उम्मीदों की कश्ती

25 अगस्त 2016   |  गोविन्द पंडित स्वप्नदर्शी   (151 बार पढ़ा जा चुका है)

टिमटिमाते तारे की रोशनी में

मैंने भी एक सपना देखा है ।

टुटे हुए तारे को गिरते देखकर

मैंने भी एक सपना देखा है ।

सोचता हूं मन ही मन कभी

काश ! कोई ऐसा रंग होता

जिसे तन-बदन में लगाकर

सपनों के रंग में रंग जाता ।

बाहरी रंग के संसर्ग पाकर

मन भी वैसा रंगीन हो जाता ।

सपनों से जुड़ी है उम्मीदें, पर

उम्मीदों की उस परिधि को

क्या नाम दूं ? सोचता हूं तो

मन किसी अनजान भंवर में

दीर्घकाल तक उलझ जाता है।

कोई अनसोची जवाब उभरता

फिर क्षण भर में लुप्त हो जाता है ।

उम्मीद ही तो वह संजीवनी है

जिसके सहारे सपनों की राह में

आने वाली हर चुनौतियों के आगे

ना कभी मस्तक झुका ना दिल हारा ।

उम्मीदों की इसी कश्ती में होकर सवार

मैं सपनों की रंगीन दुनिया ढूंढ निकालूँगा ।


@ गोविन्द पंडित स्वप्नदर्शी

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