रुपया ही सबकुछ नहीं है, इनका महत्व व मायने तभी है जब हम रहेंगे। हमें उन्हीं चीजों को महत्त्व देना है जो जरूरी है। शोकजदा होने से अच्छा है शौक को मारो। भले ही कम खाओ पर गम को अवश्य मारो। नियम का पालन करो स्वस्थ रहो और बीमारी को भगाओ। दूरियाँ बनाकर खुद को संक्रमण से बचाओ। नाते-रिश्ते और भाई-बंदी के मोहभरे छलावे को दूर करो।

क्या आगे की स्थिति और दयनीय हो सकती है..? आनेवाले दिनों में कोरोना का घर-घर पहुँचना तो स्वाभाविक है पर नियम का पालन करके, मास्क पहनकर, सेनिटाइजर का प्रयोग करके और सामाजिक दूरियाँ बनाकर हम सावधानी बरत सकते हैं और अपने आपको व घर परिवार को सुरक्षित रख सकते हैं। यह सिर्फ सरकार या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है बल्कि हर एक व्यक्ति की नैतिक जिम्मेदारी है और उसका निर्वहन करना चाहिए। आज ही के समाचार पत्र में पढ़ा कि महाराष्ट्र सरकार भी 23 नवंबर से स्कूल व कॉलेज शुरू करने जा रही है तो क्या महानगर में बचाव की सुविधाओं को पुख्ता कर लिया गया है। सभी कर्मियों व रेल यात्रियों को सुविधा मुहैया हो सकेगा। जी बिल्कुल नहीं। अभी तक वैक्सीन का ट्रायल चल रहा है। ऐसे में संक्रमण के तेज़ी से फैलने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। तो दूसरी तरफ दिवाली का त्यौहार है जिसमें सामाजिक दूरियों को बनाये रखना या मेंटेन करना मुश्किल हो जाएगा। अतः यहाँ पर प्रशासन से उम्मीदें नहीं कि जा सकती है, उन्हें जो करना था वे कर दिए। अब हमारी खुद की जिम्मेदारी बढ़ जाती है, हमें अपनी जान प्यारी होनी चाहिए और उसकी सुरक्षा के लिए स्वयं को चाक चौबंद रखना होगा। वर्तमान हालात देखने के बाद इतना तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि कोरोना की वापसी को नकारा नहीं जा सकता है। यदि वापसी होगी भी तो काफी तेज रफ्तार से होगी। दूसरी तरफ आस-पास के मौसम व तापमान की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका होगी।

वैसे तो प्रशासन ने कुछ मामलों में अभी तक सही और उचित कदम उठाए हैं जिससे सबने राहत की सांस ली है। हालाँकि लोगो को थोड़ी बहुत तकलीफें भी हुई हैं, अनअपेक्षित परेशानियों व समस्याओं का सामना करना पड़ा है। कुछ तो ऐसे भी रहे जिनका इस कोरोना काल ने सबकुछ छीन लिया। कुलमिलाकर ये कहा जाए कि प्रशासन तो अपना काम कर ही रही है, हमें भी अपना काम ईमानदारी से करना चाहिए। हरकदम पर प्रशासन को सहयोग देना चाहिए। शादी-व्याह, दावत-फावत, पार्टीवार्टी आदि चीजें लगी रहेंगी उनका लुत्फ आगे भी लुटाया जा सकता है। यदि जान प्यारी है तो नियमों व सरकार द्वारा जारी किए गए दिशानिर्देशों का भी पालन करना चाहिए। आखिर 'जी है तो जहां है' और 'अपनी जिंदगी अपने हाथ में है' इन सिद्धांतों को अपनाना होगा और परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बनाकर इस विकट परिस्थिति से निजात पाना होगा। खैर आशा ही जीवन है और हमें आशावादी बनकर इस विकट परिस्थिति का सामना करना है।

➖अशोक सिंह 'अक्स'

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