भाषा-व्यक्तित्व का आईना

09 जून 2018   |  वेदप्रकाश भरद्वाज   (145 बार पढ़ा जा चुका है)


भाषा-व्यक्तित्व का आईना

डा. वेद प्रकाश भारद्वाज

भाषा एक आईने की तरह होती है। हम जैसी भाषा बोलते हैं या लिखते हैं वैसा ही हमारा व्यक्तित्व होता है जो भाषा के आईने से सबके सामने आ जाता है। इस दृष्टि से यदि हम आज के युवाओं और बच्चों की भाषा का अध्ययन करें तो कुछ चैंकाने वाले परिणाम सामने आते हैं। एक विद्यालय के कक्षा पांच से लेकर सात तक के कुछ बच्चों के साथ जब बातचीत की तो यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उनमें आपसी बातचीत में शालीनता का अभाव ही नहीं था बल्कि उनमें एक तरह की आक्रामकता थी। इसी प्रकार जब एक कालेज के प्रथम और द्वितीय वर्ष के छात्र-छात्राओं की भाषा के आईने में उनके व्यक्तित्व को परखा तो पाया कि उनमें सीखने के प्रति उदासीनता थी। भाषा प्रयोग में लापरवाही और सब चलता है का भाव उन्हें शिक्षा के लक्ष्य से दूर ले जा रहा था। कई वर्ष पूर्व एक बार जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में वहां के एक प्रोफेसर के साथ कुछ हिंदी के छात्रों से चर्चा हो रही थी तब मैंने उनकी भाषा की गलतियों की तरफ इशारा किया तो जवाब मिला कि सर आदत पड़ी हुई है। बाद में ठीक कर लेंगे। यह तो छात्रों का मसला था। दिल्ली की मैट्रो में और मुम्बई की लोकल में युवाओं को आपस में जिस तरह की भाषा में बात करते देखा या दूसरों से वो जिस तरह से बोलते थे वह एक अलग ही तस्वीर पेश कर रहा था। मैंने पाया कि ज्यादातर युवाओं में अपने साथियों के प्रति प्रेम भले ही था परंतु उसके प्रदर्शन का तरीका बहुत ही अनादरपूर्ण था। अपने सहयात्रियों के साथ भी किसी संदर्भ में बातचीत के दौरान उनकी भाषा और लहजा ऐसा नहीं था जो कि संवाद से समाज को संभव करने वाला हो। इस तरह के और भी उदाहरण खोजे जा सकते हैं। यहां सवाल यह है कि यह सब क्यूं हो रहा है। क्या कारण है कि हमारे बच्चों और युवाओं में आपसी संवाद तक में शालीनता कमतर होती जा रही है। अपनों से बड़ों से बातचीत करते समय कैसी भाषा का प्रयोग करना चाहिए इसका उन्हें ज्ञान तक नहीं है। इसके कारणों की पड़ताल करने बैठें तो कई तथ्य सामने आते हैं। पर उनमें से सबसे ज्यादा महŸवपूर्ण है कि हम अपने बच्चों को वह संस्कार नहीं दे पा रहे हैं जो हमें हमारें बड़ों से मिले हैं। इसमें बच्चों का उतना दोष नहीं है जितना हमारा।


पिछले दो दशकों में तकनीक के प्रसार के साथ ही जीवन में उसकी नियंत्रणकारी भूमिका के कारण बहुत कुछ बदल रहा है। यह भूमंडलीकरण का प्रभाव है कि हम अपनी स्थानीयता को लगातार नकारने की कोशिश करते हुए वैश्विक होना चाहते हैं और इस प्रक्रिया में इतने व्यत हैं या कर दिये गये हैं कि हम यह देख ही नहीं पा रहे हैं कि बच्चे किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। हालांकि यह एक अलग विचार का मुद्दा है कि हमारे अपने जीवन में इतनी अधिक व्यस्तता है कि हमारे पास अक्सर खुद के लिए भी समय नहीं होता पर इसका असर बच्चों पर हो रहा है। हम उनके लिए समय ही नहीं निकाल पाते। ऐसे में हमारी कोशिश होती है कि बस बच्चे किसी तरह व्यस्त रहें। इस व्यस्तता के लिए हम उन्हें मोबाइल फोन, इंटरनेट, टीवी, सिनेमा, माॅल की सैर, पार्टी यानी कि वह सब देने को तैयार रहते हैं जिससे वे व्यस्त रहें और हमारी व्यस्तता में व्यवधान उत्पन्न न करें। हम बस उन्हें नहीं देते हैं तो अच्छा साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरणा, अखबार पढ़ने की आवश्यकता का बोध और जीवन में संयम व शालीनता का महŸव। आज बच्चे जो फिल्में या टीवी धारावाहिक देखते हैं उनका अध्ययन करें तो साफ पता चलता है कि बच्चों व युवाओं का व्यवहार वहीं से प्रेरित है। जिस तरह के कार्टून में आक्रामकता है, जैसी भाषा का प्रयोग धारावाहिकों में होता है, जैसी स्वार्थपरकता उनमें देखने को मिलती है, जिस तरह कोई चीज हांसिल करने के लिए विभिन्न चरित्र कुछ भी करने को तत्पर रहते हैं वह सब बाल व युवा मन को सबसे अधिक व जल्दी प्रभावित करता है। ऐसा नहीं है कि कार्टून या धारावाहिकों में अच्छाई नहीं होती। उनमें भी अंत में अच्छाई की ही जीत दिखाई जाती है। परन्तु यह नहीं भूलना चाहिए कि व्यक्ति बुरी चीजें जल्दी और आसानी से ही नहीं सबसे पहले भी ग्रहण करता है।


एक समय था जब मनोरंजन का मुख्य साधन फिल्में थी या फिर उपन्यास जिन्हें सस्ता साहित्य भी कहा जाता था। उस समय फिल्मों की विषय वस्तु और भाषा समाज को बनाने का काम करती प्रतीत होती थी। खलनायक उस समय भी थे पर वह कभी समाज में नायक की तरह प्रतिष्ठित नहीं थे। तरक्की की चाह उस समय भी मनुष्य में थी परंतु उसके लिए किसी तरह की हड़बड़ी नहीं थी और दूसरों का गला काटने से पीछे रहने की प्रवृŸिा तो नहीं ही थी या बहुसंख्यक लोगों में नहीं थी। चीजें आवश्यकता के दायरे में सिमटी हुई थीं और हमारे होने की प्रमाणिकता नहीं थीं। वे प्रतिष्ठा का विषय थीं परन्तु उनके बिना हम खुद को अकिंचन नहीं समझते थे। पर अब यह स्थिति नहीं है। ‘उसकी कमीज मेरी कमीज से सफेद क्यूं’ तब एक विज्ञापन था हमारा चरित्र नहीं बना था। वैश्वीकरण ने हमारे जीवन को चीजों पर निर्भर कर दिया है। तकनीक के बिना हम खुद को असहाय महसूस करते हैं। नयी से नयी तकनीक हमें चाहिए, यदि न हो तो लगता है हम औरों से पिछड़ रहे हैं। मोदी सरकार ने जब नोटबंदी लागू की थी और उसके बाद बाजार में नकदी का जो संकट था उस दौरान भी मोबाइल की दुकानों पर या कपड़ों की दुकानों पर भीड़ कम नहीं हुई थी और रेस्तरां व होटलों को बंद करने की नौबत भी नहीं आयी थी। सब कुछ पाने और सबसे पहले पाने की होड़ ने हमारे चरित्र को ही बदल दिया है, हमारी सामाजिकता को तहस-नहस कर दिया है। और इन सबके परिणामस्वरूप हमारी भाषा भी बदल गयी है जो हमारे व्यक्तित्व का आईना है।


यहीं आकर इस बात की आवश्यकता महसूस होती है कि बच्चों और युवाओं को वह भाषा सिखाई जाए जो उनके व्यक्तित्व को परिवर्तित कर सके। यह कैसे संभव होगा इस पर विचार करने की आवश्यकता है। एक तरफ इंटरनेट पर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में सामग्री को प्रमुखता दिया जा रहा है तो दूसरी तरफ हमारे युवा अंग्रेजी की दुनिया में प्रवेश को छटपटाते दिखाई देते हैं। आज इंटरनेट पर हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं का प्रयोग करने वाले वे लोग हैं जो किसी कारण से अभी तक अंग्रेजी की छतरी के नीचे आने से बचे रहे हैं या उसका उन्हें मौका नहीं मिला। इंटरनेट के साथ ही मोबाइल पर एसएमएस और अन्य सोशल मीडिया पर युवा जिस तरह की हिंदी-अंग्रेजी की संकर शैली का प्रयोग कर रहे हैं और उसमें भी संक्षिप्तिकरण के नाम पर जो खेल हो रहा है वह उनके व्यक्तित्व को गंभीर और परिपक्व होने से रोकता है। यह कहने भर से काम नहीं चलेगा कि समय आने पर युवा संभल जाएंगे और सही राह पकड़ लेंगे। सब चलता है या चलो अभी तो ऐसे ही काम चला लेते हैं बाद में ठीक कर लेंगे या सीख लेंगे की आदत कब जीवन शैली बन जाएगी और फिर स्थायी संस्कार कहना मुश्किल है।


डा. वेद प्रकाश भारद्वाज वरिष्ठ पत्रकार, लेखक व कलाकार हैं अौर वर्तमान में आईआईएमटी ग्रुप आफ कालेज ग्रेटर नोएडा में पत्रकारिता विभाग में सहायक प्राध्यापक हैं।

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