जी , टी . रोड पर अँधेरी रात का सफ़र ---

10 फरवरी 2017   |  रेणु   (424 बार पढ़ा जा चुका है)

जी , टी . रोड  पर  अँधेरी  रात   का सफ़र  ---

दिन के प्रत्येक पहर का अपना सौन्दर्य होता है | जहाँ भोर प्रकृतिवादी कवियों के लिए सदैव ही नवजीवन की प्रेरणा का प्रतीक रही है वहीँ प्रेमातुर व्यक्तियों और प्रेमवादी विचारधारा के कवियों व साहित्यकारों के लिए रात्रि के प्रत्येक पल का अपना महत्व माना है | रचनाकारों ने अपनी रचनाओं -- चाहे वह कविता हो , निबंध अथवा कहानी इत्यादि-- सबमे रात्रि का बहुत भावपूर्ण वर्णन किया है | रातों में भी चांदनी रात को आम आदमी से लेकर बुद्धिजीवियों तक -- सबने खूब सराहा है और साहित्य से लेकर सिनेमा तक सबमे इसके सौदर्य को खूब स्थान मिला है | फिल्मो मे चांदनी रातों में फिल्माए गीत जनमानस में समय - समय पर खूब लोकप्रिय हुए हैं | कवियों ने गोरी के मुखड़े की तुलना चाँद से कर डाली तो गौरवर्णी नायिका को चांदनी में नहाई होने का ख़िताब देना अद्भुत कहा गया | लेकिन चांदनी रात के विपरीत उस रात्रि का भी अपना ही सौदर्य और महत्व है जो पूर्णतयः प्रकाशविहीन होती है --- जब ना चाँद होता है ना चांदनी -- | काले अंधियारे में डूबी रात में आकाश में तारे भी अपनी भरपूर ताक़त से टिमटिमाते नज़र आते है-- शायद इन रातों में उन्हें चाँद के सामने अपनी रौशनी कम हो जाने का डर नहीं होता होगा | हर पग पर व्याप्त अँधेरा कण- कण को अपार धीरज की प्रेरणा देता दिखाई देता है | ऐसी रातो में सफ़र का अलग ही आनंद है | मौन -- निस्तब्ध वातावरण में अँधेरे में लिपटी प्रकृति अलग अंदाज में प्रकट होती है | | काली स्याह रात में पेड़ - पौधे , खेत - खलिहान व रास्तो के किनारे बसी बस्तियां ना जाने कौन - सा जादू जगाती दिखाई पड़ती हैं | ऐसी ही एक स्याह रात में पिछले साल दिल्ली से करनाल तक का रोमांच से भरा अद्भुत सफर एक अविस्मरणीय घटना में बदल गया-- जब हम सपरिवार दिल्ली से अपने गृहनगर लौट रहे थे | उस रात जी .टी . रोड जनवरी की सर्द काली रात में एक पुल सरीखा नजर आ रहा था | लग रहा था मानो काली रात एक विशाल समुद्र है तो जी .टी . रोड इस समुद्र पर बंधा एक अनंत पुल -- -- इस पुल पर असंख्य छोटी बड़ी गाड़ियां विराट काफिले के रूप में उड़न -खटोलों की तरह फिसलती जाती प्रतीत हो रही थी | हमारी गाड़ी भी इस काफिले का एक छोटा सा हिस्सा बनकर गंतव्य की ओर अग्रसर थी | रात्रि का ये मनमोहक मौन -मन को जादू में बांधता प्रतीत हो रहा था | घटाघोप अँधेरे में दूर मकानों में जलते बल्ब जंगल में चमकते जुगनुओं का भ्रम पैदा करते लग रहे थे तो पुराना फ़िल्मी संगीत माहौल में अलग ही जादू जगा तन - मन को रूहानी आनंद से भर रहा था--उस पर सफ़र में पूरे परिवार के साथ मन को अनोखी ख़ुशी मिल रही थी | पर हर सफर की मंजिल होती है | वैसे ही यह सफ़र भी अपनी मंजिल पर जाकर थम गया पर हमेशा के लिए यादगार बनकर रह गया| शायद ऐसे ही किसी सफर के लिए किसी शायर ने ये पंक्तियाँ लिखी होगी ------

इस सफर में बात ऐसी हो गई --

हम ना सोये रात थककर सो गयी ! !


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विश्वमोहन
02 अप्रैल 2017

आपकी विलक्षण कल्पना शक्ति को प्रणाम!!! अब एक दूसरी काली रात में चले जहां बंदीगृह में बंद स्वतन्त्रता सेनानी को जब कोयल की कूक सुनायी देती है तो उसके मनोभावों को अपने शब्दों से अद्भुत चित्र खींचा है माखन लाल चतुर्वेदी ने! :-
काली तू, रजनी भी काली,/
शासन की करनी भी काली/
काली लहर कल्पना काली,/
मेरी काल कोठरी काली,/
टोपी काली कमली काली/,
मेरी लोह-श्रृंखला काली,/
पहरे की हुंकृति की व्याली/,
तिस पर है गाली, ऐ आली!/

इस काले संकट-सागर पर/
मरने की, मदमाती!/
कोकिल बोलो तो!/
अपने चमकीले गीतों को/
क्योंकर हो तैराती!/
कोकिल बोलो तो!/

रेणु
03 अप्रैल 2017

बहुत सुंदर -- आभार आपका जो आपने चतुर्वेदी जी की इस अनुपम रचना का स्मरण कराया !

इसे पढ़ कर पता चला की आप एक बेहद खुशमिजाज़ व्यक्ति हैं , जो एक सुन्दर से सफर में भी ख़ुशी ढूंढ लेती है . वाकई पढ़ कर सुकून मिलता है एक छोटे छोटे किस्से.

रेणु
11 फरवरी 2017

प्रियंका जी , बहुत आभार -- साथ बनाये रखिये---- शुभकामना

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