सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैं

23 मार्च 2021   |  शोभा भारद्वाज   (479 बार पढ़ा जा चुका है)

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैं

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

डॉ शोभा भारद्वाज

लाहौर सेंट्रल जेल ,23 मार्च 1931 को भोर ,इंकलाब ज़िंदा बाद के नारों से जेल की दीवारे थर्रा उठी थी

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने अपने हाथ जोड़े और अपना प्रिय आज़ादी गीत गाने लगे-

कभी वो दिन भी आएगा

कि जब आज़ाद हम होंगें

ये अपनी ही ज़मीं होगी

ये अपना आसमाँ होगा.

कोठरियों में बंद किये गये कैदी समझ गये, जेल की घड़ी में 6 बजे तीनों कैदियों की पद चाप के साथ कैदियों ने सिपाहियों के भारी बूटों की आवाज सुनी , तीनों क्रान्तिकारियों के गाने की आवाज ‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, आवाज तीव्र से तीव्रतर होती गयी जेल में इंकलाब जिंदाबाद, भारत माता का जय घोष गूँजने लगा , जय घोष से जेल की दीवारे थर्रा उठी स्वर हवा मे तैरता हुआ बाहर खड़े जनसमुदाय ने सुना कैदियों ने स्वर में स्वर मिलाया इंकलाब ज़िंदा बाद शहादत कुछ ही कदम पर थी गले में फांसी का फंदा तीनों शहीद अमर हो गये. आवाज शांत हो गयी

बलिदान इतिहास के पन्नों में सदैव स्वर्ण अक्षरों में लिखा रहेगा

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ज्ञान हॉर्स
25 मार्च 2021

इसमें एक जोश है - GYAN HOURS

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