पप्पू पास ,पापा फेल

01 सितम्बर 2016   |  दुर्गेश नन्दन भारतीय   (119 बार पढ़ा जा चुका है)

@@@@@@ पप्पू पास ,पापा फेल @@@@@@

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मम्मी से अलग सोने को ,जब पप्पू हुआ नहीं राजी |

पापा को उसे समझाने की , सूझ आयी तरकीब ताजी |

बोले ,मम्मी के संग सोने वाले ,छोटे बच्चे होते हैं |
नहीं समझ होती जिनको ,जो बिन बात के रोते है ||
पप्पू बोला, पापा आप ,नाराज व्यर्थ ही होते हो |
आप क्या छोटे बच्चे हो ,जो मम्मी के संग सोते हो ?|
पापाजी से इस प्रश्न का,जब उत्तर देते नहीं बना |
तो बोले वो अपने मन में , कैसा पूत यह जना ||
पापा कभी किसी से ,नगद नहीं लेते नजराना |
सुना रहा हूँ वो बात आपको ,जो सच है पूरे सोलह आना ||
मिली थी एक कृष्ण -मूर्ति ,पापा को ठेकेदार से |
दिलवाया था ठेका जिसको ,भारत की सरकार से ||
पापा ने वो चांदी की मूर्त ,निज मंदिर में थी रखवायी |
रोज पूजा करते वक्त ,पप्पू से घंटी थी बजवायी |
रक्षा करना दुश्मनों से ,और चोरी से घर बचाना |
हे प्रभो ,तुम राधा के संग ,यही पर रास रचाना ||
रोज प्रार्थना करते यह पापा, जिसे सुनता पप्पू ध्यान से |
भक्त मान बैठा पापा को ,वो अपने मासूम ज्ञान से ||
एक किलो चाँदी की वो मूर्त ,बहुत ही मूल्यवान थी |
सर नवाते जिसको पापा ,पप्पू की वो जान थी ||
एक दिन वो प्यारी मूर्त ,एक चोर चुरा ले गया |
पप्पू के मासूम दिल को ,वो दुःख बहुत ही दे गया ||
सुबकते हुए पप्पू बोला ,अब कौन हमें बचाएगा ?
राधा के संग हमारे घर में ,अब कौन रास रचाएगा ??
पापा बोले ,पप्पू बेटे , भगवान की यहीं मर्जी है |
यह दुनिया भी तो उसी ने ,अपनी मर्जी से सरजी है ||
बिन उसकी मर्जी के ,एक पत्ता तक नहीं खड़कता है |
उसकी मर्जी से ही तो ,दिल हमारा धड़कता है ||
एक दिन पप्पू की बहिन का ,अपहरण किसी ने कर लिया |
मम्मी -पापा का सुख चैन ,एक पल में हर लिया |
कहने लगा पप्पू पापा से ,भगवान की यही मर्जी है |
अपहरण की यह वारदात भी ,उसके गुण्डों ने ही सरजी है ||
पप्पू की इस बात को आप ,हँसी में नहीं टालिये |
अपने मन में किसी भ्रम को ,आप कभी न पालिये||
जिसके मुँह में सृष्टि थी सारी,वो दुर्योधन को समझा न सका |
और बहेलिये के एक तीर से ,जो खुद को नहीं बचा सका ||
सर्व शक्तिशाली और अन्तर्यामी ,जो रावण को न भगा सका |
और बिन बजरंग के जो भगवान,सीता का पता लगा न सका ||
पत्थर की अहिल्या को जो ,पुनर्जीवन देता है राम |
वो करता है क्यों बताओ ,निर्दोष शम्बूक का काम तमाम ||
अपनी पतिव्रता पत्नी को ,जो देता है घोर वनवास|
ऐसे अवाँछित व्यक्ति ही ,हमें क्यों आते है रास ?|
कैसा है वो भगवान हमारा ,जो नहीं देता सबको सन्मति|
देता अगर सन्मति सबको ,तो क्यों होती हमारी दुर्गति ||

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