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बेटे की चाहत में,घर बर्बाद कब तक !

31 मार्च 2017   |  प्रदीप कुमार

बेटे की  चाहत में,घर बर्बाद कब तक !

ये कैसी विडंबना है कि नारी का समाज में इतने योगदान के बाद भी वो सम्मान नहीं मिला, जितनी की वो हकदार है, इसके पीछे शायद नारी ही दोषी है, जब हम बेटी होते है तो अपने हक के लिए लड़ते है, शादी के बाद जब मां बनने वाले होते है तो ' बेटे की चाह ' रखते है, ऐसा क्यों

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, क्या हम खुद को अपने भाईयों से कम सामर्थवान मानते है ? क्या पति से खुद को निर्बल और नाकाबिल समझते है ? अगर नहीं तो हम ' बेटे की चाह ' क्यों पालते है, खुद से क्यों नहीं कहते कि हमारे लिए बेटा -बेटी में कोई फर्क नहीं,"बेटी बचाओ" का नारा लगाते हुए भी, बेटे की चाह, रखने वालों दो तरफे लोगों के कारण 'नारा' बेअसर है, सर्वो के आधार पर मैं कह रही हूं कि पुरुषों से ज्यादा महिला ऐं चाहती है, उनका होने वाला संतान बेटा हो, आज की महिला जो कल बेटी थी, वो बेटी को नाकार रही है, इससे तो यही साबित होता है कि हम खुद का अनादर कर रहे है, जब तक हम खुद को सम्मान नहीं देंगे, हमें लोगों से सम्मान नहीं मिलने वाला, जब- तक खुद पर गर्व महसूस नहीं करेगे, तब-तक हम किसी के लिए, गर्व का प्राप्त नहीं बन सकते, यह कहानी सच्ची घटना पर आधारित है,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,


यह कहानी उस इंसान की है, जिसे 20 साल पहले ऐसे जख्म मिले थे, जो उनके पहचान को मिट्टी में मिला दिया, जख्म इतने गहरे की आज कैंसर के रूप में उनके सामने खड़ा है, इंसान कैंसर से भी लड़ ले मगर तब, जब वो आत्मबल से मंजबूत हो, आत्मबल से टुटे हुए इंसान के लिए सर्दी-खाँसी भी मौत का कारण बन जाता है, रामेश्वर जी को दौलत की ऐसी भूख की, उनके पास खुद की शादी के बारे में सोचने का भी समय नहीं, नौकरी एक साधारण पद की मिलती है, वह अपने काबिलियत और मेहनत के बल पर धीरे-धीरे परीक्षा पास करते हुए, ऑफिसर बन जाते है, अपने भविष्य के लिए ढेर सारा धन जमा कर लेते है, उन्हे लगता है, दौलत से सब-कुछ पाया जा सकता है,40 साल की उम्र में उन्हें याद आती है कि इस धन का भोग करने वाला भी होना चाहिए, तब जाकर शादी की इच्छा जाहिर करते है, घरवाले उनके लिए लड़की देखना शुरू करते है,4-5 लड़कियाँ देखने के बाद, उन्हें 20 साल की सुमन को पसंद करते है, रामेश्वर जी शादी से पहले ही लड़किवालों से मिलते है और अपने बारे में सबकुछ बता देते है, लड़की और उसके घरवालों को उनके उम्र से कोई मतलब नहीं, दौलत है , शादी के बाद उनके सारी दौलत की मालकिन सुमन होगी, लड़की के साथ-साथ लड़कीवाले भी आराम की जिंदगी जी पायेगे, और क्या सोचना, 40 बर्ष के वर के साथ, 20 बर्ष की बधू का विवाह हो जाती है, आखिर में रामेश्वर जी को दौलत का ताकत दिख गया,कुछ सालों तक सुमन को मस्ती है, यहां-वहां घूमना, बहुत सारे गहने, कपड़े, सभी पर अपनी प्रभुता अच्छी लगती है, धीरे-धीरे दोनों के विचारों के मतभेद से अनबन शुरू, अनबन घर की सुख शांति छिन लेती है, 30 साल की उम्र तक सुमन तीन बेटियों की मां बनती है, बेटे की चाह में सुमन चौथी बार मां बनने वाली होती है, रामेश्वर जी इस गर्भ को नष्ट करने की सलाह देते है पर वह नहीं करती, उसे विश्वास है कि इस बार बेटा जरूर होगा, पर ऐसा नहीं होता, फिर से लक्ष्मी का आगमन होता है, रामेश्वर जी गुस्सा से सुमन का आंपरेशन (बच्चा न होने वाला) करा देते है, चार बेटियों वाली सुमन को बेटा पाने की चाह अब भी बरकरार है,कोई उन्हें सलाह देता है कि वो किसी को "धर्म बेटा" बना ले, धर्म बेटा बनाने की प्रक्रिया में पूजा-पाठ द्वारा आप किसी के बेटे को उनकी मर्जी से अपना बेटा बनाती है, उसे इच्छानुसार अपनी संपती का हकदार बना सकती है, एक बेटे की तरह उसे आप दोनों के मरणोंप्रातः मुखअग्नी देने का अधिकार होता है, धर्म उसे मान्यता देती है, ऐसे तो प्यार या अधिकार देने वाले पर निर्भर करती है, उसे निभाना उसका कर्तव्य होता है, सुमन इस तरह भी बेटे की मां कहलाने को तैयार थी, रामेश्वर जी अपने या उनके किसी भी रिश्तेदार के बेटे को धर्म बेटा बनाने की राय देते है, मगर वह अपनी जिद करती है, पड़ोस में रहने वाले चौधरी जी के बेटे को अपना धर्म बेटा बनाना चाहती है, उनके दो बेटे हैं, छोटा बेटा 10 साल का है, चौधरी जी उसे ही रामेश्वर जी का "धर्म बेटा" बनाने की सलाह देते है, सुमन भी उसे प्यार करती है, इस तरह विधिपूर्वक पूजा-पाठ करते हुए, 10 साल के मोलु को सिखाया जाता है कि आज से रामेश्वर जी और सुमन जी, तुम्हारे नये पापा-मम्मी है, अब तुम्हारे दो पापा और दो मम्मी हो गई, तुम्हें ढेर सारा प्यार मिलेगा, वो भी छोटा बच्चा खुश हो जाता है,किसी भी पूजा-पाठ में सुमन मोलु को कपड़े खरीद देती, उनकी चारों बेटियाँ उसे राखी बांधती, अब दोनों घरों के बीच आना-जाना बड़ जाता है, रामेश्वर जी के धन-दौलत को देखकर, चौधरी जी के मन में लालच का बीजारोपण हो चुका था, वह सुमन से तब मिलने आते जब घर पर वह अकेली होती थी,

चौधरी जी....... कैसी हो, मोलु की मम्मी,

सुमन......... ठिक हूं, वो तो घर पर नहीं है,

चौधरी जी....... हम आपसे मिलने आये है, क्यों उनके नहीं रहने पर एक कप चाय भी नहीं मिलेगा,

सुमन......... ऐसी बात नहीं, आप बैठे मैं चाय बनाती हूं,

चौधरी जी....... ( चाय पीते-पीते) अब आप तो मोलु की मां है, वो आपकी बहुत तारीफ करता है,

सुमन......... बहुत प्यारा बच्चा है,

चौधरी जी....... और मैं,

सुमन...... क्या,

चौधरी जी........ हमारा आपका रिश्ता, सिर्फ पड़ोसी का नहीं है,

सुमन...... जानती हूं,

चौधरी जी........ क्या जानती है, एक तरह हम पति-पत्नी हुए, आप मोलु की मां, मैं उसका पापा,

सुमन...... अच्छा मजाक करते है,

चौधरी जी........ एक बात बोलु, आप बुरा नहीं मानना,

सुमन...... क्या,

चौधरी जी........ हमारी आपकी जोड़ी अच्छी लगती है, हम दोनों समउम्र है,रामेश्वर जी मोलु के दादाजी लगते है,

सुमन.........( खामोश),

चौधरी जी......... आप उदास हो गई, मेरा उद्देश्य आपका दिल दुखाना नहीं था, माफ करे,

सुमन........ कोई बात नहीं,

चौधरी जी......... आपको हंसाने आया था, उदास कर दिया, ऐसे आप दोनों में कितने साल का अंतर है,

सुमन........20 साल का,

चौधरी जी......... इसलिए आप उनकी बेटी जैसी लगती है, मैं जा रहा हूं, फिर कभी आऊंगा,


अब चौधरी जी किसी-न-किसी बहाने, सप्ताह में एक बार सुमन से मिलने आ जाया करते है, यहां-वहां की बातो के साथ, सुमन के जख्मों को कुरदने वाली बाते छेड़, उसे सहानभूति देते, सहानभूति धीरे-धीरे प्यार में बदल जाती है और प्यार में सारी मर्यादा तोड़ दोनों एक-दूसरे के बहुत करीब आ जाते है, यहां तक कि उन्हें शारीरिक संबध भी अनुचित नहीं लगता, बात कहां-से-कहां पहुंच जाती है, सारे मोहल्ले वालों को कानों-कान खबर हो जाती है, रामेश्वर जी इन सब बातों से बेखबर दौलत के पीछे पड़े है, उनके प्यार और विश्वास का अपमान कर सुमन उनके दौलत का दुरुपयोग हो रहा है और वो अनजान है, एक दिन जब उन्होंने उन दोनों को 'रंगे हाथ ' पकड़ा तो दोनों शर्म से ' पानी-पानी ' हो गये, उसके बाद शुरू हो जाता है, सुमन पर अत्याचार और शासन, रामेश्वर जी के ताने भरे अपशब्द, सुमन को उनसे दूर और चौधरी जी के करीब कर रही थी,दोनों परिवार परेशान और शर्मशार हो रहा था, सुमन और चौधरी का छुप-छुपकर मिलना बंद नहीं हो रहा था, इनका प्यार नाजायज रिश्तें के नाम से मशहूर हो गया था, दोनों परिवार के छः बच्चों कि जिंदगी नष्ट हो रही थी,

एक शाम,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, सुमन अपनी बेटियों के साथ मायके गई थी, रामेश्वर जी शाम को लगभग आठ बजे ऑफिस का काम कर रहे थे, तभी कोई दरवाजा खटखटाता है, वो बिना नाम पूछे दरवाजा खोल देते है,4-5 गुड्डे उन्हें धक्का देकर घर में घुस जाते है,वो डर जाते है कि चोर उनकी मेहनत की दौलत ले जायेगे, पर ऐसा नहीं होता, उन्होंने उनके घर से एक रुपया भी नहीं लिया, उन्हें जिस काम के लिए भेजा गया था उन्होंने वहि किया, रामेश्वर जी को जान से मार देने में कोई कसर नहीं छोड़ते, कोई हॉकी से, तो कोई बेल्ट से, तो कोई लातों से, तब-तक किसी राहगिर को खिड़की से ऐसा नाजारा दिख जाता है, वह बचाओ-बचाओं चिल्लाता है, गुड्डों को वहाँ से भागना पड़ा, जिंदा के नाम पर सिर्फ सांस आ-जा रही थी, पड़ोसी चिल्लाने की आवाज सुनकर आते है,उन्हें अस्पताल ले जाते है, ऐसी नाजुक परिस्थिति में उनके साथ उनके अपने उनके साथ नहीं थे, सुमन को खबर किया जाता है वो बेटियों और अपने भैया के साथ अपने घर आती है, रामेश्वर जी के भैया-भाभी सब आते है, आते-जाते सांस के सहारे डाक्टरों ने भगवान का काम किया, रामेश्वर जी को दूसरा जन्म उपहार स्वरूप मिला, उनके माता-पिता की दुआ भी काम आती है, पुलिस अपना काम करती है, महीना दिन के भीतर पांचों गुड्डे पकड़े जाते है, पुलिस अपने तरीके से उनसे सब बात उगलवा (पूछ) लेती है, उन्होंने अपना जुर्म कबुल करते हुए कहा कि उन्हें उस व्यक्ति को मारने के लिए रूपये दिये गये थे, उन्होंने ये काम रूपयों के लालच में किया है,फिर क्या था, सुमन और चौधरी को थाने बुलाया जाता है, पूछ-ताछ के बाद जो बात सामने आती है, वो उन दोनों के बचे हुए मान-सम्मान की मिट्टी में मिला देती है, सुमन अपने पति से छुटकारा पाने के लिए चौधरी से मिलकर, उन गुड्डो द्वारा रामेश्वर जी को जान से मार देने के लिए 50,000 रुपये की सुपाड़ी दी थी, दुरूभाग्यवश वो बच गये, काम अधूरा रह गया, यह खबर सिर्फ मोहल्ले तक सीमित नहीं रहती, अखबार और T.V के माध्यम से पूरे शहर की खबर बन जाती है, इतने होने के बाद भी रामेश्वर जी सुमन को माफ कर देते है, मगर सुमन मान-सम्मान की चोट खाई हुए ' घायल ' शेरनी बन जाती है, वह समाज में रामेश्वर जी के पत्नी होने का नाटक करती है, आज अब भी चौधरी से छुप-छुप कर मिलती है, रामेश्वर जी अपने बेटियों के लिए , अपनी शादी को निभा रहे, समय बीतता है, चारों बेटियों की शादी हो जाती है, रामेश्वर जी दौलत के बल पर अच्छे घरों में शादी कर देते है, सुमन आज भी उससे मिलती है ये वो जानते है, पर इतने लाचार है कि वो चुप है, 65 वर्षिय रामेश्वर जी कि तबियत ठीक नहीं रहती, बेटियाँ अपने घर उनकी देख-भाल सही तरीके से नहीं हो पाती , सेवा तो दूर की बात है|

सुमन उनके तरह देखती तक नहीं,दूसरी नम्बर वाली बेटी अपने पापा को अपने घर (ससुराल) ले जाती है, वही उनका देख-भाल करती है, जैसे कोई बेटा अपना फर्ज पूरा करता है, चेकप के बाद पता चलता है कि उन्हें फेफड़े (lung ) में कैंसर है, ऐसी खबर से बेटियों के आंसू रुकने का नाम नहीं, रामेश्वर जी को जब अपने बिमारी के बारे में पता चलता है तो वो अपने अतित में जाकर सोचते है कि आज-तक उन्होंने ऐसी किसी भी चीज का सेवन नहीं किया जिससे उन्हें यह रोग होना चाहिये, शराब तो बहुत दूर की बात है, उन्होंने कभी भी बीड़ी या पान भी नहीं लिया,कैंसर के बारे में सोच-सोच उनका दिमाग खराब, तक उन्हें याद आता है कि 20 साल पहले गुड्डो द्वारा दिये गये जख्म, धीरे-धीरे नासूर बन गई, जो आज कैंसर का रूप धारण कर चुकी है,बीती बातें याद आने से, वो और भी आत्मबल से हीन हो गई, दवा ,दुआ और बेटियों की सेवा कोई काम नहीं है, जीने की इच्छा छोड़ चुके हुए रामेश्वर जी को डाक्टर भी नहीं बचा पाये और वो मतलबी दुनियाँ को अलविदा कर चले, छोटी बेटी मुखअग्नी दिया, उसने अपने पापा को बेटा के फर्ज अनुसार सारे नियमों का पालन किया, सुमन के जिद पर लिया हुआ ' धर्म बेटा ' पीछे रह गया, सुमन को अपनी शादी के 35 साल बाद, रामेश्वर जी से मुक्ति मिली,

अब चौधरी के लिए कोई रुकावट नहीं, बेटियाँ अपने-अपने ससुराल, बेटियों को मम्मी की चिंता नहीं और मम्मी को भी उनकी जरूरत नहीं, रामेश्वर जी के खून-पसीने की कमाई दौलत पर, उनके ही बेटियों का कोई हक नहीं, सुमन ने ये हक ' धर्म बेटा ' मोलु को दे दिया,


कहानी राइटर :- रीता गुप्ता (radhikalayawelfare.org)

विजिट करें : gosahayatablog.com



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