अपसंस्कृति है कट्टरवादी वहाबी आतंकवाद

26 जुलाई 2016   |  राघवेन्द्र कुमार   (178 बार पढ़ा जा चुका है)

         जब अकर्मण्यता को छिपाकर जीवन जीने के लिए आवश्यक संसाधनों को सच्चाई और पुरुषार्थ से जुटाने की बजाय हिंसा से छीन लिया जाता हैए चोरी कही जाती है । इससे चोर घर की शून्यता को तो ख़त्म कर लेता है किन्तु चुरायी गयी कुछ महान सम्पत्तियों को डर या ज्ञान के अभाव में नष्ट कर देता है अथवा उन्हें विकृत कर देता है । इस तरह या तो एक महान वस्तु का समापन हो जाता है या फिर उसका रूप परिवर्तित कर उसका प्रयोग किसी अन्य कार्य के लिए किया जाने लगता है । औषधि के रूप में रखी गयी पवित्र वस्तु को चोर खाने योग्य समझकर उसे पाकशाला में रखकर खाने लगता है । प्राण बचाने वाली औषधि का भोजन के रूप में प्रयोग घातक सिद्ध होता है । जीवनदायी अमृत विष बनकर समाज को निगलने लगता है । ठीक इसी तरह जब समाज के कुछ अराजक तत्व स्वस्वार्थ सिद्धि के लिए संस्कृति की चोरी कर उसे मनमाने रूप में स्थापित करने प्रयत्न करते हैंए तब जो समाज अस्तित्व में आता है वह विषैले स्वभाव का होता है । ऐसा समाज शासक बनने के लिए संस्कृति को अपसंस्कृति बनाकर रख देता है । कालान्तर में यही अपसंस्कृति सम्पूर्ण समाज को नर्क के गर्त में ढकेल कर मानवता को सदा - सदा के लिए ख़त्म कर देती है । आतंकवाद ऐसी ही एक अपसंस्कृति का परिवर्धित स्वरूप है । संस्कृति या संस्कार ही किसी धर्म का निर्माण करते हैं । जब तक संस्कार विशेष अर्थात दीक्षा या ख़तना का पालन न हो जाए मनुष्य धर्म में प्रवेश ही नहीं कर पाता है । ऐसे में संस्कृति विहीन समाज धार्मिक कैसे हो सकते हैं । खुद को धर्म के प्रति ईमानदार कहने वाले सांस्कृतिक शून्यता युक्त समाज किसी स्थापित सभ्यता या संस्कृति की चोरी ही तो करेंगे और चोरी का माल अपना बनाने के लिए चुराए गए माल में बिगाड़ पैदा करेंगे । ये जानते हैं कि इसके लिए ख़ुदा कभी इन्हें माफ़ नहीं करेगा किन्तु मज़बूरी मज़हबी दूकान चलाने के लिए धरती के ख़ूबसूरत धर्म में ये बिगाड़ पैदा ही करेंगे । यहाँ पर एक बात और बता देना न्यायसंगत होगा कि सास्कृतिक शून्यता पर इतिहासकारों का हाथ हमेशा तंग ही रहा है । इसके पीछे के कारणों को आप बखूबी समझते ही हैं कि आधुनिक इतिहासकार सनातन इतिहास को मिथक की संज्ञा देते हैं और इसे प्रमाणिक भी नहीं मानते । खैर छोड़ो... पागलों के कहने से कोई पागल थोड़े ही नहीं हो जाता ।               

            जब अकर्मण्यता को छिपाकर जीवन जीने के लिए आवश्यक संसाधनों को सच्चाई और पुरुषार्थ से जुटाने की बजाय हिंसा से छीन लिया जाता हैए चोरी कही जाती है । इससे चोर घर की शून्यता को तो ख़त्म कर लेता है किन्तु चुरायी गयी कुछ महान सम्पत्तियों को डर या ज्ञान के अभाव में नष्ट कर देता है अथवा उन्हें विकृत कर देता है । इस तरह या तो एक महान वस्तु का समापन हो जाता है या फिर उसका रूप परिवर्तित कर उसका प्रयोग किसी अन्य कार्य के लिए किया जाने लगता है । औषधि के रूप में रखी गयी पवित्र वस्तु को चोर खाने योग्य समझकर उसे पाकशाला में रखकर खाने लगता है । प्राण बचाने वाली औषधि का भोजन के रूप में प्रयोग घातक सिद्ध होता है । जीवनदायी अमृत विष बनकर समाज को निगलने लगता है । ठीक इसी तरह जब समाज के कुछ अराजक तत्व स्वस्वार्थ सिद्धि के लिए संस्कृति की चोरी कर उसे मनमाने रूप में स्थापित करने प्रयत्न करते हैंए तब जो समाज अस्तित्व में आता है वह विषैले स्वभाव का होता है । ऐसा समाज शासक बनने के लिए संस्कृति को अपसंस्कृति बनाकर रख देता है । कालान्तर में यही अपसंस्कृति सम्पूर्ण समाज को नर्क के गर्त में ढकेल कर मानवता को सदा - सदा के लिए ख़त्म कर देती है । आतंकवाद ऐसी ही एक अपसंस्कृति का परिवर्धित स्वरूप है । संस्कृति या संस्कार ही किसी धर्म का निर्माण करते हैं । जब तक संस्कार विशेष यथा दीक्षा या ख़तना का पालन न हो जाए मनुष्य धर्म में प्रवेश ही नहीं कर पाता है । ऐसे में संस्कृति विहीन समाज धार्मिक कैसे हो सकते हैं । खुद को धर्म के प्रति ईमानदार कहने वाले सांस्कृतिक शून्यता युक्त समाज किसी स्थापित सभ्यता या संस्कृति की चोरी ही तो करेंगे और चोरी का माल अपना बनाने के लिए चुराए गए माल में बिगाड़ पैदा करेंगे । ये जानते हैं कि इसके लिए ख़ुदा कभी इन्हें माफ़ नहीं करेगा किन्तु मज़बूरी मज़हबी दूकान चलाने के लिए धरती के ख़ूबसूरत धर्म में ये बिगाड़ पैदा ही करेंगे । यहाँ पर एक बात और बता देना न्यायसंगत होगा कि सास्कृतिक शून्यता पर इतिहासकारों का हाथ हमेशा तंग ही रहा है । इसके पीछे के कारणों को आप बखूबी समझते ही हैं कि आधुनिक इतिहासकार सनातन इतिहास को मिथक की संज्ञा देते हैं और इसे प्रमाणिक भी नहीं मानते । खैर छोड़ो... पागलों के कहने से कोई पागल थोड़े ही नहीं हो जाता । सम्पूर्ण विश्व में सनातन को छोड़कर सभी धर्म दो से तीन हजार वर्ष पुराने ही हैं । सनातनी संस्कृति पिश्व में सबसे प्राचीन संस्कृति है । अभी तक पश्चिमी गला फाड़ - फाड़ कर चिल्लाते थे कि भारत में आर्य बाहर से आए थे । इस थ्यौरी को आर्यन इनवैज़न थ्यौरी कहा जाता हैए जो कि कपोलकल्पित गल्प से ज्यादा कुछ नहीं है । लेकिन पुरातात्विक शोधों से उनके इस बनावटी गुब्बारे की हवा निकल चुकी है । साबित हो चुका है कि आर्य कहीं से आए नहीं थे अपितु आर्य भारत भूमि से ही सम्पूर्ण विश्व में फैले और विश्व को जंगलों, कन्दराओं से निकालकर बस्तियों तक लाए । मानव जाति को सनातन ज्ञान का दान दिया । तभी तो भारत को विश्व गुरू कहा गया । अफ़सोस आज भारत की संस्कृति को अपसंस्कृतियाँ खा जाने पर तुली हैं । इन्हीं में एक अपसंस्कृति है कट्टरवादी वहाबी आतंकवाद । 

        

        परिवर्तन प्रकृति का कानून है और इस्लाम परिवर्तनों का विरोध करता है । पवित्र कुरान में जो लिखा है इस्लाम अक्षरशः उसी का पालन करता है । समय के साथ न जाने कैसी - कैसी परिस्थितियाँ आती हैं । इन सबसे निबटने के लिए ज़रूरी नहीं कि दो हजार साल पुराने तौर - तरीके कारग़र ही साबित हों । हमें प्रकृति के साथ सन्तुलन साधने की आवश्यकता होती है किन्तु इस्लाम सारी मर्ज़ों का इलाज उसी एक किताब में ढूँढता है । अगर हिन्दू सारे नियम और कानून मनुस्मृति के आधार पर बनाने लगे तो सनातनी सभ्यता के ख़त्म होने में समय ही नहीं लगेगा । शायद यही कारण रहा कि धीरे - धीरे मनुस्मृति की सनातन धर्म में उपयोगिता नहीं के बराबर हो गयी जबकि मनु स्मृति के विधान कुरान की अपेक्षा आज भी श्रेष्ठ हैं । मनुस्मृति न्याय शास्त्र और दण्ड विधान का आधार है । फिर भी आज के समाज में उपयोगी नहीं । जो समाज वर्तमान के साथ कदमताल नही करता पिछड़ जाता है । उसकी कोई सामाजिक उपयोगिता नहीं रहती । कुछ ऐसी ही हालत इस्लाम की भी है । दुनियाँ के 57 मुस्लिम देशों ने आखिर इस विश्व की भलाई के लिए दिया क्या है... आतंकवाद की विभीषिका । इस्लामी विचारधारा का दर्शन एकोअहम द्वतीयो नास्ति का है । इस्लाम ख़ुद को अच्छाइयों का और अन्य धर्मों को बुराइयों का प्रतीक बताता है । इस्लाम को इस भोंडी मानसिकता से बाहर आना होगा । याद रहे कि चर्च की तानाशाही से मुक्ति के बिना यूरोप का विकास भी असम्भव ही था । 

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